स्नेहिल नमस्कार मित्रो
मित्रों! यह संस्मरण हाल में पढी पुस्तक ‘बेधड़क दरोगा जी’ जिसके लेखक देवेन्द्र कुमार हैं, उसे पढते हुए, बालपन के पीले पृष्ठों को पलटते हुए कलमबद्ध हुआ है।एक बात जिसने दिलोदिमाग़ से यह पूछा कि क्या बालपन की गलियों से ग़ुज़रने पर हम जिस प्रेम से आनंदित होते हैं वह प्रेम किसी वृत्त में कैद हो सकता है?
मेरे लिए यह बात रोमांचक रही कि जिन सड़कों, गलियों, किरदारों का वर्णन इस पुस्तक में किया गया है , उनमें से काफ़ी मेरे चिरपरिचित हैं। बिलकुल,कुछ भी याद नहीं था लेकिन जैसे ही मैं पुस्तक से गुज़रती गई ,मैंने कई बार अपने अपने आपको उन किरदारों का सहयात्री महसूस किया जिनको मैं पढ रही थी और उनमें से कुछ को बचपन में देख चुकी थी। यद्धपि मैं न तो उन सड़कों,गलियों में खेली थी ,न ही मेरा उन चरित्रों से कोई खास संवाद हुआ होगा।
लेखक कहते हैं; जो अंदर था, वह बाहर निकला। यह सब उनके अनुसार संस्मरणों का लेखा जोखा है। यह साहित्य सृजन न होकर भोगे हुए लोगों, घटनाओं, का संग्रह भर है। जहाँ तक मेरी दृष्टि जाती है भोगा हुआ पल कलम की नोक पर बैठकर जब समाज के समक्ष उतरता है, पाठक के पास पहुंचता है और उसे भी अपने साथ यात्रा करने के लिए बाध्य कर देता है,यह लेखक की बहुत बड़ी सफ़लता होती है। अपनी बात को सहज ,सरल रूप से पाठक तक पहुंचाना ही महत्वपूर्ण है ,संस्कृतनिष्ठ भाषा की आवश्यकता?
लेखक ने उस जमाने की सभी घटनाओं की चित्रात्मकता से पाठक-मन को आकर्षित किया है। बंदर का नाच, भालू वाला, सपेरा,ये सब अपने-अपने करतब दिखाते हुए सड़कों,गलियों में फेरी मारते रहते। बंदर का नाच दिखाने वाले के हाथ में डुगडुगी होती और होती एक ऐसी सख्त डंडी जिसे वह अपने कंधों पर पीछे से लेजाकर कुछ क्रॉस बनाकर रख लेता, डंडी के एक ओर बंदरिया लटकती कलाबाज़ियाँ सी खाती रहती ,बंदर मदारी के सिर पर होता या गर्दन में झूलता रहता।एक हाथ से डुगडुगी बजाता हुआ वह उन गलियों में जरूर घूमता जहाँ वह जानता, समझता था कि बच्चे अभी उसे घेर लेंगे। कभी बच्चों को माँ की चिरौरी करके पैसे मिल जाते तो कभी नहीं भी मिलते और बच्चा रूआँसा हो जाता।
उन दिनों कुछ फिल्मों के गाने गाते लड़के ‘तन डोले, मन डोले, मेरे दिल का गया करार रे,गाते दिखाई दे जाते और बेटियों की माँएं उन्हें झिड़कती रहतीं कि वे वहाँ से हट जाएं जहाँ ये शोहदे उनकी बेटियों पर डोरे डालने की कोशिश कर रहे होते।
