किसी शाइर का जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं होता, यह एक मुलायम भाषा में लिपटी अभिव्यक्ति का चुप हो जाना भी होता है। आम इंसान तमाम अनुभवों से गुजरता है, पर प्रायः उन्हें शब्द नहीं दे पाता! और तभी जगजीत सिंह की रूहानी आवाज में बशीर बद्र की ग़ज़ल उसके दिल के सारे राज़ बयां कर देती है। ऐसे कितने ही अधूरे, अटके हुए, हल्के-से चुभते अहसासों को अगर किसी ने भाषा दी, तो वे बशीर बद्र साहब हैं। ऐसे में जब उनके जाने की खबर आती है, तो लगता है जैसे हमारी अपनी भाषा का एक हिस्सा हमसे दूर चला गया हो।
बशीर बद्र ने शायरी नहीं लिखी, उन्होंने लोगों के दिलों में पहले से मौजूद वाक्यों को पहचान लिया और उनकी मुश्किल, आसान कर दी। यही वजह है कि उनकी ग़ज़लें किसी एक वर्ग, एक पीढ़ी या एक भाषा की नहीं रहीं, वे सबकी ...


















