अंबर पर उगता सूरज,फैली लालिमा, और धरा पर उनका पग प्रक्षालन की आतुरता लिए उठती-गिरती समंदर की लहरें। सफेद झक्क झागों से भरे सागर के तट पर उतरती सूर्य किरणें; तभी कानों में मधुर सधी हुई आवाज पड़ती है, “मिले सुर मेरा तुम्हारा..” टेलीविज़न पर पंडित भीमसेन जोशी की एक तस्वीर उभरती है जिसमें वे ये गीत गुनगुनाते हुए नज़र आते हैं ।
सुर की नदिया, हर दिशा से बहके सागर में मिले,बादलों का रुप लेके, बरसे हल्के -हल्के
ये पंक्ति मुझे भान दिलाती है मेरे देश की विविधता में एकता को और फिर बढ़ता है आगे गीत जहाँ सिलसिला चलता है, कश्मीर से पंजाब,उत्तरप्रदेश,राजस्थान,गुजरात, आसाम ,कर्नाटक,केरल, महाराष्ट्र.. इत्यादि सभी अंग भारत देश के शामिल हो जाते हैं,पूरा देश एक सुर ,एक ताल में गाने लगता है।
लता दी की आवाज़, विभिन्न भाषाओं में गाते हुए फ़िल्मी सितारे दिखाई देते हैं । आपको याद होगी वो तिकड़ी ( फोटो साभार गूगल) बच्चन साहेब, मिथुन दा और जीतू जी की।
अभी कुछ दिनों पहले एक वीडियो सामने आया। वाह! क्या संदेश था उसका, AiyyO Shraddha जो #StandUpComedy करती है और हाज़िर जवाबी के लिये जानी जाती है।
उन्होंने “मिले सुर मेरा तुम्हारा ..” का एक अलग ही अर्थ और विश्लेषण कर ऐसा प्रस्तुत किया..जिससे आज के मराठी बोलो,कन्नड़ा बोलो या फिर तमिल ही चलेगा, जैसे बेफ़िज़ूल बातें कर देश को विपरीत दिशा में ले जाने वाले लोगों को शायद कुछ समझ पाने का, सुधरने का मौका मिले।
अपने विडियो में #AiyyoShradsha ने इसी बात को उठाया कि आज के इस दौर मे जो भाषाई और सांस्कृतिक भेदभाव की बातें हो रही है, इस प्रकार के “एक गीत” की रचना एक स्वप्न के समान है क्योंकि आज हमारे दिलों के भीतर कई ऐसी गाँठे बँध चुकी है कि हर एक व्यक्ति अपने-अपने प्रांत की सरपंची कर रहा है, देशहित की बात कोई नहीं करता।इस वीडियो को गौर से देखने पर यह पता चलता है कि इसमें किसी व्यक्ति, भाषा या प्रांत का प्रस्तुतिकरण समय के हिसाब से थोड़ा ज़्यादा है वही किसी विशेष का स्क्रीन टाइम अपेक्षाकृत कम है लेकिन फिर भी किसी के नाख़ुश होने का कोई मतलब ही नहीं उठता लेकिन यदि यह आज की स्थिति होती तब? तब कुछ नहीं होता, बस ये लड़ाई चलती रहती कि तुम्हारी दो पंक्तियाँ ज्यादा थी या तुम टेलीविज़न पर मुझसे ज्यादा समय थे या मेरे प्रांत का तो इस वीडियो में जिक्र ही नहीं है और तो और इस गीत की रचना का ख़याल ही नहीं आता।
ख़ैर; छोड़िए ये सब, क्योंकि मेरा ये मानना है कि आप जब लड़ने-भिड़ने का मानस बना लेते हैं तब कारण छोटा हो या बड़ा, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। इस वीडियो को देखकर तो ऐसा ही लगता है कि आज के हालातों में ये मुमकिन भी नहीं होता। अच्छा हुआ कि ये सालों पूर्व बन गया और हम इतिहास के पन्नों पर भारत की “विविधता में एकता” की रक्षा करने में सफल रहे।
मुझे अच्छी तरह से याद है जब ये गीत दूरदर्शन पर बजा करता था तो कुछ ही समय में ये सर्वाधिक लोकप्रिय हो गया था और शुरुआत की दो पंक्तियाँ सिर्फ़ शब्द भर नहीं थे वरन् ये हर एक व्यक्ति के भाव थे,इमोशन थे अपने देश के लिए,मुझे ख़ुद इन भाषाओं का अर्थ समझ नहीं आता था मगर उनको मैं गाती थी बड़े चाव से। क्या पंजाबी, क्या गुजराती, मराठी टूटी-फूटी भाषा में सभी स्कूल के बच्चों के साथ गाते और आज भी इस वीडियो को देखकर उसी प्यार और स्नेह से गीत गुनगुनाने लगी हूँ।
आज एक बार फिर से हम सभी को इस गीत को सुनने की ज़रूरत है, महसूस करने की जरूरत है जो कहता है उत्तर से दक्षिण तक, पूरब से पश्चिम तक हमारा सुर,लय और ताल सभी एक है। हम खानपान,रहन -सहन, भाषा और साहित्य में चाहे जितना अलग हों मगर अंततः हम एक ही माला के मोती हैं, फूल है और माँ भारती की संतान है।
धन्यवाद दूरदर्शन और प्रसार भारती का, जिन्होंने इस अनमोल धरोहर को सहेज कर रखा है।
मिले सुर मेरा और आपका






