भारत जैसी विशाल सांस्कृतिक, भाषाई और सामाजिक विविधता वाले देश में सौहार्द बनाए रखना हमेशा से एक बड़ी चुनौती और उससे भी बड़ी जरूरत रहा है। आज के डिजिटल युग में जहाँ सोशल मीडिया के माध्यम से नकारात्मकता और घृणा तेजी से फैलती है, वहाँ भाषा की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। भाषा केवल संवाद का साधन नहीं है बल्कि यह हमारे विचारों, संस्कृति और संवेदनशीलता की संवाहक भी है।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में भाषा किस प्रकार समाज से नफरत को खत्म कर सकारात्मकता का संचार कर सकती है, इसे निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:
सांस्कृतिक सेतु के रूप में भारत में इतनी विविधताओं के बावजूद, भाषा हमेशा से जोड़ने का माध्यम रही है। जब हम एक-दूसरे की क्षेत्रीय भाषाओं का सम्मान करते हैं या उन्हें सीखने का प्रयास करते हैं तो पूर्वग्रह अपने आप खत्म होने लगते हैं।
सांस्कृतिक आदान-प्रदान:
दक्षिण की भाषा का साहित्य जब उत्तर में और उत्तर का साहित्य जब पूर्व-पश्चिम में पढ़ा जाता है तो समाज में एक-दूसरे के प्रति सम्मान बढ़ता है जिससे नकारात्मकता की जगह समझ पैदा होती है।
‘वसुधैव कुटुंबकम’ और ‘गंगा-जमुनी तहज़ीब’ की अभिव्यक्ति: हमारी भाषाओं विशेषकर हिंदी, उर्दू, गुजराती, पंजाबी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के विकास में साझा संस्कृति का बहुत बड़ा हाथ रहा है।
सद्भाव के शब्द:
हिंदी-उर्दू का मिला-जुला रूप ‘हिंदुस्तानी’ इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। इसी भाषा में प्रेम एवं सौहार्द के शब्द अनेक भाषाओं से आय हैं। भाषा में जब कबीर, नानक, अमीर खुसरो और रसखान जैसे संतों की वाणी का प्रभाव झलकता है तो वह समाज को सहिष्णुता और प्रेम का पाठ पढ़ाती है।
शब्दों का चयन:
भाषा का लहजा और शब्दों का चयन किसी भी विवाद को शांत कर सकता है। भारतीय संस्कृति में ‘जी’, ‘आप’, और ‘नमस्कार/अस्सलाम वालेकुम/राधे राधे/सत श्री अकाल /’ जैसे शब्द केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि सामने वाले के प्रति आदर भाव प्रकट करते हैं, जो नफरत की दीवार को ढहाने में सक्षम हैं।
आजकल घृणा और नकारात्मकता का सबसे बड़ा केंद्र सोशल मीडिया बन चुका है। ऐसे में भाषा का महत्व और बढ़ जाता है:
सकारात्मक विमर्श:
ट्रोलिंग और गाली-गलौज के दौर में यदि तार्किक, मर्यादित और संवेदनशील भाषा का प्रयोग किया जाए, तो नफरत फैलाने वाले तत्वों को हतोत्साहित किया जा सकता है।
शब्दों में वह ताकत होती है जो दंगा भी भड़का सकती है और घाव पर मरहम भी लगा सकती है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में मीडिया और प्रभावशाली व्यक्तियों द्वारा जिम्मेदार भाषाई चयन समाज में शांति बनाए रखने के लिए अनिवार्य है।
शिक्षा और भाषाई संस्कार:
नकारात्मकता को जड़ से खत्म करने की शुरुआत बचपन से होती है।
स्कूली पाठ्यक्रम में ऐसी कहानियों और कविताओं को शामिल किया जाना चाहिए जो करुणा, सहानुभूति और भाईचारे को बढ़ावा दें।
आंतर-भाषीय साहित्यिक आंदोलन
(Cross-Lingual Literary Movement):
