बौद्ध धर्म विश्व का चौथा सबसे बड़ा धर्म है। यह गौतम बुद्ध की शिक्षा और उपदेशों पर आधारित धर्म व जीवन दर्शन है। गौतम बुद्ध का प्रथम उपदेश सारनाथ में हुआ था जिसमें उन्होंने मध्यम मार्ग का अनुसरण करने की सीख दी थी। बौद्ध धर्म की उत्पत्ति ईसाई और इस्लाम धर्म से पहले हुई थी। इस धर्म में मानव कल्याण और समानता को महत्व दिया जाता है। सत्य, मानवता, करुणा, अहिंसा और शांति की बुनियाद पर आधारित बौद्ध धर्म अपने समय का क्रांतिकारी धर्म था जिसकी प्रासंगिकता अब पहले से अधिक हो गई है। इस धर्म में ऊँच-नीच, छुआछूत, जातिवाद और आडंबर का कोई स्थान नहीं है। संघर्ष, अशांति, युद्ध, पाखंड आदि से तड़पते विश्व के लिए बौद्ध धर्म अंतिम विकल्प है। बौद्ध धर्म में जीव मात्र के लिए करुणा का भाव है। करुणा और क्षमा बौद्ध धर्म का मूल तत्व है जिसके कारण बौद्ध धर्म का पूरी दुनिया में प्रसार हुआ। पूर्वोत्तर भारत भी बौद्ध धर्म से प्रभावित हुआ। पूर्वोत्तर में बौद्ध धर्म की जड़ें बहुत गहरी हैं। इस क्षेत्र में बौद्ध धर्मावलंबियों की ठीक-ठीक संख्या बताना तो कठिन है, लेकिन सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में बौद्ध धर्म की शिक्षा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पूर्वोत्तर में बौद्ध धर्म के साथ कुछ स्थानीय परम्पराओं का भी जुड़ाव हो गया है। पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में छिटपुट रूप से बौद्ध धर्मावलंबी रहते हैं, लेकिन अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, त्रिपुरा और सिक्किम में इस धर्म को माननेवाले लोगों की संख्या अधिक है। अरुणाचल प्रदेश के मोंपा, खाम्ती, खंबा, मेंबा, सिंहफो, शेरदुक्पेन और जखरिड. समुदाय के लोग बौद्ध धर्म को मानते हैं। अरुणाचल में बौद्ध धर्म की हीनयान और महायान दोनों शाखाओं को मानने वाले लोग हैं। मिजोरम के चकमा और मोग समुदाय के लोग बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं। त्रिपुरा में भी चकमा लोग रहते हैं। वे भी बौद्ध धर्म को मानते हैं। सिक्किम में बौद्ध धर्म की उपस्थिति सर्वत्र देखी जा सकती है। हर जगह इसके प्रतीक दृष्टिगोचर होते हैं। हवा में लहराते प्रार्थना के सफेद झंडे, सड़कों पर लाल वस्त्रधारी बाल भिक्षुओं और बौद्ध मठों के कारण सिक्किम किसी तपस्वी का साधना स्थल जैसा लगता है। यद्यपि सिक्किम में बौद्ध धर्म बहुमत का धर्म नहीं है, फिर भी सिक्किमवासियों की जीवन शैली और जीवन दर्शन पर इसका गहरा प्रभाव है। सिक्किम में वज्रयान बौद्ध धर्म का अनुसरण करने वाले लोगों की आबादी लगभग 27 प्रतिशत है। सिक्किम में हिंदू धर्म के बाद बौद्ध धर्म दूसरा सबसे बड़ा धर्म है।
