हम एक ऐसे समय में पहुँच रहे हैं जहाँ भाषा का पतन हमें पतन जैसा लगना बंद हो चुका है। भारतीय समाज में जिन शब्दों को कभी सार्वजनिक रूप से बोलने में संकोच होता था, वही आज राजनीतिक मंचों पर बेझिझक उछाले जाते हैं, टेलीविजन स्टूडियो में बहस का मसाला बनते हैं और शीघ्र ही सोशल मीडिया पर लोकप्रियता का हथियार बनते हुए उन्हें तनिक भी देर नहीं लगती! चिंता तब और बढ़ती है जब साहित्य भी इस शोर से अछूता नहीं रह पाता। आज अनगिनत ऐसे लेखक और पत्रकार हैं जिन्होंने भाषा को रसातल में पहुँचाकर एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा कर दिया है जहाँ न केवल सिर शर्म से झुक जाता है बल्कि आगे के सारे रास्ते भी बंद नजर आते हैं। उस पर इनकी पोस्ट पर वाहवाही करने वाले ऐसे तमाम लोगों की भरमार है जो और भी नीचे गिरने को तत्पर बैठे हैं। समाज ...


















