मंथर गति से बहते समय चक्र के साथ आज का मानव जिस ‘विकास’ की अंधी दौड़ में दौड़ रहा है, उसने उसे प्रकृति से विमुख कर दिया है। विश्व पर्यावरण दिवस जैसे वैश्विक आयोजन आज के दौर की महती आवश्यकता बन गए हैं, परंतु विडंबना यह है कि धरा और प्रकृति के संरक्षण जैसे जीवन-मरण से जुड़े गंभीर विषय भी अब केवल ‘दिवसों’ की संकीर्ण परिधि में सिमट कर रह गए हैं। वर्ष के किसी एक नियत दिन को विशेष मानकर आयोजित होने वाली दृश्य कार्यक्रम परियोजनाएं (Event Management) वास्तव में पर्यावरण के प्रति हमारी सामूहिक चेतना को एकदिवसीय औपचारिकता में परिवर्तित कर देती हैं।
इसके विपरीत, यदि हम भारत की सांस्कृतिक, धार्मिक एवं सनातनी जीवन-यात्रा का सिंहावलोकन करें, तो पाएंगे कि यहाँ पर्यावरण संरक्षण कोई बाह्य एजेंडा, आयातित विचारधारा या केवल बौद्धिक विमर्श नहीं था; अपितु वह लोक-जीवन के दैनिक आचार-विचार, संस्कारों और सामाजिक ताने-बाने का अंतर्निहित हिस्सा था। हमारी परंपराओं में ऐसे उत्कृष्ट व्यावहारिक प्रतिमान स्थापित किए गए थे, जहाँ एक सामान्य व्यक्ति बिना किसी वैज्ञानिक पारिभाषिक शब्दावली को जाने, बिना किसी अकादमिक उपाधि के, अनजाने में ही प्रकृति संरक्षण के इतने वृहद् अनुष्ठान संपन्न कर जाता था जिनकी उपयोगिता की कोई सीमा नहीं थी।
आधुनिक छद्म-चेतना और विसंगतियाँ
आज आधुनिकता के इस तथाकथित दौर में व्यक्ति मंचों से, वातानुकूलित कमरों में बैठकर पर्यावरण संरक्षण की महती बातें तो करता है, परंतु धरातल पर उसकी सक्रियता केवल आभासी संसार (Social Media) की सुर्खियों तक सीमित है। किसी विशिष्ट दिवस पर पीपल के वृक्ष के सम्मुख मुद्रा (Pose) बनाकर चित्र खींचना, अथवा किसी विशाल वृक्ष की जड़ में थोड़ा सा जल अर्पित करते हुए छायाचित्र अपलोड कर देना ही आज की उपभोक्तावादी पीढ़ी का पर्यावरण-प्रेम बनकर रह गया है।
इस एकदिवसीय ‘स्टेटस’ और आभासी प्रशंसा मात्र से वह अपनी वैश्विक और नैतिक जिम्मेदारियों से इतिश्री (इति-सिद्धि) मान लेती है। यह छद्म-चेतना प्रकृति के वास्तविक संकट का समाधान नहीं, बल्कि आत्म-मुग्धता और आधुनिक जीवन की खोखली औपचारिकता का प्रदर्शन है। जब तक यह प्रदर्शन संरक्षण में नहीं बदलता, तब तक संकट कम नहीं होगा।
सनातनी परंपराओं में प्रच्छन्न पर्यावरण विज्ञान
जब हम अपनी सांस्कृतिक विरासत की ओर दृष्टिपात करते हैं, तो पूर्वजों की दूरदर्शिता विस्मयकारी और पूर्णतः वैज्ञानिक प्रतीत होती है। हमारे पूर्वजों ने प्रकृति को ‘भोग्या’ नहीं, बल्कि ‘माता’ माना था—माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः। भाद्रपद मास में ‘बछ बारस’ (वत्स द्वादशी) के दिन गो-वंश, बछड़े और प्रकृति की पूजा का विधान केवल एक रूढ़िवादी धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का माध्यम था। गोवंश और कृषि का सीधा संबंध भूमि की उर्वरा शक्ति और जैव विविधता से है, जिसे हमारे पूर्वज भली-भांति समझते थे।
इसी प्रकार, वैशाख मास की प्रचंड उत्ताप और तपती दोपहरी में, जब वनस्पति जगत को जल की सर्वाधिक आवश्यकता होती है, जलस्रोत सूखने लगते हैं और वर्षा ऋतु का आगमन दूर होता है, तब हमारी परंपराओं ने प्रकृति को एक अद्भुत सुरक्षा कवच प्रदान किया। भारतीय समाज में छोटी-छोटी कन्याओं द्वारा वैशाख मास में पूरे एक माह तक व्रत रखकर प्रतिदिन तुलसी, पीपल, वट (बरगद) और खेजड़ी जैसे पूजनीय एवं सर्वाधिक ऑक्सीजन देने वाले वृक्षों को नियमित रूप से जल अर्पित करने की परिपाटी स्थापित की गई।