आज का दौर बहुभाषावाद का दौर है। भारत एक ऐसा देश है जहाँ कोस-कोस पर पानी और चार कोस पर वाणी बदल जाती है। ऐसे बहुभाषी (multilingual) समाज में किसी एक भाषा में सिमटकर रहना पूरे समाज के अनुभवों को साझा करने में बाधा बनता है। इसी पृष्ठभूमि में आंतर-भाषीय साहित्यिक आंदोलन (विभिन्न भाषाओं के बीच संवाद और आदान-प्रदान का आंदोलन) न सिर्फ एक साहित्यिक जरूरत है बल्कि हमारी सांस्कृतिक एकता के लिए भी अनिवार्य है।
नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) में भी मातृभाषा और क्षेत्रीय भाषाओं को महत्व दिया गया है। जब बच्चा बचपन से ही विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों के प्रति संवेदनशील बनता है, तो वह बड़ा होकर नफरत की राजनीति या विचारधारा का शिकार नहीं होता।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था कि हमारी भाषा हमारे विचारों का आईना होती है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में, जहाँ कदम-कदम पर विविधता है, वहाँ भाषा को हथियार बनाने के बजाय ‘अमृत’ बनाना होगा। यदि हम अपनी बोलचाल में कटुता की जगह मधुरता, अहंकार की जगह विनम्रता और संकीर्णता की जगह व्यापकता को स्थान दें, तो समाज से घृणा और नकारात्मकता का अंत निश्चित है। भाषा ही वह सूत्र है जो सवा सौ करोड़ से अधिक भारतीयों को एक सूत्र में पिरोकर ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ के सपने को साकार कर सकती है।
सरल शब्दों में कहें तो यह एक ऐसा आंदोलन है जो दो या दो से अधिक भाषाओं के बीच की सीमाओं को तोड़ता है। इसके तहत केवल एक भाषा में साहित्य नहीं रचा जाता, बल्कि:
एक भाषा की श्रेष्ठ रचनाओं का दूसरी भाषा में अनुवाद किया जाता है।
लेखक एक साथ दो या तीन भाषाओं में लिखते हैं। (द्वि, त्रि अथवा बहु भाषी सृजन) विभिन्न भाषाओं के मुहावरों, शैलियों और सांस्कृतिक बारीकियों को मिलाकर एक नई वैश्विक या मिश्रित साहित्यिक शैली तैयार की जाती है।
अगर हम बात करें कि भारतीय संदर्भ में इसका महत्व क्या है तो इस का परिप्रेक्ष्य बहोत रुंद हो जाता है। भारत में इस आंदोलन का महत्व ऐतिहासिक और व्यावहारिक दोनों दृष्टिकोणों से अद्वितीय है:
1. साझी विरासत का अहसास
भारत में कबीर, मीराबाई या गुरु नानक के समय से ही आंतर-भाषीय या क्रॉस-लिंग्वल परंपरा रही है। कबीर की भाषा में अवधी, सधुक्कड़ी, ब्रज और फारसी का मिश्रण था। आज के समय में यह आंदोलन हमें यह याद दिलाता है कि भले ही हमारी भाषाएं अलग हों, लेकिन इंसानी भावनाएं, संघर्ष और कहानियां एक जैसी हैं। यह आंदोलन ‘अनेकता में एकता’ के नारे को साहित्यिक धरातल पर सच साबित करता है।
2. क्षेत्रीय साहित्य को राष्ट्रीय और वैश्विक मंच देना
भारत में गुजराती, हिन्दी, मराठी, तमिल, बंगाली, मलयालम और कन्नड़ जैसी भाषाओं में अत्यंत समृद्ध साहित्य मौजूद है। लेकिन अक्सर भाषाई सीमाओं के कारण पेरुमल मुरुगन (तमिल) या भालचंद्र नेमाड़े (मराठी) की रचनाएं हिंदी या उत्तर भारत के पाठकों तक वैसी नहीं पहुँच पातीं जैसी पहुँचनी चाहिए। क्रॉस-लिंग्वल आंदोलन इन क्षेत्रीय हीरों को तराशकर पूरे देश और दुनिया के सामने लाता है।
3. अनुवादकों को ‘सह-लेखक’ का दर्जा
इस आंदोलन ने अनुवाद की परिभाषा को बदला है। अब अनुवाद सिर्फ एक भाषा के शब्द को दूसरी भाषा में बदल देना नहीं है बल्कि वह एक संस्कृति को दूसरी संस्कृति में स्थानांतरित करना है। इससे अनुवादकों को साहित्य में उनका सही सम्मान मिल रहा है।
आज भारत में इसकी आवश्यकता क्यों है?
