राजमार्ग पर यात्रा करते समय प्रायः मालवाहक ट्रकों के पीछे लिखी छोटी-छोटी अनगिनत उपदेशात्मक पंक्तियाँ पढ़ने को मिल जाती हैं, कभी हास्य में लिपटी, तो कभी गहन जीवन-दर्शन को समेटे । उस दिन यात्रा के दौरान एक ट्रक के पीछे लिखा दिखा – “देह धरे का दण्ड है” । जब तक वह गाड़ी मेरी आँखों के सामने रही, मैं उसे बार-बार पढ़ता रहा । समझ नहीं पा रहा था कि यह ‘देह धरे का दण्ड’ आख़िर मिला किसे है ? उस ट्रक-चालक को, या उन पंक्तियों को पढ़ने वाले मेरे जैसे राहगीरों को, या फिर समूचे जगतवासी को ? मेरी गाड़ी तो कब की उसे ओवरटेक करके आगे निकल गई और मैं बड़ी सहजता से अपने घर पहुँच भी गया, किन्तु वह छोटी-सी उक्ति मेरा पीछा न छोड़ । वह बार-बार प्रश्न बनकर मन को कुरेदने लगी, और आज भी मेरी बुद्धि को उसी दृढ़ता से ‘धरे’ हुए है ।
पहली दृष्टि में यह उक्ति जीवन के प्रति मानवीय निराशा को ही उद्घोषित करती प्रतीत हुई, मानो शरीर धारण करना अपने आप में भारी दण्ड हो । तो क्या इसका अर्थ यह हुआ कि हम सब धरती पर किसी न किसी ‘दण्ड’ को भोगने के लिए ही जन्म लेते हैं, जैसे पौराणिक कथाओं में देवी-देवता श्रापवश धरती पर अवतरित होते है और दण्ड या श्राप की अवधि पूर्ण कर अपने पूर्व-धाम को लौट जाते हैं ? पर मन इस तर्क को सहज स्वीकार करने को तैयार न था; उसे तो समझाना ही पड़ेगा । सो मैं इस उक्ति के मूल स्रोत की खोज में जुट गया । कई दिनों तक यत्र-तत्र भटकता रहा । स्रोत कभी-कभी वस्तु या विचार के विषय में बहुत कुछ कह ही देता है । फिर संभावित भावार्थ के आधार पर कई भक्त-कवियों और संतों की वाणी को टटोली, पन्ना-दर-पन्ना खँगाला, और अंततः वह उक्ति मुझे ‘कबीर वाणी-संग्रह’ के एक कोने में शांत विराजी मिली । उसे पाकर मन को जैसे विश्राम मिला । मैंने महात्मा कबीर की उस निर्लिप्त, फक्कड़ाना मस्ती को सादर नमन किया –
‘देह धरे का दंड है, हर काहू को होय ।
ज्ञानी काटे ज्ञान से, मूरख काटे रोय ।।’
भावार्थ – ‘मनुष्य को शरीर धारण करने पर जीवनगत सुख-दुःख व कष्ट भुगतने ही पड़ते हैं । ज्ञानी व्यक्ति समझदारी व संतोष के साथ उन कष्टों को सह लेता है, लेकिन मूर्ख व्यक्ति अपनी अज्ञानता के कारण जीवन को रोते हुए बिताता है ।’
एक लोकमान्यता भी है कि देह धारण करते ही जीव को सुख-दुःख, रोग और मृत्यु को भोगना अवश्यम्भावी हो जाता है । कबीर जैसे निर्मोही संतों ने भी इसी सत्य की पुष्टि की है । संसार में आते ही जीव भूख, चोट, विरह, रोग और असफलता जैसे नाना कष्टों को आत्मसात करने लगता है, और बौद्धिक क्षमता के विकास के साथ-साथ कर्म, सम्बन्ध, आत्म-विकास तथा उत्तरदायित्व के क्षेत्र में भी क्रमशः वह आगे बढ़ता जाता है । जीवन के सुख-दुःख, सफलता-असफलता, संघर्ष-सेवा आदि के साथ परिवार, समाज, राष्ट्र और प्रकृति के प्रति उसके उत्तरदायित्व परस्पर मिलकर उसके जीवन को पूर्णता प्रदान करते हैं । वह आजीवन इन्हीं सांसारिक बंधनों में बँधा रहता है । किन्तु ध्यान देने योग्य बात यह है कि ‘विधना का दण्ड’ एक निश्चित समय-सीमा तक ही रहता है, जबकि उत्तरदायित्व जीवन के अंतिम क्षण तक व्यक्ति का साथ नहीं छोड़ता है । भारतीय दर्शन में देह का महत्त्व इसलिए नहीं कि वह केवल विद्यमान है, अपितु इसलिए कि वह हृदय-मस्तिष्क के भावों को कार्य-रूप प्रदान करने का माध्यम बनती है । आँखें केवल देखने के लिए नहीं, करुणा जगाने के लिए हैं; हाथ केवल धारण करने के लिए नहीं, सेवा करने के लिए हैं; वाणी केवल बोलने के लिए नहीं, सत्य और मधुरता उड़ेलने के लिए है । अर्थात् देह का मूल्य उसकी संरचना में नहीं, उसके सदुपयोग में निहित है ।