यह केवल पूजा नहीं थी, बल्कि ग्रीष्म ऋतु के सबसे कठिन समय में जब बड़े-बड़े वृक्ष भी जल के अभाव में दम तोड़ देते हैं, तब लोक-चेतना द्वारा किया जाने वाला एक सामूहिक सिंचन अभियान था। इस पावन और निरंतर चलने वाली परंपरा ने सदियों से सुदूर अंचलों में हजारों-लाखों वृक्षों को नवजीवन प्रदान किया है। संतोष का विषय है कि आधुनिकता के क्रूर थपेड़ों के बाद भी ग्रामीण अंचलों में यह जीवनदायिनी परंपरा आज भी अक्षुण्ण है।
मरुधरा का अनुपम त्याग और जांभोजी का दर्शन
पश्चिमी राजस्थान की रेतीली धरा, धोरों और विषम भौगोलिक परिस्थितियों के बीच पर्यावरण संरक्षण का सबसे प्रदीप्त, जीवंत और अकाट्य उदाहरण गुरु जंभेश्वर भगवान (जांभोजी) के दर्शन में मिलता है। १५वीं शताब्दी (वर्ष १४८५) में जब अकाल और प्राकृतिक आपदाओं ने मारवाड़ की धरती को झकझोर दिया था, तब गुरु जंभेश्वर भगवान ने समराथल धोरे पर बिश्नोई पंथ की स्थापना की और समाज को ‘२९ (उन्तीस) नियम’ दिए। इन नियमों में से दो नियम ऐसे थे जिन्होंने मरुभूमि की नियति ही बदल दी:
“जीव दया पालणी, रूंख लीलो नहीं घावे” अर्थात् सभी जीवों पर दया करो और हरे वृक्ष को कभी मत काटो।
सुदूर मरुभूमि में यदि आज भी भीषण गर्मी के बावजूद हरित खेजड़ी और वन्यजीव (विशेषकर चिंकारा और कृष्णमृग/हिरण) बिना किसी भय के स्वच्छंद विचरण कर रहे हैं, तो यह गुरु जंभेश्वर भगवान द्वारा प्रतिपादित इन्हीं नियमों की जीवंत परिणति है। इस परंपरा में वृक्षों और मूक जीवों की रक्षा को स्वयं के प्राणों से भी अधिक पुनीत, सर्वोपरि और मोक्ष का साधन माना गया है।
इसी आध्यात्मिक चेतना की पराकाष्ठा वर्ष १७३० में जोधपुर के ‘खेजड़ली गाँव के आत्मोत्सर्ग’ में दिखाई देती है। जब जोधपुर रियासत के महाराजा के आदेश पर महल निर्माण के लिए हरे खेजड़ी के वृक्षों को काटने सैनिक पहुँचे, तब अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में ३६३ (363) विष्णुपद-अनुगामी सहयात्रियों ने वृक्षों को अपने आलिंगन में ले लिया। “सिर साठे रूंख रहे तो भी सस्तो जाण” (अर्थात् यदि सिर कटने पर भी एक वृक्ष बच जाता है, तो यह सौदा बहुत सस्ता है) का यह महामंत्र गूंजा और देखते ही देखते ३६३ स्त्री-पुरुषों और बच्चों ने वृक्षों की रक्षा में अपने प्राणों की आहुति दे दी। वैश्विक इतिहास में चिपको आंदोलन की जननी माने जाने वाली यह घटना पर्यावरण संरक्षण का सबसे अनुपम, अद्वितीय और रोंगटे खड़े कर देने वाला अध्याय है।
भारतीय वांग्मय में पर्यावरण संरक्षण के अन्य प्रदीप्त उदाहरण
पर्यावरण संरक्षण की यह दृष्टि केवल राजस्थान तक सीमित नहीं रही, बल्कि भारत के कोने-कोने में विभिन्न रूपों में बिखरी हुई है:
उत्तराखंड का चिपको और ऐपण आंदोलन: खेजड़ली की इसी चेतना से प्रेरणा पाकर आधुनिक भारत में सत्तर के दशक में उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालय में सुंदरलाल बहुगुणा, चंडी प्रसाद भट्ट और गौरा देवी के नेतृत्व में ‘चिपको आंदोलन’ का सूत्रपात हुआ। वहाँ की ग्रामीण महिलाओं ने जंगलों को ठेकेदारों की कुल्हाड़ियों से बचाने के लिए पेड़ों को गले लगा लिया। यह इस बात का प्रमाण है कि भारतीय मानस के अवचेतन में आज भी वृक्षों के प्रति वही सनातनी ममत्व जीवित है।
