व्यक्तिगत रूप से प्रतिवर्ष बड़ी उत्सुकता के साथ राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान द्वारा आयोजित होने वाले नाट्यमहोत्सव की प्रतीक्षा करता रहता हूँ। यद्यपि इस नाट्यमहोत्सव की पूर्व-भूमिका से अधिकृत रूप से जुड़ा हुआ न होने पर भी हमेशा, अपने आपको संस्थान के इस चतुर्थ यज्ञात्मक अनुष्ठान से गहरे भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ पाता हूँ। इस का कारण केवल यही है कि आरम्भ में “वसन्त-महोत्सव” और बाद में “कौमुदीमहोत्सव” तथा अब “नाट्यमहोत्सव” के रूप में प्रतिवर्ष निर्बाधरूप से आयोजित होने वाले संस्थान के इस लोकोपकारी, विशेषरूप से समृद्ध संस्कृत-रंगकर्म के उपकारी अनुष्ठान के पहले उपक्रम से ही मुझे निर्णायक के रूप में सेवा करने का सौभाग्य मिलता रहा है।
संस्थान के तत्कालीन कुलपति आचार्य कुटुम्बशास्त्री जी के कार्यकाल से [सन्-2004 से] शुरू हुये वसन्तोत्सव को आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी जी ने अपने कुलपतित्व में पल्लवित किया और अब आचार्य परमेश्वरनारायणशास्त्री जी के कुलपतित्व में इस वर्ष [24 से 26 फरवरी 2016] सम्पन्न हो रहे इस तेरहवें प्रहसन के महासंगम-रूप नाट्य-महोत्सव की समीक्षात्मक आलोचना से पूर्व, पूर्व-पीठिका के रूप में कुछ कहना समुचित होगा।
पूर्व-पीठिका –
जब वर्ष-2004 में प्रथम “वसन्त-महोत्सव” के रूप में “आन्ध्रभवन”, दिल्ली के प्रेक्षागृह में यह आयोजन सम्पन्न हुआ तो सभी संस्कृतानुरागी, रंगकर्म-प्रेमी और संस्कृत-छात्रअध्यापक एक विचित्र-सी अनुभूति से भरे हुए थे, एक आशा और एक परिवर्तन की अपेक्षा के साथ।
“आन्ध्रभवन” का प्रेक्षागृह इस प्रकार के स्पर्धात्मक नाट्य-महोत्सव के लिए छोटा होने से, बाद के बहुत-सारे नाट्य-महोत्सव एल.टी.जी. प्रेक्षागार [मण्डी-हाउस], कमानी आडीटोरियम, हिन्दूमहाविद्यालय प्रेक्षागृह और श्रीशंकरलाल-प्रेक्षागृह में आयोजित किये गये। इस तेरहवें नाट्यमहोत्सव की उल्लेखनीय विशेषता यही मानी जायेगी कि नाट्य-महोत्सव के संयोजक आचार्य रमाकान्त पाण्डेय के रचनात्मक प्रयासों के कारण पहली बार सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन् सभागार [केन्द्रीय विद्यालय-2, दिल्ली-केन्ट] जैसा अधुनातन-सुविधा और तकनीकी-विशेषता से लैस विशाल प्रेक्षागृह मिला जिसका पूरा उपयोग, प्रहसन प्रस्तुत करते हुए, विभिन्न परिसरों ने किया। इसी कड़ी में एक और बात जोड़ना चाहूँगा कि इस वर्ष पहली बार इस नाट्य-महोत्सव से पहले “प्रेस-क्लब” में औपचारिक “प्रेस-कॉन्फ्रेन्स” [23 फरवरी 2016] का आयोजन करके इस महोत्सव को राजधानी के अन्य रंग-महोत्सवों की मुख्यधारा के साथ जोड़ने का अच्छा प्रयास किया गया है जिसका पूर्ण श्रेय माननीय कुलपति एवं संयोजक को जाता है।
एक और उपलब्धि
आचार्य राधावल्लभ जी के कार्यकाल की अनेक विशिष्ट उपलब्धियों में से एक है-भोपाल-परिसर में नाट्य-अनुसन्धान केन्द्र का शुभारम्भ। इस तेरहवें नाट्य-महोत्सव–
के पूर्वरंग को देखकर संस्कृत-रंगप्रेमियों को अवश्यमेव एक सुखद अनुभूति हुयी होगी कि इस नाट्य-अनुसन्धानकेन्द्र के प्रयासों के कारण पूर्वरंग के सभी [भोपालपरिसर के] कलाकारों की रंग-अभिव्यक्ति नि:सन्देह रमणीय और हृदयावर्जक थी। पूर्वरंग के संगीत और रंगमंच की नाट्यधर्मी सज्जा का विशेष उल्लेख करना आवश्यक होगा।
लटकमेलकम्” और “बच्चकपच्चकम्
