ग़ज़ल-गाँव
ग़ज़ल-
अश्क़ आंखों के शहर से अलविदा हो जायेगा
प्यार ही जब जिंदगी से गुमशुदा हो जायेगा
जब किसी की चाहतों में चोट शामिल हो अगर
हर खुशी की आयतों का तरजुमा हो जायेगा
यार तुम मेरी नज़र को आज़माया ना करो
इस तरह दिल बेख़ुदी में बावला हो जायेगा
ग़म की ठहरी गर्मियों से वास्ता मत जोड़िये
ग़म हमारा और भी कुछ ग़मज़दा हो जायेगा
राह कब से देखती है ज़र्द चेहरों की चुभन
तेरे आते ही ये मौसम ख़ुशनुमा हो जायेगा
मानता हूँ आजकल कुछ हसरतों में होश है
फिर तुम्हारी आरज़ू में क्या से क्या हो जायेगा
मेरी ग़ज़लों के असर में तुम अगर आओ कभी
मेरे कपड़ों की महक भी काफिया हो जायेगा
हम उसी दिन फेंक देंगे मौजे-साहिल का पता
जब कोई सागर किसी का नाखुदा हो जायेगा
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ग़ज़ल-
बहुत उलझे अॅंधेरे हैं, चराग़ों का पता दे दो
नज़र कुछ भी नहीं आता, नज़ारों का पता दे दो
तेरी चुप्पी के पिंजरे में, कहाँ तक फड़फड़ाऊं मैं
बहुत भटके सवालों में, जवाबों का पता दे दो
न रुठे हम ख़िजाओं से, न रुठे हम पलाशों से
ज़रा खुशबू की चाहत है, गुलाबों का पता दे दो
बहुत दौड़े हैं यारों हम, दवाओं की दुकानों में
दवाओं में असर कम है, दुआओं का पता दे दो
मुहब्बत के मुहल्ले को, सलामत भी तो रखना है
मुहब्बत के मुसाफ़िर को, वफ़ाओं का पता दे दो
न रोकें हम परिंदों को, खुले अंबर में उड़ने से
परिन्दे पर कटे हों गर, पनाहों का पता दे दो
– सागर आनन्द