अरुणाचल के लोग भगवान बुद्ध के उपदेशों के प्रति गहरी श्रद्धा रखते हैं, लेकिन लामा (पुजारी) को छोड़कर आमतौर पर लोग मांसाहारी हैं । राज्य के बौद्ध धर्मावलम्बी भगवान बुद्ध को अनेक नामों से संबोधित करते हैं । भगवान बुद्ध को दयालु, चमत्कारी और कल्याणकारी माना जाता है। इन जनजातियों के जीवन में लामा का महत्वपूर्ण स्थान है। लामा इन आदिवासी समुदायों के आध्यात्मिक गुरु और अभिभावक हैं। ये बच्चों का नामकरण संस्कार कराते हैं, रोगियों को स्वस्थ करने के लिए प्रार्थना करते हैं तथा अच्छे मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं । मोंपा समुदाय के लोग अरुणाचल के तवांग और पश्चिमी कामेंग जिलों में रहते हैं। ये लोग बौद्ध धर्म की महायान शाखा में आस्था रखते हैं। तवांग का एशिया प्रसिद्ध बौद्ध मठ इनका प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र है। अरुणाचल के लोहित जिले में खाम्ती जनजाति के लोगों का निवास है। इस समुदाय के लोग बौद्ध धर्म की हीनयान शाखा में आस्था रखते हैं। ये एक सर्वव्यापी और सार्वकालिक ईश्वर में विश्वास करते हैं जिन्हें खाम्ती भाषा में ‘चान-खुन-सांग’ कहा जाता है । बौद्ध धर्म से परिचित होने के पूर्व ये लोग बहुदेववादी थे । बहुदेववादी आस्था के कुछ चिह्न अभी भी उनके धार्मिक क्रिया-कलापों में मौजूद हैं । शेरदुक्पेन समुदाय के लोग अरुणाचल के पश्चिमी कामेंग जिले में निवास करते हैं। ये लोग बौद्ध धर्म की महायान शाखा में आस्था रखते हैं। बौद्ध धर्म के साथ इसमें स्थानीय लोक परंपराएं भी जुड़ गईं हैं। बौद्ध मठ को गोंम्पा कहा जाता है। रूपा और शेरगांव दोनों गांवों में गोंपा है जिसमें तिब्बती शैली में भगवान बुद्ध की अनेक मूर्तियां स्थापित हैं । प्रत्येक गोंपा की देखरेख लामा द्वारा की जाती है। लामा द्वारा ही भगवान बुद्ध की पूजा की जाती है । अरुणाचल के लोहित, चांगलांग और तिरप जिलों में सिंहफो जनजाति का निवास है। अरुणाचल की मेंबा और खंबा दोनों जनजातियों की आबादी बहुत कम है। आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से ये जनजातियाँ बहुत पीछे हैं। भौगोलिक कारणों से ये लोग बाहरी दुनिया से कटे हुए हैं। अरुणाचल के वेस्ट सियांग और अपर सियांग जिले इनके निवास क्षेत्र हैं। ये जनजातियाँ बौद्ध धर्म में आस्था रखती हैं।
आठवीं शताब्दी में सिक्किम में बौद्ध धर्म का प्रवेश हुआ। महान बौद्ध संत गुरु पद्मसंभव (गुरु रिमपोचे) और उनके 25 शिष्यों ने आठवीं शताब्दी में सिक्किम का दौरा किया और अपना आशीर्वाद देकर इस भूमि को पवित्र किया। ऐसा माना जाता है कि उनकी कई गुप्त शिक्षाएं यहाँ की पुण्य भूमि में छुपी हुई हैं जिसका उद्घाटन आध्यात्मिक शक्तियों से संपन्न किसी व्यक्ति के द्वारा भविष्य में किया जाएगा। सिक्किम के लोग गौतम बुद्ध के उपदेशों के अनुसार अपना आचरण करते हैं। सिक्किम के बौद्ध धर्मावलम्बी महायान की एक शाखा वज्रयान के अनुयायी हैं। इस पर हिंदू