“धरती के दो-तिहाई हिस्से पर समुद्र है, और मानव हृदय के दो-तिहाई हिस्से पर चुप्पी।”
शायद इसी से प्रेम हमेशा किनारे पर खड़ा रह जाता है — डूबने के इंतज़ार में।
हम मनुष्य, जिन्हें विज्ञान Homo sapiens कहता है — लगभग तीन लाख वर्षों से इस धरती पर भटक रहे हैं। लेकिन इन लाखों वर्षों में कुल जनसंख्या की 90% पैदाइश केवल पिछले 200 वर्षों में हुई है।
इसका अर्थ?
मानवता की कहानी, जिसे हम शाश्वत समझते हैं — असल में पुराने सन्नाटे के बीच एक हालिया शोर जैसा है।
2025 तक, अनुमान है कि लगभग 117 अरब लोग इस धरती पर जन्म ले चुके हैं। इनमें से आज सिर्फ 7% यानी 8.1 अरब जीवित हैं, यानी बाकी सब — बीते कल की राख हैं।
इतिहास का विशाल हिस्सा, वे लोग हैं जिनके नाम पत्थर पर नहीं खुदे — वे केवल हड्डियों के रूप में दफ़न हुए पड़े है।
हम मानते हैं हर इंसान एक कहानी है।
लेकिन क्या हर कहानी में प्रेम था?
चलो, एक तर्कपूर्ण कैलकुलेशन करें।
मान लें कि इन 117 अरब लोगों में से केवल 60% ही ऐसे थे जिन्होंने जवानी पार की, युद्धों, महामारी या भूख से पहले मरे नहीं — यानी करीब 70 अरब लोग ऐसे जिन्होंने जीवन को जाना, किसी को चाहा या खोया।
और इनमें से भी यदि 50% लोगों ने कभी प्रेम किया — तो 35 अरब लोगों ने प्रेम किया होगा।
अब सोचिए, पूरी मानवजाति में अब तक बस एक-तिहाई लोग ही ऐसे हुए जिन्होंने प्रेम को जिया।
और फिर भी…
दुनिया कहती है —
*प्रेम दुनिया की सबसे बड़ी ताकत है*
कैसा मज़ाक है ये?
जब 70% लोगों के हिस्से में प्रेम कभी आया ही नहीं,
जब इतिहास की किताबों में प्रेमियों की जगह युद्धवीरों, राजाओं, विजेताओं की कहानियाँ लिखी गईं —
जब धर्म ने देह को पाप और प्रेम को बंधन कहा —
तो किस प्रेम पर टिकी है ये दुनिया?
इसलिए शायद दुनिया बदली नहीं।
35 अरब प्रेम भी दुनिया को बदल नहीं सके।
क्योंकि प्रेम कोई सत्ता नहीं, कोई धर्म नहीं, कोई सैन्य योजना नहीं।
प्रेम गहराई है — और गहराई डरावनी होती है।
लोग सतह पर जीते हैं, नारे लगाते हैं, युद्ध करते हैं।
और प्रेम?
वो तो अक्सर हार जाता है — आँसुओं में, खतों में, चिताओं या कब्रों में।
मेरा यह लेख कोई आँकड़ों की बाज़ीगरी नहीं है, ये एक श्रद्धांजलि है — उन प्रेमों को, जो कभी इतिहास नहीं बने।
हर वह चुप्पी जिसमें दो लोग साथ चलते रहे,
हर वह विदाई जहाँ कोई लौटकर नहीं आया,
हर वह युद्ध जिसमें किसी का प्रेम अपूर्ण रह गया,
हर वह स्त्री जो पिता की मर्ज़ी के आगे हार गई,
हर वह पुरुष जिसने प्रेम के नाम पर घर छोड़ दिया —
उन सबके नाम है ये “एक तिहाई प्रेम”।
जैसे पृथ्वी पर केवल एक-तिहाई हिस्सा धरती है, बाक़ी सब सागर…
वैसे ही प्रेम भी —
एक तिहाई है… बाक़ी दुनिया डर, धर्म, लालच और सत्ता का समंदर है।
हम सब जो प्रेम करते हैं —
उस एक-तिहाई को बचाए रखते हैं।
जैसे किनारे पर उगती दूब — मिट्टी की आखिरी उम्मीद।
और अगर एक दिन वो एक-तिहाई भी मिट गया,
तो शायद धरती भी प्रेमहीन हो जाएगी —
और जीवन… केवल कैलकुलेशन रह जाएगा।