भारतीय पुराणों और महाकाव्यों में ऐसे अनेक प्रसंग मिलते हैं, जहाँ देवता, ऋषि, द्वारपाल या गंधर्व श्रापग्रस्त होकर पृथ्वी पर जन्म लेते हैं । पहली दृष्टि में उनका देह-धारण दण्ड ही प्रतीत होता है, परंतु कथा जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, वही श्राप किसी बड़े लोककल्याण-कार्य का माध्यम बनकर प्रकट होता है । ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ के अनेक पात्रों का जन्म ऐसे ही किसी पूर्व-प्रसंग, वरदान या श्राप से जुड़ा हुआ मिलता है । जब तक हम जीवन को केवल घटना और कष्ट के धरातल पर देखते हैं, तब तक देह-धारण श्राप या दण्ड ही जान पड़ता है; किन्तु जब उसके उद्देश्य पर दृष्टि जाती है, तब वही श्राप एक विशिष्ट उत्तरदायित्व का माध्यम बन जाता है । इस दृष्टि से देह धारण करना केवल कर्मफल भोगना नहीं, अपितु ईश्वर द्वारा सौंपे गए उत्तरदायित्वों को निभाने का दुर्लभ अवसर भी है । अनेक महापुरुषों के जन्म के मूल में भी उनका व्यक्तिगत कर्मफल नहीं, अपितु व्यापक धर्म-स्थापना का उद्देश्य रहा है । भागवत पुराण में भगवान के अवतार-ग्रहण का प्रयोजन केवल दुष्ट-दमन नहीं, बल्कि धर्म-संस्थापन, भक्त-रक्षा और लोकमंगल भी बताया गया है । श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं –
‘यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥’ – भगवद्गीता, 4.7
अर्थात – ‘हे भारत (अर्जुन) ! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब-तब मैं स्वयं को धरती पर प्रकट करता हूँ, यानी अवतार लेता हूँ ।’
अतः ‘देह धारण’ को केवल अज्ञात दण्ड या सजा के रूप में देखना उचित नहीं है, अपितु इसे सांसारिक जीवन के उत्तरदायित्व के रूप में देखना ही समीचीन होगा । आध्यात्मिक दृष्टि से भी देह धारण, पूर्वकर्मों के फल भोगने के साथ-साथ आत्मोन्नति, पुरुषार्थ और अंततः लोकमंगल तथा निःश्रेयस की ओर बढ़ने का दुर्लभ अवसर ही माना गया है । देवावतारों और श्राप-कथाओं के पीछे भी यही विराट संभावना छिपी है – कि जीवन-ग्रहण केवल दण्ड नहीं, दायित्व-वहन का माध्यम भी है । इसके समर्थन में श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण की एक उक्ति द्रष्टव्य है –
‘न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥’ — भगवद्गीता, 18.11
अर्थात – ‘देह धारण करने वाले जीव के लिए कर्म का पूर्णतः त्याग संभव नहीं है । वास्तविक त्याग कर्म से प्राप्त फल के प्रति आसक्ति का त्याग हुआ करता है ।’ इसमें प्रयुक्त ‘कर्म’ को ‘उत्तरदायित्व’ के रूप में देखना ही अधिक समीचीन होगा ।
