“आत्म चिंतन का गतिशील परिदृश्य जब परमसत्ता के सम्मुख समर्पित होता है तब जीवन की सम्पूर्णता सर्वगुण संपन्न स्वरुप में परिलक्षित होती है । जीवन की स्थिति को बेहतर बनाने के सन्दर्भ में प्रत्यक्ष रूप से पवित्र भावनाओं एवं विचारों का महत्वपूर्ण योगदान होता है जिसमें आत्मिक उच्चता का अप्रत्यक्ष स्वरुप सदा विद्यमान रहता है । मानवता के केन्द्रीय भाव द्वारा अंतर्मन से आत्मा की अनुभूति को विशिष्टता प्रदान करते हुए पुरुषार्थ में संलग्न रहना ही चेतना के वास्तविक परिष्कार का आधार है । जीवन में अच्छाई और सच्चाई का आगमन हो जाने पर स्वयं के विधिवत उत्थान हेतु मार्गदर्शन करना बेहतर कार्य व्यवहार से आंतरिक संतुष्टि प्राप्त करने का मापदंड है । आत्मा की उच्चता से सम्बद्ध पवित्रता का आभामंडल – भाव , भासना , भावना एवं भाषा की अभिव्यक्ति द्वारा निरंतर , निर्मलता के साथ प्रवाहित होता रहता है । ”
भावनात्मक संतुष्टि की गरिमा का आधारभूत पक्ष : –
चेतना से सर्व मानव आत्माओं को शांति प्रदान करने के नैसर्गिक संस्कार को विकसित करके लोक व्यवहार से आत्म तत्व द्वारा उच्चता ग्रहण करने की अवस्था का निर्माण करना भावनात्मक संतुष्टि का आधार है । स्वयं की आत्मिक स्मृति जीवन को अन्तर्मुखी स्थिति की ओर गतिशील करने में सहायक होती है जिससे आत्मा का आश्रय गरिमापूर्ण स्वरुप का परिचायक बन जाता है । जीवन में आत्मिक बोध का व्यावहारिक पक्ष भावना की संतुष्टि को मानवीय चरित्र की उज्ज्वलता से सम्बद्ध कर देता है जो आत्मा के परिष्कार का प्रामाणिक प्रबोधन होता है । स्वयं के अतीत और वर्तमान का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए आत्म दृष्टि एवं दृष्टिकोंण द्वारा नव चेतना से युक्त परिवर्तन ही आंतरिक संतुष्टि के रूप में गुणात्मक जीवन के परिणाम को प्रस्फुटित करने में सक्षम होता है । आत्मगत चेतना की व्यावहारिकता – मंसा , वाचा एवं कर्मणा से बेहतर जीवन की परिकल्पना को साकार करने का स्रोत है जिसमें भावनात्मक संतुष्टि की गरिमामयी श्रेष्ठता समाहित रहती है ।
वैचारिक परिदृश्य में दृढता की लक्ष्योंमुखी प्रवृति : –
जीवन में उच्चता के प्रति निष्ठा व्यक्ति को गुणात्मकता हेतु अभिप्रेरित करती है जिसमें महानता की लक्ष्योंमुखी प्रवृति से वैचारिक परिदृश्य में दृढता आ जाती है । स्वयं को श्रेष्ठतम स्वरुप से स्थापित करने में पवित्र भावना और विचार का पूरक सामंजस्य अनिवार्य है क्योंकि आत्मगत अभिव्यक्ति का प्रमुख साधन हृदय एवं मस्तिष्क है जिससे संतुलित व्यवहार का निर्धारण सुनिश्चित होता है । जीवन में भावना की निर्मलता से विचार में निर्माणता सहज ही प्रतिपादित हो जाती है और आत्मगत निमित्त स्थिति व्यक्ति के लिए निश्चिंतता एवं निर्भारता की अनुभूति स्वत: ही उपलब्धि का कारक बन जाती है । स्वयं की गतिशीलता में सिद्धांत एवं व्यवहार की समानता व्यक्ति को इस सत्य हेतु प्रेरित करती है कि वह आत्मिक सन्तुष्टता की व्यावहारिकता को आत्मसात कर वास्तविकता को स्वीकार करते हुए श्रेष्ठता से महानता की ओर प्रस्थान कर सके । जीवन की व्यापक दृष्टि के सानिध्य में उत्साह से भरपूर चेतना , वैचारिक समृद्धि के संबल से लक्ष्य की प्राप्ति विधिवत रूप से पूर्ण कर लेती है ।