धर्म की तंत्र साधना का प्रभाव है। वज्र अर्थात बिजली, कठोर, सख्त। वज्र से वज्रयान शब्द की व्युत्पत्ति हुई है जो असीम शक्ति का प्रतीक है। वज्रयान बौद्ध धर्म की एक गूढ़ पद्धति है जिसमें लोकप्रिय जादुई-धार्मिक मुहावरे, आत्मा, तंत्र-मंत्र और लोककथाओं को शामिल किया गया है। यहाँ महागुरु पद्मसंभव को गुरु रिमपोचे के नाम से जानते हैं। सिक्किम में गुरु रिम्पोचे की जयंती अत्यंत धूमधाम और श्रद्धा के साथ मनाई जाती है। यह त्योहार प्रत्येक वर्ष तिब्बती चंद्र पंचांग के छठे महीने (जुलाई–अगस्त) की दसवीं तिथि को आयोजित किया जाता है। आठवीं शताब्दी में गुरु रिमपोचे ने सिक्किम का भ्रमण किया था तथा इस प्रदेश को नकारात्मक शक्तियों से मुक्त कर यहाँ बौद्ध धर्म की स्थापना की थी। सिक्किम की राजधानी गंगटोक में एक सप्ताह तक यह त्योहार चलता है। सुबह में गुरु रिमपोचे की मूर्ति को देवराली चोरटन (स्तूप) से निकाला जाता है। मूर्ति के साथ धार्मिक जुलूस निकलता है जिसमें सभी क्षेत्र के लोग शामिल होते हैं। जुलूस में शामिल लोग पवित्र मंत्र ‘ॐ अह हुंग वज्र गुरु पद्म सिद्धि हुंग’ का उच्चारण करते हैं। सुक्लाखंग बौद्ध मठ में जुलूस समाप्त हो जाता है। सभी लोग गुरु रिमपोचे की मूर्ति के सामने प्रार्थना करते हैं। सिक्किम सरकार ने समद्रुपसे में गुरु रिमपोचे की 135 फीट लंबी मूर्ति स्थापित की है। यह गुरु रिमपोचे की विश्व की सबसे लंबी मूर्ति है। सिक्किम के लेपचा मूल रूप से प्रकृतिपूजक थे और मुन धर्म में उनका विश्वास था, लेकिन भूटानी लोगों के प्रभाव से अधिकांश लेपचा ने बौद्ध धर्म को अपना लिया। उन्होंने बौद्ध धर्म को अपना तो लिया, लेकिन अभी भी मुन धर्म के कुछ लक्षण उनके आध्यात्मिक कार्यकलापों में शेष हैं। इसलिए कभी–कभी इनके धर्म को प्रकृतिपूजक बौद्ध धर्म की संज्ञा दी जाती है।
जातीय और धार्मिक विविधता के बावजूद सिक्किम के निवासियों में अद्भुत सद्भाव देखने को मिलता है। यहाँ के मूल निवासी लेपचा जाति के अनुसार यह ‘नीमाय एल लोंग’ अर्थात भगवान का निवास स्थान है। इस स्थान को तिब्बती बौद्ध अनुयायी ‘युक्सस’ शब्द से संबोधित करते हैं। ‘युक्सस’ का शाब्दिक अर्थ ‘तीन महान लामाओं का मिलन’ है। नदियाँ, झीलें, बौद्ध मठ और स्तूप बाहें फैलाकर पर्यटकों को आमंत्रित करते हैं। पूर्वी सिक्किम में 2000 वर्ष पुरानी इंचे मोनास्ट्री है। ग्यालसिंग जिले में मोनास्ट्री, कंचनजंगा जलप्रपात व राज्य की पहली राजधानी युकसम स्थित हैं । मंगन जिले में बौद्ध मठ, झील व अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य का अवलोकन करने के अनेक स्थल हैं। सिक्किम सरकार ने वर्ष 1998 में पवित्र धार्मिक स्थलों, गुफाओं, बौद्ध मठों की जाँच करने के लिए एक समिति का गठन किया था। समिति ने सरकार के सामने अपनी अनुशंसा प्रस्तुत की जिसके आधार पर सिक्किम सरकार ने 24 अप्रैल 2001 को पवित्र शिखरों, गुफाओं, चट्टानों, झीलों आदि को सबसे पवित्र बौद्ध धर्म स्थल घोषित किया। सिक्किम के मुखौटा नृत्य बहुत आकर्षक होते हैं। इन नृत्यों में बौद्ध धर्म के संदेश निहित होते हैं।