‘देह धरे का दण्ड है’ – इस उक्ति में एक और सूक्ष्म संकेत छिपा हुआ है । मनुष्य प्रायः यह मान बैठता है कि देह उसकी अपनी है, इसलिए वह इसके माध्यम से जो चाहे, वह कर सकता है, पूर्ण स्वतंत्र है । परंतु भारतीय दर्शन कहता है कि ‘देह’ का अर्थ केवल ‘शरीर’ नहीं, इसके साथ बँधी हुई ‘मर्यादा’ भी है । भूख लगेगी तो भोजन करना ही होगा, रोग होगा तो उपचार लेना ही होगा, वृद्धावस्था आएगी तो उसे स्वीकार करना ही होगा । अर्थात् देह हमें निरंतर स्मरण कराती रहती है कि हम प्रकृति के नियमों से ऊपर नहीं, बल्कि उसके शाश्वत विधान में एक साधन-मात्र हैं । यह उक्ति हमें अधिकारों की अपेक्षा कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों की ओर अधिक उन्मुख करती है । आज जब सर्वत्र अधिकार प्राप्ति की लालसा प्रबल है और कर्तव्य की चर्चा लगभग नगण्य है, तब यह छोटी-सी उक्ति, मानो पुकार-पुकार कर कह रही है – ‘जब देह धारण किया है, तब दायित्व भी धारण करो ।’
अपनी दृष्टि को कुछ और व्यापक बनाकर एक बार समाज पर भी नजर डालते है, तो पाते हैं कि आज संसार में मूलतः दो प्रकार के लोग दिखाई देते हैं – एक, जो देह के लिए जीते हैं, और दूसरे, जो देह से जीते हैं । बात सरल है, पर आशय भिन्न है । पहले श्रेणी के लोग सदैव सुखों के पीछे भागते रहते हैं, उनके लिए भौतिक सुख-संपन्नता ही जीवन का चरम लक्ष्य होता है, इससे इतर वे कुछ अन्य सोच ही नहीं पाते हैं । दूसरी श्रेणी के लोग, अपने शरीर का उपयोग निज स्वार्थ के लिए नहीं, वरन दूसरों के हित की रक्षा के लिए करते हैं; सांसारिक साधनों में से वे केवल आवश्यक पोषण-मात्र ही ग्रहण करते हैं, शेष का परित्याग ही उनके जीवन का ध्येय बन जाता है ।
दोनों ही श्रेणी के लोग देह धारण किए हुए हैं, परन्तु उनका उद्देश्य ही उन्हें एक-दूसरे से भिन्न बनाता है । देह धारण करना केवल कर्मफल भोगने का माध्यम नहीं, लोककल्याण का साधन भी है । पारिवारिक स्तर पर माता-पिता, भाई-बहन, पुत्र-पुत्री आदि सबका एक-दूसरे के प्रति धर्म है, उत्तरदायित्व है । सम्बन्ध जितने मधुर होंगे, जिम्मेदारियाँ उतनी ही प्रगाढ़ होंगी । सामाजिक स्तर पर दूसरों के अधिकारों का सम्मान, सत्य-भाषण, न्याय और सहयोग आवश्यक हो जाता है । जिस भूमि पर हमने जन्म लिया, जिसके अन्न-जल-वायु से यह देह सिरजी है, उस राष्ट्र के प्रति भी हमारा विशेष कर्तव्य है । नागरिकता केवल अधिकार प्राप्ति का नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व निर्वाहन का भी विषय हुआ करता है । प्राकृतिक स्तर पर हमारा शरीर प्रकृति के ही भिन्न तत्वों से निर्मित है, इसलिए हमारा जीवन या देह प्रकृति का ऋणी भी है । वायु, जल, अन्न और वनस्पति का संरक्षण भी उसी ‘दण्ड’ या उत्तरदायित्व का विस्तार माना जा सकता है ।
भारतीय परंपरा में मनुष्य को देव-ऋण, ऋषि-ऋण, प्रकृति-ऋण, पितृ-ऋण और मनुष्य-ऋण – इन पंच-ऋणों का ऋणी माना गया है । संभव है, ‘देह धरे का दण्ड है’ उक्ति इन्हीं ऋण-सम्बन्धी सत्य को ही पूर्णता प्रदान करती हो । शरीर मिला है, तो उसके साथ ऋण भी स्वतः मिल गए हैं, उन ऋणों से जुड़े उत्तरदायित्व भी मिले हैं, और इन्हीं को चुकाते जाने का नाम यह जीवन है ।
