किसी देश की असली तस्वीर उसकी इमारतों से नहीं, उन इमारतों के भीतर सुरक्षित लौट आने की उम्मीद से बनती है। लेकिन हमारे समय का सबसे बेचैन कर देने वाला सच यह है कि अब यह उम्मीद भी धीरे-धीरे धुएँ में बदलती जा रही है। देश के विभिन्न हिस्सों से आती आग की ख़बरें अब चौंकाती नहीं हैं, बल्कि एक चिर-परिचित क्रम की तरह सामने आती चली जाती हैं। जैसे कोई तय पटकथा हो कि आग लगेगी, लोग फँसेंगे, कुछ मरेंगे, फिर कारण गिनाए जाएँगे। कारण भी वही पुराने, घिसे हुए रिकॉर्ड की तरह कि उन्हें सुनते ही सिर धुनने का मन करे।
हर अग्निकांड के बाद ‘अचानक’ यह पता चलता है कि सुरक्षा तो केवल कागज़ों में उपस्थिति दर्ज करा रही थी। फायर एनओसी एक औपचारिकता थी। निकास मार्ग, गत्तों के तमाम बड़े-बड़े डिब्बों से भरे भंडार गृह में बदल चुका था और अग्निशमन यंत्र दिखावटी सजावट का हिस्सा बन चुके थे। यह ‘अचानक पता चलना’ कुछ-कुछ उसी तरह का है जैसे उत्तरप्रदेश में किसी घटना के उपरांत ‘’अचानक’ ही पता चल जाता है कि संबंधित व्यक्ति का घर अवैध तरीके से बना है और फिर बुलडोज़र से उसे ढहा दिया जाता है।
जो चीज़ें आग के बाद दिख जाती हैं, वे पहले क्यों नहीं दिखतीं? क्या निरीक्षण केवल दस्तावेज़ों को उलट-पुलट करने का अभ्यास ही रह गया है? या हमने यह मान लिया है कि नियमों का पालन नहीं बल्कि जुगाड़-तंत्र से उनका प्रबंधन करना ही पर्याप्त है? आखिर किसी को क्या ही फ़र्क़ पड़ता है!
समस्या केवल व्यवस्था की लापरवाही नहीं, बल्कि उस लापरवाही की स्वीकृति भी है। हम सब जानते हैं कि बहुत-सी इमारतें नियमों के विरुद्ध खड़ी हैं, बहुत से स्थानों पर सुरक्षा इंतज़ाम खानापूर्ति भर हैं। मॉल में गाड़ी चेक करने के नाम पर केवल डिक्की खुलवाकर कर्त्तव्य की इतिश्री हो जाती है। गोया अपराधी बम/ हथियार को सबके सामने प्रस्तुत करता हुआ ही भीतर लाएगा! कार सीट के नीचे नहीं रख सकता क्या? फिर भी हम वहाँ जाते हैं, काम करते हैं, अपने बच्चों को भी भेजते हैं, एक अनकहे भरोसे के साथ। यही भरोसा हर बार टूटता है, और उसके साथ टूटती है वह धारणा कि यह एक “दुर्घटना” थी। दरअसल, ये दुर्घटनाएँ नहीं, धीरे-धीरे तैयार की गई त्रासदियाँ हैं।
हर बार सरकारें सामने आती हैं और सुनाई देते हैं- जाँच के आदेश, मुआवज़े की घोषणाएँ, दोषियों के प्रति कड़ी कार्रवाई के वादे। कुछ समय के लिए यह सब वास्तविक भी लगता है। लेकिन फिर वही होता है जो प्रायः होता आया है। मामले ठंडे पड़ जाते हैं या नए मामलों से उन्हें दबा दिया जाता है। फाइलें बंद हो जाती हैं और जीवन अपनी पुरानी गति में लौट आता है। अंतर सिर्फ इतना होता है कि कुछ घर हमेशा के लिए सूने हो जाते हैं। लेकिन यह तो अब आम बात ही है न!
यही खामोशी सबसे खतरनाक है। क्योंकि यह केवल भूलने की नहीं, बल्कि स्वीकार करने की खामोशी है। जैसे हमने मान ही लिया हो कि आग लगना इस देश की नियति है और उसमें मर जाना एक दुर्भाग्यपूर्ण संयोग।
क्या यह सचमुच संयोग है? कतई नहीं! जब हर बार वही कारण सामने आते हैं, तो यह संयोग नहीं रह जाता। यह एक पैटर्न है और पैटर्न हमेशा किसी गहरी विफलता की ओर इशारा करता है। विफलता जो तकनीकी नहीं, नैतिक भी है। जब एक इमारत बिना सुरक्षा मानकों के चलती है, तो यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि उस प्रत्येक व्यक्ति के जीवन के साथ समझौता है जो वहाँ प्रवेश करता है।
इसलिए अब ज़रूरत केवल शोक व्यक्त करने की नहीं है, बल्कि उस चक्र को समझने और तोड़ने की है जिसमें हर बार इंसान जलता है और व्यवस्था सुरक्षित बच निकलती है। जवाबदेही इस चर्चा का सबसे महत्वपूर्ण शब्द होना चाहिए। यह तय होना चाहिए कि गलती कहाँ हुई और किससे हुई? जब तक जिम्मेदारी नाम और चेहरे के साथ तय नहीं होगी, तब तक हर अग्निकांड, हर दुर्घटना एक पुरानी पुनरावृत्ति बन दस्तक देते रहेंगे और ‘सिस्टम’ को धेला भर भी फ़र्क नहीं पड़ेगा!
इसमें केवल सरकार या प्रशासन ही दोषी हैं, ऐसा भी नहीं। एक नागरिक के रूप में हमारी भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। असुविधाजनक प्रश्न पूछना, बार-बार पूछना यही वह प्रक्रिया है जो किसी भी लोकतंत्र को जीवित रखती है। अगर हम भी चुप हो जाएँ तो व्यवस्था के लिए सबसे आसान काम हो जाएगा। उन्हें यही तो चाहिए कि हम प्रश्न न करें बस उनकी प्रशंसा में मुंडी हिलाते रहें। हमें यह समझना होगा कि आग केवल तारों में, दुकानों में, होटलों में ही नहीं लगती। यह हमारी उदासीनता में भी लगी हूई है, यह उस भाव में भी है जहाँ हम सहजता से कह देते हैं कि “रहने दो, हमें क्या करना!” और उस (कु)व्यवस्था में तो खैर है ही, जो हर बार चेतावनी को, संकेतों को अनदेखा करती है।
इसलिए बात आग बुझाने की नहीं है, उससे पहले जागने की है। क्योंकि अगर यह प्रलाप हमेशा हादसे के बाद ही होगा, तो एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब सिवाय राख के कुछ और बचेगा ही नहीं और वे प्रश्न निरंतर धधकते ही रहेंगे जिनका उत्तर हमने समय रहते माँगा नहीं।







