क्या हर धर्म का पहला पाठ इंसानियत नहीं होता?
मज़हब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना....।
फिर ये मज़हब है ही क्यों?
क्योंकि ये जो नहीं सिखाता, वही तो सब सीखते आए हैं!
इतिहास गवाह है, धार्मिकता की आड़ में सबसे ज़्यादा पाप और अत्याचार होते रहे हैं। 'धर्म' न होता तो लड़ने के लिए और कौन सा मुद्दा शेष रहता?
देश में जितने भी दंगे-फ़साद, आगजनी, हत्याएँ और असंख्य अमानवीय कृत्य होते रहे हैं; आखिर इनका जिम्मेदार कौन है? क्या सचमुच धर्म ही इसका मूल कारण है या उन असामाजिक तत्वों की मानसिकता, जिन्हें घृणा से प्रेम है? ये अपने अपराधों का ठीकरा धर्म पर फोड़ आसानी से हाथ झाड़ आगे बढ़ जाते हैं, पर फिर भी आम जनता बेवकूफ बनती आ रही है। क्या जनता सचमुच ही इतनी भोली है या चंद सिक्कों के लिए अपना ईमान बेचना ...
प्रीति अज्ञात