रा.सं.सं. के जम्मू-स्थित श्रीरणवीर-परिसर के विद्यार्थियों ने लोकप्रिय प्रहसन “लटक-मेलकम्” की प्रस्तुति करके यह बात सिद्ध कर दी कि इस परिसर में रंगविधान और नाट्य-शिल्प के बारे में अध्यापक और छात्र अब विशेष ध्यान देने लगे हैं। श्रीराधाचर अनुकर्त्तन के प्रभाव से यह प्रस्तुति अधिक मनोरंजक बन पड़ी है। कुछ पात्रों के संवाद बहुत धीमे स्वर से बोले जाने के कारण सहजतया श्रुतिगम्य नहीं थे। नाट्य के पूर्वाभ्यास के समय इन बातों पर खास ध्यान देने से इस कमी को पूरा किया जा सकता है। “लटक-मेलकम्” का निर्देशन सधा हुआ और आकर्षक लगा। प्रो.जी.एस.आर.कृष्णमूर्ति द्वारा प्रणीत और रा.सं.सं. के अगरतला स्थित एकलव्य-परिसर के छात्रों द्वारा प्रस्तुत “बच्चकपच्चकम्” में विविध अभिनेता और अभिनेत्रियों की भावाभिव्यक्ति संवादानुकूल लगने से प्रहसन का उद्देश्य सहज ही सिद्ध होता है। हाँ, कुछ पात्रों को संवादों का बोलने का अधिक अभ्यास करवाया जाता तो प्रहसन अति कसा हुआ और प्रभावी लगता। नि:सन्देह इस प्रहसन का आहार्य-पक्ष उत्तम रहा।
इसी क्रम में अगर हम, श्रीजीवन्यायतीर्थ भट्टाचार्य द्वारा विरचित और रा.सं.सं. के मुम्बई-स्थित सोमैया-परिसर द्वारा प्रस्तुत प्रहसन [भाण] “विवाह-विडम्बनम्” की बात करें तो सुधी-दर्शकों की प्रमाणिकता को स्वीकार करना होगा कि मुम्बई के बॉलीवुड का प्रभाव प्रतिवर्ष की सोमैया-परिसर की प्रस्तुतियों पर रहा है। यह एक अच्छा संकेत है कि संस्कृत-प्रहसनों को पूरे राष्ट्रीय-फलक से देखा-आंका जाय और सहृदय दर्शक तथा रसिक-विद्वज्जन इसका भरपूर आनन्द लें। “विवाह-विडम्बनम्” के निर्देशक की पूरी रंग-परिकल्पना और रंग-विधान की समीक्षा करें तो कोई भी समीक्षक 10 में से 10 अंक दिए बिना नहीं रहेगा। निर्देशक ने सर्वपल्ली डॉ.राधाकृष्णन् सभागार के विशाल “बैकड्रॉप” का उपयोग करते हुए विशेष प्रकाश-प्रभाव के साथ नान्दी प्रस्तुत करके दर्शकों का मन मोह लिया। ऐसा लग रहा था कि जैसे “बैकड्रॉप” में ही पूरे ब्रह्माण्ड का दर्शन हो रहा है। इसी तरह, निर्देशक ने इस प्रस्तुति में एक और प्रयोग करके रंगकर्म की संभावनाओं और रंग-चेतना को व्यापकतर बना दिया था। वह प्रयोग है- नाट्य के नायक रतिकान्त के सेवक ‘कंक’ को चार भूमिकाओं में दिखाना। इस अद्भुत प्रयोग से यह प्रहसन अद्वितीय बन पड़ा है। फिल्मी-गीतों की धुनों का अनुकर्त्तन भी दर्शकों को गुदगुदाता रहा।
शेष-प्रहसन
शेष प्रहसनों में गुरुवायूर-परिसर का “मत्तविलासम्” और शृंगेरी-परिसर का “भगवज्जुकीयम्” नि:सन्देह संस्कृत-रङ्ग-परम्परा के मानक प्रहसन माने जाने चाहिए। साथ ही गुरुवायूर की प्रस्तुतियों के वाचिक-प्रदर्शन के लिए संस्कृत की ध्वनियों के पूर्ण और शुद्ध-उच्चारण पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता महसूस की जाती रही है। केरल और कर्णाटक में शास्त्रीय और लोक-रंगकर्म की जीवन्त और गतिमान कला-परम्पराओं के कारण उनका नाट्य-बोध सहज ग्राह्य है। इन दोनों परिसरों की रंगचर्चा शेष भारत के कुशीलवों के लिए अनुकरणीय है।
कभी-कभी मुझे लगता है कि इन तेरह वर्षों की इस स्पर्धात्मक रंगयात्रा का ही यह सुखद परिणाम हैं कि शेष भारत की साम्प्रतिक प्रस्तुतियाँ उत्तरोत्तर परिपक्व और प्रासंगिक बनती जा रही है।
इस नाट्यमहोत्सव का प्रत्येक प्रहसन अपने आप में एक विशिष्ट और सुखद अनुभूति देता रहा और आने वाले संस्कृतनाट्यमहोत्सवों की स्पर्धा के लिए अधिकाधिक रंग-साधना करने का सन्देश भी….!