चकमा जनजाति के लोग मिजोरम और त्रिपुरा दोनों राज्यों में रहते हैं। भारत के अतिरिक्त चकमा समुदाय के लगभग चार लाख लोग बंगलादेश में रहते हैं। भारत में चकमा समुदाय की जनसंख्या लगभग एक लाख पचहत्तर हजार है। ‘अगरतारा’ चकमा समुदाय का धर्मग्रन्थ है। लगभग पाँच सौ वर्ष पहले इसकी रचना की गई थी। अगरतारा में बर्मी गद्य और पद्य के रूप देखे जा सकते हैं। इसे विकृत पाली भाषा में लिखा गया है। इसलिए इसके अनेक रूप प्रचलित हैं। अनुष्ठानों और संस्कारों में इस धर्मग्रंथ का उपयोग होता है। मूल रूप से अगरतारा का उपयोग हीनयान बौद्ध धर्म संबंधी अनुष्ठानों में किया जाता था, लेकिन आधुनिक समय में इसे समझ पाना बहुत कठिन है। पहले इसमें 28 अध्याय थे, लेकिन अब मात्र 21 अध्याय ही उपलब्ध हैं। प्राचीन काल में मृतकों का अंतिम संस्कार करते समय संत (लोरी) इस पुस्तक से मंत्रों का उच्चारण करते थे। विवाह में भी भगवान बुद्ध की पूजा करते समय अगरतारा का पाठ किया जाता था। चकमा समुदाय मांसाहारी है। वे अंडा, मछली, सूअर, बकरी, मुर्गी, भैंस के मांस खाते हैं, लेकिन वे गोमांस नहीं खाते हैं। चकमा समुदाय के लोग बौद्ध धर्म की हीनयान शाखा में आस्था रखते हैं। यह समुदाय अनेक पर्व–त्योहार मनाता है। इस समुदाय द्वारा मनाए जानेवाले त्योहारों (पूजा) को हम चार वर्गों में विभक्त कर सकते हैं–परिवार स्तर पर की जानेवाली पूजा, गुत्थी (गोत्र) स्तर पर की जानेवाली पूजा, गाँव स्तर पर की जानेवाली पूजा और सार्वजनिक रूप से की जानेवाली पूजा।
धर्मकाम पूजा चकमा समुदाय का महत्वपूर्ण त्यौहार है। परिवार की शांति और समृद्धि की कामना से परिवार स्तर पर इसका आयोजन किया जाता है। इसे सिद्धि पूजा भी कहते हैं। इसका आयोजन जंगल में किया जाता है। इस अनुष्ठान की सफलता चमत्कारों पर निर्भर करती है। ‘लोरी’ (पुजारी) के द्वारा यह पूजा कराई जाती है। गाँव के जंगल में इस पूजा के लिए एक नए घर का निर्माण किया जाता है। घर के एक कोने में एक मंच बनाया जाता है जिस पर भगवान बुद्ध की मूर्ति स्थापित की जाती है। पूजा के एक दिन पूर्व घरवाले और आमंत्रित अतिथि भगवान बुद्ध की पूजा करते हैं। इस दिन ‘अगरतारा’ के कुछ अंशों का पाठ भी किया जाता है। ‘थनमना पूजा’ ग्राम आधारित पूजा है। यह पूजा हर साल माघ–फाल्गुन माह में प्रत्येक गाँव में आयोजित की जाती है। सभी ग्रामवासियों से चंदा वसूलकर पूजा की जाती है। प्रत्येक परिवार मुर्गा, कुछ चावल और पैसे देकर इस पूजा में भागीदार बनता है। ‘थान’ को गाँव का रक्षक देवता माना जाता