यदि कोई माता अपने शिशु के लिए रात-रात भर जागती है, तो क्या वह दण्ड भोग रही है ? साधारण दृष्टि से देखें, तो उसकी थकान, उसका जागरण, ‘दण्ड’ ही प्रतीत होता है । पर वही माता कह उठती है – ‘बच्चे के लिए जागना कोई दण्ड नहीं, मेरा सौभाग्य है ।’ कोई शिक्षक प्रतिदिन सैकड़ों विद्यार्थियों के बीच अपना समय, धैर्य और ऊर्जा लगाता है, कभी-कभी उनसे उपेक्षा भी सहता है, तो क्या यह उसके लिए दण्ड है ? यदि शिक्षक केवल स्वयं तक सीमित रहकर देखे, तो यह उसे कष्ट या दण्ड ही प्रतीत होगा; परन्तु यदि वह इसे अपने धर्म-कर्म या उत्तरदायित्व के रूप में देखता है, तो वही कार्य उसके लिए आनन्द का स्रोत बन जाता है । यही बात सब पर लागू होती है ।
देह धारण केवल कष्ट का कारण नहीं, समस्त मानवीय कार्य का माध्यम भी है । यदि देह धारण में केवल पीड़ा है, तो यह अधूरा सत्य है; यदि इसमें केवल आनन्द है, तो भी यह अधूरा सत्य ही है । संभवतः इसका पूर्ण अर्थ यह है कि देह के साथ सुख भी अनिवार्य है और दुःख भी; अधिकार भी आते हैं, दायित्व भी; बंधन भी आते हैं और उनसे मुक्ति की संभावना भी । इन सभी के आनुपातिक संयोग से ही मनुष्य अपने सर्वोच्च व्यक्तित्व का निर्माण कर पाता है ।
कभी-कभी आँखों के सामने घटित घटना भी सत्य से बहुत दूर, असत्य-सी प्रतीत होती है, परंतु वही कभी-कभी वही घटना जीवन का मूल मंत्र बन जाया करती है । मनुष्य का स्वभाव ही है, किसी घटना का केवल दृश्य पक्ष देखने का; उसके अदृश्य पक्ष तक हमारी दृष्टि कम ही जाती है, या हम उसे देखना ही नहीं चाहते है । एक अबोध बालक सोचता है – ‘पिता ने मुझे अप्पनों से इतनी दूर बोर्डिंग-स्कूल में क्यों भेज दिया ?’ वह अबोध बालक केवल वियोग के रूप में अपने कष्ट को देखता है, जबकि अनुभवी पिता उसके दूरगामी भविष्य को देखता है । विद्यार्थी सोचता है – ‘गुरु जी इतने कठोर क्यों हैं, केवल डाँटते-फटकारते रहते हैं ?’ तो गुरु जी अपने छात्र के तात्कालिक सुख-दु:ख नहीं, बल्कि उसके चरित्र-निर्माण पर दृष्टि रखते हैं । इसी तरह रोगी सोचता है – ‘चिकित्सक ने इतनी पीड़ादायक शल्य-क्रिया क्यों की ?’ – चिकित्सक उसके तत्कालीन पीड़ा नहीं, बल्कि बाद के उसके स्वस्थ जीवन को देखता है । अर्थात् हमारी दृष्टि वर्तमान पर ही रुकी रहती है, जबकि अनुभवी व्यक्ति की दृष्टि वर्तमान कष्टों से परे हमारे उज्ज्वल और सुदृढ़ भविष्य तक पहुँच जाती है ।
जहाँ कर्तव्य होंगे, वहाँ स्वाभाविक रूप से परिश्रम होगा, कष्ट होगा, संघर्ष होगा; सफलता भी मिलेगी, असफलता भी; सम्मान भी मिलेगा, उपेक्षा भी; सुख भी आएगा, दुःख भी । पर अंततः एक सुखद संतुष्टि की प्राप्ति होती है । इस प्रकार जीवन एक समग्र अनुभव है । दण्ड बाहर से कठोर दिखता है, पर भीतर से प्रेम का ही सबसे मसृण स्वरूप होता है । जैसे इक्षुदण्ड की बाहरी कठोरता के भीतर मधुर रस छिपा रहता है । स्वामी विवेकानन्द बार-बार कहते थे कि मनुष्य का जीवन कर्म से भागने के लिए नहीं, कर्म में योग देने के लिए है । जीवन का उद्देश्य निष्क्रिय बैठकर भाग्य के भरोसे रहना नहीं, अपितु सक्रिय रूप से कर्मयोग अपनाकर समाज और मानवता की सेवा करना है ।