कर्नाटक का ‘सालूमरदा थिमक्का’ का आदर्श: दक्षिण भारत में कर्नाटक की एक साधारण, अशिक्षित और निर्धन महिला सालूमरदा थिमक्का ने कोई संतान न होने के दुःख को प्रकृति सेवा में बदल दिया। उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर हुलिकल और कुदूर के बीच राजमार्ग के किनारे बरगद के ४०० से अधिक पौधों को रोपा और उन्हें अपनी संतान की तरह पाला। आज वे वृक्ष वटवृक्ष बन चुके हैं। थिमक्का का यह प्रयास आधुनिक ‘इवेंट मैनेजमेंट’ करने वालों के गाल पर एक करारा तमाचा है।
धार्मिक वन (ओरण और देवबनी की परंपरा): भारत के ग्रामीण अंचलों में ‘ओरण’ (Sacred Groves) या ‘देवबनी’ की एक अत्यंत सुदृढ़ परंपरा रही है। गाँव के मंदिर या स्थानीय देवता की भूमि के चारों ओर के जंगल को ओरण घोषित कर दिया जाता है। इस क्षेत्र से एक सूखी लकड़ी काटना भी पाप और सामाजिक रूप से वर्जित माना जाता है। यह ओरण वास्तव में जैव विविधता के ऐसे प्राकृतिक बैंक हैं, जिन्होंने बिना किसी सरकारी फेंसिंग या वन रक्षकों के, सदियों से स्थानीय वनस्पतियों और जंतुओं को विलुप्त होने से बचाया है।
समकालीन संघर्ष: चेतना का विस्तार
यह अत्यंत संतोषजनक और सुखद है कि पर्यावरण संरक्षण की यह सनातन अविरल परंपरा सुदूर ग्रामीण जीवन और लोक-चेतना में आज भी पूरी जीवंतता के साथ धड़क रही है। जब आधुनिक विकास, शहरीकरण और औद्योगीकरण की अंधी दौड़ में मरुधरा के गौरव ‘खेजड़ी’ के वृक्षों पर कुल्हाड़ी चलती है, तो जनचेतना मौन नहीं रहती। पश्चिमी राजस्थान की उसी पावन माटी से निकला, भले ही आधुनिक अकादमिक अर्थों में अनपढ़ या कम पढ़ा-लिखा प्रतीत होने वाला जनमानस, अपनी सहज पर्यावरण-चेतना के साथ उठ खड़ा होता है।
अपनी माटी, अपनी संस्कृति और वनस्पति के अधिकारों के लिए सुदूर ग्रामीण अंचलों से निकलकर राजधानी जयपुर में विधानसभा के घेराव तक का संकल्प, इस बात का जीवंत प्रमाण है कि यह लड़ाई केवल कागजों पर नहीं, बल्कि धरातल पर लड़ी जा रही है। वहीं दूसरी ओर, स्थानीय सजग जनप्रतिनिधियों द्वारा सदन (विधानसभा) के भीतर खेजड़ी के अनियंत्रित कटान और पर्यावरण विनाश के विरुद्ध उठाई जाने वाली बुलंद आवाज यह दर्शाती है कि हमारी पारंपरिक लोक-नीति अब राज्य-नीति को भी झकझोरने की क्षमता रखती है। यह अनपढ़ व्यक्ति और सजग राजनेता मिलकर सिद्ध करते हैं कि भारतीय जनमानस का पर्यावरण से नाता आज भी आत्मिक है, केवल वैधानिक या औपचारिक नहीं।
उपसंहार
विश्व पर्यावरण दिवस की वास्तविक सार्थकता केवल वर्ष में एक दिन उत्सव मनाने, संगोष्ठियाँ आयोजित करने या प्रतीकात्मक और दिखावटी पौधारोपण में कतई नहीं है। इसकी वास्तविक सार्थकता तब सिद्ध होगी जब हम पश्चिमी जगत की ‘प्रकृति-विजेता’ और ‘उपभोगवादी’ दृष्टि को पूरी तरह त्यागकर अपने पूर्वजों की ‘सह-अस्तित्व’, ‘पारस्परिक निर्भरता’ और ‘अपरिग्रह’ की सनातनी दृष्टि को पुनः अपने दैनिक जीवन में अंगीकार करेंगे।
हमें यह समझना होगा कि हम प्रकृति से अलग नहीं हैं, बल्कि प्रकृति का ही एक छोटा सा हिस्सा हैं। हमें प्रकृति का अंधाधुंध दोहन (Exploitation) बंद कर उसका पोषण (Nurturing) करना होगा। जब तक प्रत्येक व्यक्ति के भीतर गुरु जंभेश्वर भगवान की ‘जीव दया’ और अमृता देवी का ‘तपोनिष्ठ संकल्प’ जागृत नहीं होगा, तब तक जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापन (Global Warming) जैसी विभीषिकाओं से मुक्ति असंभव है। आइए, इस पर्यावरण दिवस पर हम सोशल मीडिया के आभासी ‘स्टेटस’ से बाहर निकलकर, अपनी समृद्ध सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौटें और इस वसुंधरा को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित, हरित और सजीव बनाने का वास्तविक संकल्प लें।