है। विभिन्न देवी-देवताओं को मुर्गा और कबूतर की बलि भी दी जाती है। चकमा समुदाय के लोग बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं, लेकिन इनके धर्म पर हिंदू धर्म का प्रभाव है। इनकी पूजा पद्धति पर भी हिंदू धर्म का प्रभाव देखा जा सकता है। वे हिंदू देवी–देवताओं की पूजा करते हैं। वे शिव, काली, लक्की, सरस्वती आदि देवी–देवताओं की पूजा करते हैं। हिंदू धर्म के साथ–साथ चकमा की पूजा पद्धति पर प्रकृति पूजा (जड़ात्मवाद) का भी प्रभाव है। चकमा समुदाय की पूजा पद्धति हिंदू धर्म और प्रकृति पूजा का मिश्रण है। चकमा लोग प्रकृति पूजक जातियों के समान ही पेड़, नदी, वन, पर्वत आदि की पूजा करते हैं। चकमा समुदाय आत्मा और पुनर्जन्म में आस्था रखता है। वे परिवार और समाज के कल्याण के लिए शिव, शनि और सत्यपीर की पूजा करते हैं। मदिरा इनकी पूजा का अनिवार्य घटक होती है।
चकमा जनजाति के लोग स्वयं को ‘सकमा’ कहते हैं। इस समुदाय के लोग स्वयं को ‘चंगमा’ भी कहते हैं। ‘चकमा’ अथवा ‘चंगमा’ का शाब्दिक अर्थ ज्ञात नहीं है। मिजोरम में पहले इन्हें ‘तुईचेक’ या ‘चेक’ कहा जाता था, लेकिन अब ‘तकम्ब’ कहा जाता है। चकमा समुदाय आपस में चकमा भाषा का प्रयोग करता है और अन्य समुदाय के लोगों से बंगला अथवा दुहलियन भाषा में बातचीत करता है। चकमा भाषा और बंगला भाषा में बहुत समानता है। बोधगया, लुम्बिनी और कुशीनगर इनके लिए पवित्र तीर्थ स्थल है। ये लोग कई त्योहार मनाते हैं जिनमें बुद्ध पूर्णिमा सबसे महत्वपूर्ण है। इस समुदाय के अन्य त्योहार हैं–असरी पूर्णिमा, भाद्र पूर्णिमा, माघ पूर्णिमा और बिहू। यह समुदाय दुर्गा पूजा, काली पूजा, लक्ष्मी पूजा और सरस्वती पूजा भी धूमधाम से मनाता है।
त्रिपुरा में मोग जनजाति की जनसंख्या तीस हजार से अधिक है । ये लोग मुख्यतः सबरूम और बेलोनिया में रहते हैं। ऐसा माना जाता है कि ये लोग बर्मा से देशांतरित होकर बंगलादेश में आए थे और बाद में त्रिपुरा में आकर बसे। इनकी अपनी मग भाषा है जिसे वे बर्मी लिपि में लिखते हैं। मग समुदाय बौद्ध धर्मावलंबी है। इनके धर्म में बौद्ध धर्म के साथ कुछ पारंपरिक विश्वास भी जुड़ गए हैं। वे ‘फोरा’ अथवा भगवान बुद्ध की पूजा सर्वोच्च ईश्वर के रूप में करते हैं, लेकिन रोग, मृत्यु, बांझपन आदि को भूत–प्रेतों का प्रकोप मानते हैं। इनका मानना है कि भूत–प्रेत और दुष्ट शक्तियों के नाराज होने से ही जीवन में कठिनाइयाँ आती हैं। इसलिए भूत–प्रेत और दुष्ट शक्तियों को प्रसन्न करने के लिए अनेक अनुष्ठान किए जाते हैं। सर्वोच्च ईश्वर ‘फोरा’ के अतिरिक्त इस समुदाय के लोग अन्य अनेक देवी–देवताओं जैसे-चीनी, काली, गंगा, लक्ष्मी इत्यादि की पूजा करते हैं। ’केयोंग’ (बौद्ध मंदिर) मग समुदाय के लिए पवित्र स्थल होते हैं। बोधगया, लुंबिनी, काशी इनके पवित्र तीर्थ स्थल हैं।







