गीत-गंगा
नवगीत
पर्वत-पीछे झाँके ऊषा,
हाथ पकड़कर आया सूरज।
पूर्व प्राथमिक के बच्चे सा,
धूप संग इठलाया सूरज।।
योग कर रहा संग पवन के,
करे प्रार्थना भँवरे के सँग।
पैर पटकता मचल-मचलकर,
धरती मैडम हुईं बहुत तँग।
तितली देखी आँख-मिचौली,
खेल-जीत इतराया सूरज।
पूर्व प्राथमिक के बच्चे सा,
नाक बहाता आया सूरज।।
भाता है ‘जन गण मन’ गाना,
चाहे दोहा-गीत सुनाना।
झूला झूले किरणों के सँग,
सुने न, कोयल मारे ताना।
मेघा देख, मोर सँग नाचे,
वर्षा-भीग नहाया सूरज।
पूर्व प्राथमिक के बच्चे सा,
झूला पा मुस्काया सूरज।।
खाँसा-छींका, आई रुलाई,
मैया दिशा झींक-खिसियाई।
बापू गगन डॉक्टर लाया,
डरा सूर्य जब सुई लगाई।
कड़वी गोली खा, संध्या का,
सपना देख न पाया सूरज।
पूर्व प्राथमिक के बच्चे सा,
कॉमिक पढ़ हर्षाया सूरज।।
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दोहा गीत-
जो अव्यक्त हो, व्यक्त है,
कण-कण में साकार।
काश! कभी हम पा सकें,
उसके भी दीदार।।
कंकर-कंकर में वही,
शंकर कहते लोग।
संग हुआ है किस तरह,
मक्का में? संजोग।
जगत्पिता जो दयामय,
महाकाल शशिनाथ।
भूतनाथ कामारि वह,
भस्म लगाए माथ।
भोगी-योगी सनातन,
नाद वही ओंकार।
काश! कभी हम पा सकें,
उसके भी दीदार।।
है अगम्य वह सुगम भी,
अवढरदानी ईश।
गरल गहे, अमृत लुटा,
भोला है जगदीश।
पुत्र न जो, उनका पिता,
उमानाथ गिरिजेश।
नगर न उसको सोहते,
रुचे वन्य परिवेश।
नीलकंठ नागेश हे!
बसो हृदय-आगार।
काश! कभी हम पा सकें,
उसके भी दीदार।।
– संजीव वर्मा सलिल





