‘हॉर्न प्लीज़!’ दुनिया के अधिकतर देशों में अगर कोई सड़क पर आपके लिए हॉर्न बजाता है तो इसे एक बुरा और बेइज्ज़ती वाला इशारा ही माना जाता है। लेकिन अजीब बात है कि भारतीय उपमहाद्वीप की भीड़भाड़ वाली सड़कों पर दौड़ने वाली ज़्यादातर कमर्शियल गाड़ियों के पीछे आपको अपनी गाड़ी का हॉर्न बजाने का यह खुला निमंत्रण बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा हुआ मिलता है।
चाहे वे हेवी-ड्यूटी ट्रक हों, टैंकर हों, टेम्पो हों या छुटके से ऑटो-रिक्शा ही सही, सभी के पास आपके लिए यही उत्तम सलाह रहती है जबकि शोर का स्तर पहले से ही किसी नए डेसिबल की ऊंचाइयां क्यों न नाप रहा हो। हम अक्सर देखते हैं कि रंगीन बत्तियों से जड़े चौराहों पर ट्रैफिक जाम की बाढ़ आई रहती है और यूं बीच राह बेड़ियों से जकड़े जाने पर सभी गाड़ियों के पहिये और ड्राइवर दोनों ही फिर से आज़ाद हो उढ़ने के लिए हर पल बेचैन दिखते हैं। जैसे ही सिग्नल के साथ लगी डिजिटल घड़ी की उलटी गिनती लाल से हरी बत्ती होने के लिए आखिरी कुछ सेकंड का सफ़र तय करने वाली होती है, हॉर्न की आवाज़ में तेजी और कर्कशता उसके उल्टे अनुपात में बढ़ती जाती है। हर बेसब्र ड्राइवर सड़क पर पागलों की तरह भीड़ में दूसरों को अपने रास्ते से हटाने के लिए धमकाता दिखता है, भले ही बत्ती अभी हरी भी न हुई हो। ड्राइवर महोदय ज़रा-जरा सी बात पर हॉर्न बजाते हैं और ज़्यादातर सिर्फ़ अपनी चिल्लपों से दूसरों को धमका कर रास्ते से हटाने के लिए ताकि वे दूसरों से आगे निकल सकें चाहे वे सभी तय स्पीड लिमिट से ज़्यादा तेज़ ही क्यों न चल रहे हों। जब रात में कम भीड़-भाड़ वाले चौराहों पर जलती-बुझती सिग्नल लाइटें सावधानी मोड पर रखी रहती हैं, तो ज़्यादातर ड्राइवर क्रॉसिंग पर धीमा होने के बजाय, साइड रोड से आ रहे किसी ट्रैफ़िक से टकराने की चिंता किए बगैर, बिना रुके, तेज़ स्पीड से हॉर्न बजाते हुए निकल जाना ही पसंद करते हैं।
गाड़ियों की बेहिसाब बढ़ती संख्या को देखते हुए, भारत में घनी आबादी वाले शहरों में हॉर्न के शोर की समस्या गंभीर से बढ़ कर इतने खतरनाक स्तर पर पहुँच गई है कि गाड़ियों के हॉर्न बजाने से होने वाला ध्वनि पॉल्यूशन हमारे पर्यावरण में होने वाले सभी पॉल्यूशन का 70% हिस्सा बन गया है। यह तब है जब ट्रैफिक सिग्नल और दूसरे साइलेंट ज़ोन जैसे हॉस्पिटल, स्कूल, धार्मिक स्थलों और रिहायशी इलाकों में हॉर्न बजाने पर रोक लगाने वाला कानून पहले से ही बना हुआ है। लेकिन ज़्यादातर ड्राइवरों को न तो ऐसे कानूनों की रत्ती भर परवाह होती है और न ही कानून लागू करने वाली एजेंसियों को इस खतरे को रोकने की कोई इच्छा। यहाँ तक कि भारत में बिगड़ैल ड्राइवरों के इस्तेमाल के लिए विदेशी कारें बनाने वाली कंपनियाँ भी उन कारों में इलेक्ट्रोमैकेनिकल हॉर्न लगाती हैं, जो पश्चिम में आम तौर पर इस्तेमाल होने वाले इलेक्ट्रॉनिक हॉर्न की तुलना में कहीं अधिक तेज़ आवाज़ करते हैं और इसलिए भी पसंद किए जाते हैं क्योंकि वे ज़्यादा समय तक काम करते हैं।
सभी जानते हैं कि हमारे आस-पास लगातार हॉर्न बजने से सेहत पर बुरा असर पड़ता है, जिससे हम गुस्सा, स्ट्रेस, डिप्रेशन और हाइपरटेंशन जैसे बीमारियों के शिकार बनते हैं, और इससे भी बुरा, हमारी सुनने की क्षमता और याददाश्त कम होती जाती है। विडंबना है कि जहाँ ज़्यादातर ड्राइवर दूसरों पर हॉर्न बजाकर अपनी फ्रस्ट्रेशन और टेंशन निकालते हैं, वहीं वे खुद भी अनजाने में अपने इस बुरे बर्ताव का शिकार हो जाते हैं। लेकिन फिर भी उनमें से ज़्यादातर ट्रिगर-हैप्पी लोग गाड़ी चलाते समय अपनी उपद्रवी प्रवृत्ति का प्रदर्शन हॉर्न पर हाथ धरे ही करते हैं और वे ऐसी धृष्टता की जुर्रत कर पाते हैं क्योंकि अधिकतर अपनी इन अजीब हरकतों बावजूद ट्रैफिक पुलिस को नींद से जगाए बिना बच निकलते हैं। बेशक, भारत की सुप्रीम कोर्ट ने 2005 में रिहायशी इलाकों में रात होने के बाद हॉर्न बजाने, तेज़ म्यूज़िक बजाने और पटाखे