लेखक ने तो कुछ शब्दों में ही इन सब बातों का ज़िक्र किया है, मैं तो पूरी तरह उन्हीँ चित्रों में लिप्त हो गई और उनका पूरा गाना ही मुझे याद आ गया, ‘चना जोर गरम, बाबू मैं लाया चनाज़ोर गरम !मेरा चना बना है आला, जिसको खाते मोटे लाला, जिनके पेट में लगता ताला,’ साथ ही अपनी माँओं के पल्लू की गाँठ खुलवाकर पैसे लेकर चने वाले के पीछे चिल्लाकर भागते बच्चे “भैया! चने वाले भैया रुको” और सबसे मज़ेदार बाइस्कोप के बड़े से बक्से को सिर पर टिकाए ज़ोर ज़ोर से पुकारता बाइस्कोप वाला ‘बारा मन की धोबन आई से शुरू करके दुनिया की सैर करवा देता। जो उस बक्से जैसी चीज़ में लगे कुछ बड़े बड़े छेदों में लगे ढक्कन को खोलकर एक डिब्बे में आँखें गड़वाकर सैर कराता , नौ मन की धोबन, जर्मनी का हिटलर,गाँधी बापू, आगरे का ताजमहल,दिल्ली की कुतुबमीनार की सैर करवाता। मुझे कुछ चीजें ऐसे याद आने लगीं जैसे मैं इस पूरी यात्रा का भाग रही हूँ।
उस ज़माने में शहर में गिने-चुने दो-तीन फ़िल्म टॉकीज़ होंगे, जिनमें प्रकाश टॉकीज़ बड़ा प्रसिद्ध था। इनमें जब कोई फिल्म लगती ताँगे या पैडल रिक्षा में एक बंदा भौँपू से फिल्म की पब्लिसिटी करता और उसके बोलने के बाद‘ उडें जब जब जुल्फें तेरी, कवारियों का दिल मचले’ गाने का रेकॉर्ड बजने लगता फिर 1,2,3 शोज़ की सूचना, नया दौर.. फिल्मी चमकते सितारे दिलीप कुमार, मधुबाला! यानि फिल्म के सितारों व गानों का परिचय बड़े रुचिपूर्ण ढंग से करवाया जाता। कुछ बच्चे उन रिक्शा या टांगों के साथ नाचते कूदते भी चलते दिखाई दे जाते और हम जैसे कुछ बच्चे जिन्हें यह सब एलाउड़ नहीं होता था अपने छत के छज्जे से लटके नीचे तब तक देखते जब तक वह दूसरी ओर न मुड़ जाता,आँखों से ओझल न हो जाते और हमें न जाने कितनी देर से आवाज़ लग रही होती,तब हमें सुनाई देती जब वह पब्लिसिटी वाला बंदा आँखों से बिलकुल ही ओझल हो जाता।
उन दिनों मुहल्ले मेँ कोई अंकल,आँटी नहीं, सब चाचा,ताऊ, मामा-मामी, भैया, जिज्जी होते थे। आँटी अंकल से काम न चलता, सारे रिश्ते.. अपने अप बन जाते थे टीचर, की टीचरनी, डाक्टर की डाक्टरनी,मास्टर की मास्टरनी, पंडित की पंडताइन—सब ही अपने आप बनते जाते थे और उनका सम्मान भी परिवार की भाँति होता।
लेखक ने लाला हीरालाल की तिमंजली हवेली, उनके मकान के बराबर में लकड़ी की टाल, पास खंजड़े की सड़क, दो प्लाट बाद एक खुले मंज़िले मकान में इस कहानी के मुख्य पात्र, हीरो, बघरे के पुराने जमींदार नत्थूलाल जी, इलाके के गणमान्य बुज़ुर्ग,रौबदार व्यक्तित्व, अच्छी सेहत, अलग-अलग तरह की पोषाकें पहनने वाले बेटे के साथ पर ठाठ बाट से अकेले अपने कमरे में रहने वाले जिनका कमरा सड़क पर खुलता जो लेखक के घर से स्पष्ट दिखता। उनका आफिस कम रैज़िडेंस, पत्नी,बहू दो पोतों के साथ अंदर वाले भाग में! घर के पिछवाड़े दाई को एक कमरा दिया हुआ था। तीन तरफ़ सड़क, अगले घर में इंटर कॉलेज के साइंस मास्टर! इन सबका चित्र लेखक ने इतना इतना सजीव चित्रण किया है कि वे पाठक के सामने विचरण करते हुए प्रतीत होते हैं।
