जून-जुलाई 2026
कॉमेडी का काम है हँसाना, सोचने पर मजबूर करना। हँसी, यदि आत्मा को हल्का करे, तो कला है। लेकिन यदि यह किसी की गरिमा कुचलकर पैदा हो रही है, तो केवल सस्ता शोर बन रह जाती है।
इन दिनों हमारा समाज एक ऐसे संक्रमणकाल से गुजर रहा है, जहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक मर्यादाओं के बीच की रेखा निरंतर धुँधली होती जा रही है। पहले जो भाषा चौंकाती थी, आज वही “कॉमेडी” कहलाने लगी है। जो बातें कभी निजी दायरे में भी सोचने से लोग झिझकते थे, आज मंच पर तालियों के साथ परोसी जा रही हैं।
डिजिटल मनोरंजन के बढ़ते प्रभाव ने न केवल हास्य की शैली बदली है, बल्कि भाषा, सोच और संवेदनशीलता के समस्त मानकों को भी पुनर्परिभाषित किया है। प्रश्न केवल यह नहीं है कि हास्य की क्या सीमाएँ हैं, बल्कि यह भी है कि क्या हम एक ऐसे समाज में परिवर्तित होते जा रहे हैं जहाँ अश्लीलता और असंवेदनशीलता को सामान्य मान लिया गया है?
हमारे सामने आज सबसे गंभीर प्रश्न अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नहीं, बल्कि इस मानसिक क्षरण का है। बेहूदे स्टैंडअप कॉमेडी शो हों या सामाजिक व्यवहार के अन्य उदाहरण, समस्या केवल मंच पर खड़े कलाकारों तक सीमित नहीं रह जाती, बल्कि उन दर्शकों तक भी फैली हुई है जो स्वेच्छा से इन कार्यक्रमों का हिस्सा बनते हैं, महंगे टिकट खरीदते हैं और अश्लीलता पर हँसकर उसे वैधता प्रदान करते हैं।
ध्यातव्य रहे कि यहाँ स्त्री-पुरुष दोनों ही सक्रिय भागीदार हैं। अभी लेटेंट की बात हम भूले भी नहीं थे कि वही घृणित भाषा फिर सुनने को मिल गई। एंकर और कार्यक्रम के एक दर्शक के मध्य संवाद के बाद अब एक महिला डॉक्टर का वीडियो भी सामने आया है जिसमें उसने एक निर्जीव देह के प्रति जो असंवेदनशील और उपहासपूर्ण मानसिकता उजागर की है, वह इस गिरावट की भयावह परिणति को सामने लाती है। यद्यपि उसने क्षमा माँग ली है परंतु प्रायः ये औपचारिक क्षमायाचनाएँ एक मुखौटा भर हैं जो परिणामों से बचने का प्रयास होती हैं, न कि सोच में वास्तविक परिवर्तन का संकेत। घटिया मानसिकता यूँ ही शब्दों से धुल नहीं जाती।
आश्चर्य की बात यह भी है कि उक्त कार्यक्रम में उपस्थित एक भी दर्शक इसका विरोध करता नहीं दिखाई दिया। यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न उभरता है कि क्या भीड़ का मनोविज्ञान व्यक्ति की नैतिकता को धराशायी कर देता है? क्या मंच पर खड़े व्यक्ति के साथ वे लोग भी दोषी नहीं, जो इन अभिव्यक्तियों पर हँसते हैं, ताली बजाते हैं और उन्हें स्वीकार्यता प्रदान करते हैं?
दर्शक केवल निष्क्रिय उपभोक्ता ही नहीं होते, वे सांस्कृतिक प्रवृत्तियों के सह-निर्माता भी होते हैं। ऐसे में जब आपत्तिजनक भाषा पर सामूहिक हँसी गूँजती है, तो वह न केवल उस व्यवहार को वैधता प्रदान करती है, बल्कि उसे प्रोत्साहित भी करती है। जो लोग खुलकर हँसते हैं, वे प्रत्यक्ष समर्थन देते हैं और जो चुप रहते हैं, वे अनजाने में मौन स्वीकृति प्रदान कर रहे होते हैं।
यह स्थिति ‘सामान्यीकरण’ की प्रक्रिया का परिणाम है। जो बातें कभी अस्वीकार्य मानी जाती थीं, वे निरंतर पुनरावृत्ति के कारण धीरे-धीरे सामान्य लगने लगती हैं। यह बदलाव अचानक नहीं आता; यह हमारी आदतों में उसी तरह घुलता है जैसे चाय में चीनी। घुलने की प्रक्रिया प्रत्यक्ष नहीं दिखती, पर स्वाद बदल देती है।
कॉमेडी, मूलतः, समाज का दर्पण मानी जाती रही है। यह सत्ता से प्रश्न करती है, सामाजिक विसंगतियों को उजागर करती है और मनुष्य को आत्मालोचन के लिए प्रेरित करती है। परंतु जब यही कॉमेडी कमजोर वर्गों, स्त्रियों या पारिवारिक मूल्यों का उपहास करती है, तो अपने मूल उद्देश्य से भटक जाती है। तब यह विचारोत्तेजक नहीं, बल्कि उत्तेजक बनकर रह जाती है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने अभिव्यक्ति को जिस तीव्रता से लोकतांत्रिक बनाया है, उसी गति से इससे जुड़े उत्तरदायित्व के बोध को विकसित नहीं कर पाया है। ‘वायरल’ होने की होड़ में हदें पार की जा रहीं हैं। विवाद को लोकप्रियता का साधन माना जाने लगा है और दुर्भाग्य से दर्शकों की प्रतिक्रिया इस प्रवृत्ति को और मजबूत करती है।
यह स्थिति केवल हास्य तक सीमित नहीं है; यह हमारे सामाजिक चरित्र को भी प्रभावित कर रही है। आए दिन नेता, अभिनेता, मीडियाकर्मी एवं अन्य कई क्षेत्रों से जुड़े लोगों का ठसक भरा असंवेदनशील व्यवहार देखने को मिलता है। यह इंगित करता है कि समस्या कहीं गहरी है।
यह सत्य है कि वर्तमान सामाजिक परिवेश में विरोध दर्ज कराना कठिन है, परंतु यही लोकतांत्रिक चेतना की कसौटी भी है।
हमारी भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में हास्य का एक समृद्ध इतिहास रहा है, जिसमें व्यंग्य- विनोद के माध्यम से गंभीर बातों को भी सहजता से कहा गया है। परंतु उस हास्य में गरिमा और संवेदनशीलता का संतुलन बना रहता था। आज आवश्यकता इसी संतुलन को पुनर्स्थापित करने की है। परिवार और समाज के स्तर पर भी इस विषय पर संवाद आवश्यक है कि भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं होती, यह सोच और दृष्टिकोण को भी आकार देती है।
यदि हम भाषा और मानसिकता में आई गिरावट को यूँ ही टालते रहेंगे, तो यह प्रवृत्ति और गहराती जाएगी। यदि हम असहज है तो कहना होगा, खुलकर विरोध करना होगा; अन्यथा असंवेदनशीलता हमारी पहचान का स्थायी हिस्सा बन सकती है।
हास्य, जीवन का आवश्यक तत्व है, परंतु वह तभी सार्थक है जब वह किसी की गरिमा को आहत किए बिना जन्मे। अन्यथा, यह कला नहीं, संवेदनहीनता का उत्सव बन जाता है और ऐसे उत्सव किसी भी समाज के लिए शुभ संकेत नहीं होते।







