सभी मित्रों को
स्नेहिल नमस्कार
आशा है सभी आनंद में हैं।
देखा जाए तो जो परिस्थितियाँ संपूर्ण विश्व में चल रही हैं वे न तो आनंददाई हैं और न ही उत्साह वर्धक!
जब अपने चारों ओर मनुष्य परेशानियों का जंजाल देखता है, कहीं युद्ध का तांडव है तो कहीं प्राकृतिक आपदाएं! कहीं बेकार की बहस है तो कहीं बेकार की चुनौती! कहीं झूठ, आत्मसम्मान है तो कहीं व्यर्थ की तालियाँ बजवाने से झूठे अहं व तृप्ति का एहसास! कहीं स्वायत्व के खोने का भय तो कहीं असुरक्षा का एहसास ! ऐसी परिस्थितियों में आम आदमी का चैनों-करार कैसे बचा रह सकता है?
जीवन में चुनौती लेनी आवश्यक है, वैसे हम उन्हें पुचकारकर अपने पास आने के लिए निमंत्रण नहीं देते किन्तु जीवन भी तो एक चुनौती ही है। यह तो हर पल चुनौती है और उसे स्वीकारना हम मनुष्यों का फ़र्ज़ है क्योंकि हम कुछ बातों को ,घटनाओं को यदि न भी चाहें तब भी हमें उनसे बाबस्ता होना पड़ता है और होना पड़ता है सोचने के लिए बाध्य कि समाज का एक जागरूक अंग होने के बावज़ूद क्या हम उन नित्य ,दिन-दैन्य की चुनौतियों से पीछा छुड़ाकर आनंदित रह सकते हैं?
जीवन की गति हम कहाँ जानते हैं। जो होना है, होना ही है। हम कितना भी जूझ लें,अपने जीवन से अमुक बातों को कभी नहीं निकाल सकते। हाँ, यदि समझें केवल प्रेम को तब शनै: शनै:सभी समाधान पा जाएं।
हम सब ही इससे तो परिचित हैं ही कि संसार का हर एक व्यक्ति तीन नियमों से बंधा हुआ है। एक दिन हम दुनिया में आए थे, अभी जीवित हैं और एक दिन दुनिया से जाना है। आने और जाने का समय तो निश्चित है ही,बस बीच के समय को कैसे जीना है ये हमें चुनना है। क्या सही है क्या गलत? यह सबकी अपनी-अपनी सोच है लेकिन हमें क्या पसन्द है क्या नापसंद? इसके बारे में हमें खुद ही सोचना होगा।
हमें अपना पसंदीदा काम करना है लेकिन स्नेह और प्रेम के साथ! इसलिए यह कहा जाता है कि अपना समय नष्ट न करें। समय एक ऐसा तोहफा है जो हमें कभी भी वापिस नहीं मिलेगा। इसका जो हिस्सा हमने गुजार लिया वो गया, चाहे वो कैसे भी गुजरा हो। उसमें से हम एक सेकंड भी वापिस हासिल नही कर सकते!
इसीलिए हम इतने बहुमूल्य समय का इस्तेमाल बहुत सोच समझ कर करें तो बेहतरी है। चाहे तो इस समय को हम अपने ज्ञान को बढ़ाने, मौज-मस्ती में, परिवार के साथ, या अपनी काबिलियत को इस्तेमाल करने में लगा दें,उसे तो बीतना है। बीत ही जाएगा किन्तु हम कहाँ खड़े रह जाएंगे,पता ही नहीं चलेगा।
समय ऐसी द्रुत गति से हाथ से रेत की भाँति फिसल जाता है कि हम ताकते रह जाते हैं ओर बाद में सोचते हैं कि हम उस समय की उपयोगिता प्रेम से, विवेक से क्यों नहीं कर पाए ? होता यह है कि हम उन क्षणों में चैतन्य नहीं रह पाते। चाहे तो प्रेम से सबका मन जीत लें और चाहें तो ईर्ष्या,द्वेष से मन दुखी करके, जीवन-यात्रा को समय बर्बाद करके जीवन को ही। इसका निर्णय हमें स्वयं करना है बस इतना याद रखना है कि यह कभी भी लौट कर नहीं आएगा।
मनुष्य का मन बहुत चंचल होता है। इसे काबू में रखना आसान नहीं है। यदि हम ने इसे काबू में कर लिया तो समझिये हम नकारात्मकता, बुरी आदतों, अहंकार, गलत संगत या यूं कहें कि जो भी नेगेटिव एनर्जी है उससे दूर होने की राह पर अग्रसर हो सकते हैं।
प्रेम की विशुद्ध भावना से हमारे जीवन मे सच्चाई, अच्छाई, ईमानदारी, सात्विकता आने लगती है। फिर हमें अपने अंदर की बुराइयों से लड़ने की जद्दोजहद नही करनी पड़ती। मन शांत हो जाता है। ईर्ष्या, नफरत और तनाव खत्म हो जाता है। सच्ची खुशी और शांति प्राप्त होती है। यही प्रेम व आत्म सशक्तिकरण का रास्ता है।
हमें समझ में आता है कि प्रेम कभी वृत्त में नहीं रहता, वह स्वतंत्र है। हर स्थान पर है, हर दिशा में है। मेरे मन में है,आपके मन में है। इसके-उसके सबके मन में है और इसीलिए वह ईश्वर प्रदत्त वह प्रसाद है जो प्रत्येक परिस्थिति में हमें अडिग रखता है। बस पहचानने भर की देरी है, लम्हा भर!
सभी प्रेम में रहें इसी से आनंदित रह सकेंगे।
सस्नेह







