स्नेहिल नमस्कार मित्रों
बच्चे लड़ते हैं, झगड़ते हैं और उन्हें पता भी नहीं चलता कब फिर से एक हो जाते हैं, उनकी राग-रागिनी, सुर-ताल की बार-बार लय भंग होती हैं लेकिन वे फिर से वही तरन्नुम, तराने ले लयबद्ध हो जाते हैं। मज़ेदार बात यह है कि कोई छोटी-मोटी बात लेकर बच्चे पहुँचे नहीं कि माता-पिता के मुँह फूल गए। कुछ सोचने, समझने अथवा बच्चों को सही बात समझाने की जगह वे स्वयं तो बच्चों जैसे रूठ जाते ही हैं,बच्चों को भी कुछ ऐसी बातें कह जाते हैं कि उनके मन की नरम मिट्टी में कड़वे बीज एक बार जो डले, उनका पेड़ बनकर ही रहता है लेकिन यह पेड़ प्रेम की छाया देने वाला नहीं होता बल्कि ऐसा होता है जिसकी टहनियाँ पात, फल-फूल विहीन होती हैं और कभी कभी तो ताउम्र ही वे क्रोध, अहं, ईर्ष्या के साथ अपने जीवन की यात्रा को कठिन और कठिनतर बनाते रहते हैं। हाँ, तब ऐसा हुआ था…. और इसी पीड़ा के साथ उनके जीवन का अंतिम चरण आ जाता है लेकिन वे उन्हीं बातों को दुहरा दुहराकर बेचारे से बनकर घूमते रहते हैं। जिनके कारण उनके मन में बालपन में कड़वाहट का बीज बो दिया गया था शायद उन्होंने तो तभी उस बीज को निकालकर फेंक दिया था लेकिन कोई ऐसा अंश उस नरम मिट्टी में रह जाता है जो प्रेम जैसी नियामत को सुंदर रूप में पनपने नहीं देता। हाँ, उनमें से कितने तो कुछ देर में सब कड़वाहट भूलकर बैस्ट फ़्रैंड्स बन जाते हैं लेकिन माँओं और कभी पिताओं के मन में भी जो एक बार पक गया, वो पक गया। एक बार ऐसा हुआ था, से बात शुरु होती और बस सब नकारात्मक होता चला जाता।
बड़े लोग जो बीजों की सिंचाई, खाद-पानी देते हैं कभी वह खाद निकृष्ट होती है उससे उनमें पत्ते तो नहीं निकलते हाँ जड़ें मज़बूत होती जाती हैं क्यों कि बड़े उन कटुताओं को दोहराना ही नहीं छोड़ते। वही बीज उगता है जो अनजाने में डाल दिया गया था। कभी कभी माता-पिता दूसरों के बच्चों के साथ ऐसा व्यवहार करने लगते हैं जो उन्हें बिलकुल शोभा नहीं देता और जब घूमफिरकर उनके सामने या उनके बच्चों के सामने वैसा ही व्यवहार आता है तो उन्हें फिर से बरसों पुरानी बातें याद आने लगती हैं और भीतर फिर से नकारात्मक विचार भरने लगती है। हम भूल ही जाते हैं कि कहीं हमारी गलती भी तो रही है। हमें भी तो समझना होगा कि जैसा व्यवहार हम चाहते हैं कि हमारे साथ, हमारे परिवार व बच्चों के साथ हो, हमें भी तो पहले देना होगा तभी तो उसके एवज में हमारे भीतर प्रेम के गवाक्ष से सुगंधित, प्रेमिल बयार पहुँच सकेगी।
मनुष्य का हर विचार, हर शब्द और हर कर्म एक बीज के समान होता है। जैसे खेत में बोया गया बीज समय आने पर उसी रूप में फल देता है, वैसे ही हमारे कर्म भी एक दिन हमारे जीवन में लौटकर आते हैं। यदि हम प्रेम, सम्मान, दया, ईमानदारी और सहयोग के बीज बोएंगे, तो विश्वास, अपनापन और सुख के फल प्राप्त होंगे ही। लेकिन यदि हम घृणा, छल, अपमान और स्वार्थ के बीज बोएँगे, तो अंततः वही कड़वाहट हमारे जीवन में लौटेगी।
जब भी किसी के साथ व्यवहार करें, एक क्षण के लिए यह सोचना आवश्यक है कि यदि सामने वाला व्यक्ति अपना बेटा, बेटी या परिवार का सदस्य होता, तो हम उसके साथ कैसा व्यवहार चाहते? क्या हम चाहते कि उसे अपमान मिले, अन्याय मिले, कठोर शब्द सुनने पड़ें या उसे धोखा दिया जाए? यदि नहीं, तो फिर किसी और के साथ वैसा व्यवहार क्यों?
हर व्यक्ति किसी न किसी का बेटा, बेटी, पिता, माता या प्रियजन होता है। जिस सम्मान, सुरक्षा, अवसर और करुणा की अपेक्षा हम अपने व अपने से जुड़े लोगों के लिए करते हैं, वही लौटाने का अधिकार सबको है। समाज तभी सुंदर बनता है जब हम अपने परिवार तक सीमित न रहकर हर व्यक्ति के साथ वही संवेदनशीलता रखें जो अपने प्रियजनों के लिए रखते हैं।
कर्म का नियम अटल है, जो बीज आज हम बो रहे हैं, कल वही वृक्ष बनकर हमारे सामने खड़ा होगा। इसलिए बेहतर है प्रेम, विश्वास, न्याय मानवता और इन सबमें स्नेह बोएं। अंततः वही हमें सुकून दिलाएगा।सबसे प्रेम कर सकें, इससे सुंदर और कुछ हो ही नहीं सकता क्योंकि प्रेम वृत्त में रहकर कभी नहीं पनप सकता, विस्तार नहीं पा सकता। सो… प्रेम वृत्त में… कभी नहीं, फ़िज़ाओं में महकने दें न उसे!!