गरिमामयी जीवन की उपलब्धिपूर्ण स्थिति का विश्लेषण : –
आत्मानुभूति प्राणी मात्र के लिए गरिमामयी जीवन की उपलब्धिपूर्ण स्थिति का प्रमाण है जिसमें आत्मगत स्वमान , स्वरुप एवं स्वभाव का मूलगुण सम्मिलित रहता है । स्वयं की उपस्थिति का निश्चय आत्मिक अस्तित्व के आधार पर होना तथा व्यवहार के अंतर्गत विभिन्न प्रकार के जुड़ाव को स्वीकार करके निभाने की उपयोगिता तक सक्रिय रहना जीवन का धर्म – कर्म है । जीवात्मा की गरिमा उस समय उपलब्धि के परिवेश में परिवर्तित हो जाती है जब प्रतिपल आत्मा की प्रमुखता और व्यवहार जगत गौण रहकर गतिशील होता है । स्वयं के जीवन में उच्चता हेतु सत्यता के व्यावहारिक अनुकरण से सहज ही संतुष्टता की प्राप्ति हो जाती है जिसमें महानता की पृष्ठभूमि व्यक्ति को निमित्त , निर्माण , निर्मल एवं निश्चिंत बना देती है । जीवन के बेहतर स्वरुप का अभ्युदय भावना एवं विचार की पवित्रता से गौरवान्वित होकर सदा उपलब्धिपूर्ण स्थिति को प्रकट करने में सहायक होता है ।
जीवन की उच्चता में पवित्रता की विराटता : –
सनातन परम्परा का निर्वहन आत्मगत उच्चता को सम्पूर्णता के सानिध्य में निज स्वरुप का साक्षात्कार करने हेतु अभिप्रेरित करता है जिसमें आदि सनातन देवत्व धर्म की पवित्रता सन्निहित रहती है । जीवन को बेहतर बनाने की प्रक्रिया द्वारा अंतर्मन के व्यावहारिक पक्ष , भावना एवं विचार की उच्चता से आत्मा की गुणात्मक शक्ति का प्रतिपादन सहज ही हो जाता है । चेतना का परिष्कार जीवन को पूर्णतया शुद्ध स्वरुप में परिवर्तित कर देता है जिससे पवित्रता की अनुभूति व्यवहार जगत में प्रकट हो जाती है । लोक व्यवहार की परिकल्पना को मूर्तरूप प्रदान करने में महामानव की विशिष्ट भूमिका अत्यधिक प्रेरणादायी होती है क्योंकि वहाँ व्यक्ति तो एक होता है लेकिन व्यक्तित्व का सात्विक आभामंडल अनेक कल्याणकारी स्वरुप में परिणित हो जाता है जो स्वयं के साथ सर्व को संतुष्ट करने का माध्यम बनता है । जीवन का गुणात्मक अनुक्रम श्रेष्ठतम की ओर गतिशील होने में मददगार होता है जिसके अंतर्गत मन , वचन एवं कर्म की पवित्रता व्यापक स्वरुप में समाहित रहती है ।
चिंतन की गतिशीलता द्वारा जीवन की सम्पूर्णता : –
आत्म चिंतन का गतिशील परिदृश्य जब परमसत्ता के सम्मुख समर्पित होता है तब जीवन की सम्पूर्णता सर्वगुण संपन्न स्वरुप में परिलक्षित होती है । जीवन की स्थिति को बेहतर बनाने के सन्दर्भ में प्रत्यक्ष रूप से पवित्र भावनाओं एवं विचारों का महत्वपूर्ण योगदान होता है जिसमें आत्मिक उच्चता का अप्रत्यक्ष स्वरुप सदा विद्यमान रहता है । मानवता के केन्द्रीय भाव द्वारा अंतर्मन से आत्मा की अनुभूति को विशिष्टता प्रदान करते हुए पुरुषार्थ में संलग्न रहना ही चेतना के वास्तविक परिष्कार का आधार है । जीवन में अच्छाई और सच्चाई का आगमन हो जाने पर स्वयं के विधिवत उत्थान हेतु मार्गदर्शन करना बेहतर कार्य व्यवहार से आंतरिक संतुष्टि प्राप्त करने का मापदंड है । आत्मा की उच्चता से सम्बद्ध पवित्रता का आभामंडल – भाव , भासना , भावना एवं भाषा की अभिव्यक्ति द्वारा निरंतर निर्मलता के साथ प्रवाहित होता रहता है ।