भाषाई और सांस्कृतिक दूरियों को पाटने के लिए भी भाषा और साहित्य का उपयोग आज की आवश्यकता है परंतु दुर्भाग्य से, राजनीतिक या सामाजिक कारणों से कई बार भाषाओं के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो जाती है। ऐसे में क्रॉस-लिंगुअल साहित्य एक पुल का काम करता है। जब एक हिंदी, मराठी या गुजराती भाषी व्यक्ति किसी दक्षिण भारतीय लेखक की कहानी पढ़ता है, तो वह उनके रहन-सहन और भावनाओं से जुड़ता है, जिससे पूर्वाग्रह खत्म होते हैं।
आज की युवा पीढ़ी पूरी तरह से शुद्ध भाषा नहीं बोलती। कॉर्पोरेट युवक युवती अपनी रोजाना बातचीत में ‘हिंग्लिश’ (हिंदी + इंग्लिश) या ‘टैंग्लिश’ (तमिल + इंग्लिश) का प्रयोग करते हैं। इस पीढ़ी को साहित्य से जोड़े रखने के लिए ऐसे आंदोलनों की जरूरत है जो उनके बोलने के तरीके को स्वीकार करें और उसी बहुभाषी पुट के साथ गंभीर बातें भी कह सकें।
भारत का बहुत सा प्राचीन और मध्यकालीन ज्ञान संस्कृत, फारसी, प्राकृत या पुरानी तमिल में दबा हुआ है। आंतर-भाषीय आंदोलन के माध्यम से इस ज्ञान को आधुनिक और सुलभ भाषाओं में लाकर आम जनता तक पहुँचाया जा सकता है।
यह कहना अनुचित नहीं होगा कि साहित्य समाज का दर्पण होता है और यदि समाज बहुभाषी है तो दर्पण को भी बहुभाषी होना ही होगा। भारत जैसे जीवंत और विविधता से भरे देश में आंतर-भाषीय साहित्यिक आंदोलन कोई आधुनिक फैशन नहीं बल्कि हमारी आत्मा की मांग है।
मेरा ही एक पुराना शे’र है।
गिरती दीवारें दुबारा भी तो उठ सकती हैं
मसलहत ये है कि बुनियाद संभाली जाए।
यह आंदोलन हमें अपनी बुनियाद, अपनी जड़ों से जोड़े रखते हुए दूसरों की जड़ों का सम्मान करना सिखाता है। जब तक हमारी भाषाएं आपस में हाथ नहीं मिलाएंगी तब तक हम एक समग्र ‘भारतीय साहित्य’ की कल्पना नहीं कर सकते। इसलिए इस आंदोलन को बढ़ावा देना हर लेखक, पाठक और प्रकाशक की जिम्मेदारी है। हमें इस आंदोलन को केवल भाषा तक सीमित ना रखते हुए देश की संप्रभुता, सौहार्द और भाइचारे को कायम रखने के लिए ईस्तेमाल करना होगा ताकि हम भाषा एवं साहित्य के माध्यम से देश के साम्प्रदायिक सौहार्द और परिणामस्वरूप देश की विशालता गगनरूपी ख्याति को क्षति रहित बनाए रखने में सहयोग करें।
साहिर लुधियानवी ने भी अपने एक गीत में कहा था:
नफ़रतों के जहाँ में हमको
प्यार की बस्तियाँ बसानी हैं
दूर रहना कोई कमाल नहीं
पास आओ तो कोई बात बने।।
भाषा को दूरियां खत्म करने का माध्यम बनाएं।अंत में अपनी एक कविता पर अपनी लेखनी और विचारों के प्रवाह को विराम देता हूं।
‘हर भाषा में धड़के हिंदुस्तान’
अलग हैं अपनी बोलियाँ, अलग हैं गीत हमारे
अंतर्मन में लेकिन बहते हैं प्रीत के धारे।
हिंदी है माथे की बिंदिया, तो उर्दू में है मिठास
तमिल, तेलुगु और कन्नड़
जगाते दक्षिण का विश्वास।
मराठी और गुजराती की सुरीली कैसी तान
पंजाबी और बंगाली से महके एक जहान।
भाषा की दीवारें तोड़ें, आओ हाथ मिलाएँ
नफ़रत से बनाई हर लकीर को
प्रीत से मिटाएँ।
शब्द भले ही भिन्न हों
पर भावनायें तो एक हैं,
रंग भले ही अलग-अलग हैं
पर गुलशन तो सारा एक है।
चलो मिलकर एक नया अध्याय लिखें
भाषाओं के सुंदर धागों से प्रेम का इतिहास बुनें।