प्रतीत होता है कि यहाँ ‘दण्ड’ का आशय केवल कष्ट सहना नहीं, बल्कि भविष्य के लिए एक मजबूत आधार तैयार करना भी है । कभी-कभी ‘दण्ड’ का अर्थ बदलकर, अपने प्रियजन को आवश्यक कष्ट सहने देना भी हो जाता है । माता-पिता के लिए इससे बड़ा दण्ड और क्या होगा कि वे अपने बच्चे को बार-बार गिरते, संघर्ष करते, असफल होते हुए देखें ? वे चाहें तो अपने कोमल स्नेह की छाया में रखकर उसे इन कष्टप्रद स्थितियों से बचा भी सकते हैं, पर यदि थोड़े से कष्ट को देखकर विचलित हो जाएँ और उसे कठिन परिस्थितियों में न पड़ने देवें, तो वह बच्चा कभी आगे बढ़ना न सीखेगा, भौतिक और सांसारिक आपदाएँ उसे मरोड़ देंगी । स्नेह का सर्वोच्च रूप सदा संरक्षण में ही नहीं होता, कभी-कभी विपरीत परिस्थिति में अकेला छोड़ना भी उसके सुनहले भविष्य के निर्माण में सहायक होता है । लेकिन इसके साथ ही सदैव कठोरता भी उचित नहीं । यदि कोई माता-पिता, गुरु, चिकित्सक या शासक ‘तुम्हारे भले के लिए यह कर रहा हूँ’ कहकर क्रूरता करे, तो उसे भी सत्य नहीं माना जा सकता ।
माता-पिता को तब सुखद आनंद की प्राप्ति होती है, जब उनकी संतान अपने पैरों पर खड़ी होकर समस्त सांसारिक उत्तरदायित्व वहन करने में सक्षम हो जाती है । शिक्षक को तब आनंद मिलता है, जब उसका शिष्य जीवन की सभी परीक्षाओं में सफल होकर एक सदाचारी प्रतिष्ठित नागरिक बनता है । सैनिक को तब आनंद मिलता है, जब उसका राष्ट्र पूर्ण सुरक्षित रहता है । किसान के चेहरे पर तब मुस्कान बिखरती है, जब उसके खेतों में फसल लहलहाती है । इन सबके आनन्द का स्रोत उनका व्यक्तिगत सुख नहीं, उनके कार्य की सार्थकता है, जिससे वे पूर्ण संतुष्ट होते हैं । इसलिए हमें दो बातों पर आत्म-केन्द्रित होना होगा – प्रथम, करुणा और प्रेम से उपजी कठोरता, जिसका उद्देश्य सर्वदा दूसरे का विकास हो; ऐसी कठोरता, जिसके पीछे नि:स्वार्थ प्रेम, दूरदृष्टि और उत्तरदायित्व हो, वस्तुतः करुणा का ही दूसरा रूप है, और इसे सहर्ष स्वीकार करना चाहिए । द्वितीय, अहंकार या क्रोध से उपजी कठोरता, जिसका उद्देश्य दूसरों पर जबरन अपनी इच्छा को थोपना और उसे कष्ट पहुँचाना हो । इसे कदापि स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसमें हित की अपेक्षा दुःख पहुँचाने की भावना ही प्रबल होती है ।
सामान्यतः हम ‘दण्ड’ को केवल कष्टदायक वस्तु मानते हैं, जबकि ‘देह धरे का दण्ड है’ उक्ति में ‘दण्ड’ अर्थात, उत्तरदायित्व निभाने की वस्तु बनकर हमारे सम्मुख आया है । यही दृष्टि इस उक्ति को कहीं और अधिक जीवनोन्मुख और प्रेरणादायी बना देती है । कहा भी जाता है कि माता-पिता, गुरु और चिकित्सक में ईश्वर बसते हैं, जिनकी कठोरता के पीछे कोमल स्नेह छुपा रहता है । वे भला अपने बच्चों, अपने छात्रों या अपने रोगियों की हानि कैसे कर सकते हैं ? हम सब प्रायः तात्कालिक लाभ को ही प्रश्रय देते हैं, दूरगामी लाभ को नहीं, और इसी कारण जीवन में अक्सर धोखा खा जाते हैं ।
‘देह धरे का दण्ड है’ – भले ही यह उक्ति मेरे भीतर अब भी प्रश्न बनकर घूम रही है, पर अब मुझे इसमें दण्ड की कठोरता की ध्वनि कम और उत्तरदायित्व की गंभीर पुकार अधिक सुनाई दे रही है । संभव है, इसी पुकार का सम्यक् प्रत्युत्तर देने में ही मनुष्य-जीवन की सार्थकता निहित हो । इस प्रकार देह धारण करना, स्वतंत्र जीवन प्राप्त करना नहीं, अपितु जीवन को सार्थक बनाने के लिए विविध उत्तरदायित्वों को पूर्ण करना है । यह संसार कर्म-प्रधान है, और इसमें ‘देह’ का वास्तविक महत्व ‘कर्म’ विशेष से ही है । श्रीराम भक्त-प्रवर और जीवन में कर्म को ही प्रधान मनाने वाले लोक कल्याणकारी दार्शनिक गोस्वामी तुलसीदास ने भी यही माना है –
“करम प्रधान बिस्व करि राखा ।”