फोड़ने पर बैन लगा दिया था, पर हम सब जानते हैं कि उन ट्रक-ड्राइवरों को काबू में करना हमेशा से टेढ़ी खीर रहा है, रात में सड़कों पर केवल जिनका ही साम्राज्य चलता आया हो। कुछ साल पहले हम साउथ दिल्ली में एक डिस्ट्रिक्ट पार्क से लगा सरकारी मकान पाकर बहुत खुश थे और उसकी हरियाली की ठंडी छाया में सुबह-शाम टहला करते थे और बच्चे वहां के डियर पार्क में जानवरों को सहलाने और झील में बतखों से खेलने का आनंद उठाते थे। लेकिन आधी रात के अंधेरे में हमारे घर और पार्क के बीच की उस समय सुनसान रहने वाली सड़क पर पसरी वीरानगी का फायदा उठाते, इन्हीं ट्रिगर-हैप्पी ट्रक-ड्राइवरों की जात में से कुछ, अक्सर चोरों की तरह आ घुसते और प्रेशर हॉर्न पर हाथ बैठाए तेज़ी से आंधी-तूफान की तरह लोगों की नींद को अपने उड़नखटोले में साथ ले उड़ते। अब, जब हम दूसरे इलाके में अपने घर में चले गए हैं, तो उनका यह खलनायकी किरदार कुछ पुलिसवालों ने अपना लिया है जो आधी रात को सड़कों पर लगातार हॉर्न के ही बड़े भाई सायरन को पीपनी की तरह बजाते, गाड़ियां दौड़ाते रहते हैं जिससे वे किन्हीं चोर-उचक्कों को कम मगर हम में नींद से महरूम आत्माओं को ज़्यादा डराए रहते हैं।
सोचने की बात है कि हम फिर अपने आस-पास लिखी ‘हॉर्न प्लीज़’ की अजीब सी रिक्वेस्ट को आज भी कैसे बर्दाश्त कर लेते हैं। मगर मेरी मानें तो इनसे घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है। ये रिक्वेस्ट तो लगभग सौ साल पुरानी किन्हीं लुप्त प्रथाओं की अवशेष मात्र ही है, जब सड़कें सिर्फ़ सिंगल-लेन हुआ करती थीं और कमर्शियल ड्राइवरों के लिए यह समझदारी की बात थी कि वे अपने पीछे चल रहे ड्राइवरों से कहें कि वे हॉर्न बजाकर उन्हें उनके आस-पास होने या ओवरटेक करने की ज़रूरत के बारे में सजग करें। लेकिन ये साइन तब इतने आम थे कि अब ये कमर्शियल गाड़ियों के आर्ट वर्क का अटूट हिस्सा बन चुके हैं, जिससे ड्राइवर पारंपरिक रूप से अपनी गाड़ियों को सजाते आए हैं।
ऐसे क्लासिक आर्ट वर्क के साथ ही फिर आ जुड़ा था ट्रक-साहित्य जिसमें सबसे जानी-पहचानी टैगलाइन बनी: बुरी नज़र वाले तेरा मुँह काला। इसी महाकाली मंत्र के साथ ही चिपके तभी से चले आ रहे हैं वे सभी टोटके जो ट्रक ड्राइवरों को बुरी नज़र के प्रकोप से बचाने के लिए ईजाद किए गए थे जैसेकि पीछे आती किन्हीं बलाओं से छुटकारा पाने के लिए सींग उगाए, ड्राक्युला जैसे दाँत निकाले कोई राक्षसी चेहरा, किसी चुड़ैल की लहराती काली लटें और उसीके लिए हरी मिर्चों और नींबुओं का झुमका, या फिर सामने से आती किसी दूसरी बुरी नज़र से भी बचने के लिए बम्पर पर आगे ही मुँह फाड़े लटका कोई घिसा-पुराना जूता।
हॉर्न बजाने के इनविटेशन के साथ आज भी OK और TATA शब्द लिखे हुए मिलते हैं। इसके पीछे की कहानी यह है कि पुराने ज़माने में भारत में चलने वाले ज़्यादातर ट्रक TATA Group ही बनाता था। टाटा ऑइल मिल्स लिमिटेड कंपनी (TOMCO) ने ‘OK’ नाम से एक नहाने का साबुन 1930 के आस पास लॉन्च किया था जिसे उन दिनों के मशहूर हिंदुस्तान लीवर के लाइफ़बॉय साबुन के मुकाबले में खड़ा करने के लिए कंपनी ने अपने TATA ट्रकों के माध्यम से उसका ज़ोरदार प्रचार किया। ‘OK’ साबुन का निशान कमल का फूल था, जिसे बाद में सभी कमर्शियल गाड़ियों ने सहज अपना लिया और जिसके चलते आज भी उन दिनों के ट्रकों पर बनी अभी तक प्रचलित उन्हीं कलाकृतियों (ट्रक आर्ट) के अभिन्न हिस्से के तौर पर TATA और Horn Please के बीच में खिला हुआ कमल भी आसानी से देखा जा सकता है।
तो अगली बार जब आप किसी पुराने, खड़खड़ाते हुए टेम्पो या ट्रक के पिछले हिस्से पर ‘हॉर्न प्लीज’ लिखा हुआ देखें, तो बेहतर होगा कि मन के सुकून के लिए आप उसकी खड़खड़ाहट की लय के सुर के साथ उस बीते दौर की हसीन यादों में कुछ देर के लिए खो जाएँ न कि अपनी तेज़ रफ़्तार वाली चाल के रास्ते में रुकावट समझ उसे हटाने के लिए हॉर्न बजाने में किसी तरह की कोई जल्दबाज़ी दिखायें।