ये महानुभाव नत्थूराम सबसे राम राम की उम्मीद करते, किसी ने नहीं किया तो जोर से खुद ही देते। जमींदारी चली गई,पर उनकी आदतें, औरों से अलग वर्दी जैसे कपड़े, मौसम के अनुसार टोपियाँ, सर्दियों में खूब ढके रहना, गरम, मोजे, गरम पजामा, उस पर भी घुड़सवारोँ सी पट्टी कसकर लपेटना, खाँसकर अफने आने की सूचना कि बहू बेटियाँ सर ढकें या चली जाएं। बूढा शेर अपनी गुफा से जा रहा, छोटे जानवर सावधान हो जाएं, उनके बाप दादा/ जमींदारी के नेक लोगों में माने जाते। स्वतंत्र देश का वातावरण, जमीदारी उन्मूलन के तहत रातों रात साधारण जमीदारी छोड़ देनी पड़ी लेकिन जमींदारी ने उनका पीछा कहाँ छोड़ा। घर के पीछे के भाग का एक कमरा जो उन्होंने सुखिया दाई को दिया हुआ था जिसे साथ लेजाकर आस पड़ौस की डिलीवरी उनकी पत्नी करातीं। लेखक बड़े फ़क्र से बताते हैं उनका जन्म भी सुखिया ने ही करवाया था।
उन महाशय का कोई भी काम भागकर करना और आशीष पाना जा डिप्टी बनेगा के आशीर्वाद का लेखक पर इतना गहन प्रभाव है कि उनके बड़े पद पर काम करने में भी वे वही आशीष मानते रहे और संभवत: आज भी स्वीकार करते हैं तभी तो उनके लेखन में आज भी वहाँ की सौंधी सुगंध उन्हें महसूस होती है। विभाजन के कारण पंजाबी परिवारों का आना, तंदूर गर्म होने पर सबका उसी तंदूर पर अपनी रोटी सेकना। स्त्रियों की लड़ाई का शोर होना। रोटी कमाने के लिए साबुन बनाना, कुल्फी बेचना, उन शरणार्थी परिवार के बच्चों का दोस्त बनना तरह तरह की बातों का बड़ा ही स्वाभाविक चित्रण किया गया है।
इसी कहानी-संग्रह की यह बड़ी मज़ेदार कहानी है जिसमें एक ही कहानी में न जाने कितने शब्द-चित्र उकेर दिए गए हैं कि वहाँ के वातावरण से परिचित होने के कारण मैं इसमें इतनी तल्लीन हो गई कि इतना बड़ा चित्रण हो गया। लेखक की 5वीं कक्षा में चुंगी स्कूल में पढ़ाई, 15अगस्त को प्रभात फेरी जिसमें बड़े उत्साह से बच्चे भारत माता की जय, महात्मा गाँधी की जय, और एक मज़ेदार नारा,पीली चवन्नी तेल में, सुहरावर्दी जेल में,जाने किसने इज़ाद किया होगा यह नारा लगाने में मज़ा लेते, पढाई करनी नहीं, स्कूल से गुलदान के लिफ़ाफ़े लेकर मीठे स्वाद के लालच में बच्चे 15अगस्त को स्कूल जाते।
इस पुस्तक के चित्रात्मक वर्णनों से गुज़रते हुए मैं उन्हीं में से एक बन गई थी। आप सब मित्रों से इसे साझा करने का मोह न रोक सकी। आशा है, आप सबमें से भी कुछ मित्रों की स्मृति हरी हो जाएं। पढिए और सोचिए कि कौन से दृश्य आपकी दृष्टि में सिमट आए हैं। क्या प्रेम कभी भी किसी कैद में, वृत में सिमटा रह सकता है?







