एक दिन जब आकाश साफ़ हो, तब किसी ऊँचे स्थान पर बैठकर सुबह उगते सूर्य की छटा देखिए। और उसी स्थान से शाम को ढलते सूरज की छटा देखिए। ढलता सूर्य उगते सूर्य से कम प्रकाशमान नहीं होता है । वही बात वृद्धावस्था की है। बुढ़ापा के आते ही निराशाजनक स्वर सुनाई देते हैं , उस महायात्रा के रास्ते को कोई उत्साह पूर्वक स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होता हैं । बुढ़ापा कोई रोग नहीं. एक शारीरिक प्रतिक्रिया है। यह एक प्राकृतिक नियम है। प्रकृति के अधीन रहकर, प्रकृति के नियमों का पालन करते हुए हम वृद्धावस्था में होने वाली तकलीफ़ों को कुछ कम कर सकते हैं।
ज़रूरी यह भी है कि युवावस्था से ही हम को सचेत हो जाना चाहिए कि वृद्धावस्था आने पर शारीरिक और मानसिक बदलाव आते हैं, उसके साथ हम को सामंजस्य करना है। इस अवस्था के आगमन के समय हम लोगों को नियमित रूप से समय पर उठना, कुछ शारीरिक व्यायाम, निश्चित समय पर,पर सादा भोजन करना तथा अन्य छोटे छोटे नियमों का पालन करना चाहिए, तभी हम इस उम्र में आने वाले रोगों से दूर रह सकते है । इस अवस्था के सभी लोगों को इन बातों का ध्यान रखना चाहिए। हम उम्र के लोगों को अगर वे कुछ लापरवाही कर रहे हैं तो उन्हें भी सलाह दे सकते हैं तथा आपस में अच्छे विचारों का आदान-प्रदान करना चाहिए। जिस प्रकार से अंगारों पर राख को फूंक मार कर हटाया जाता है उसी तरह प्रयत्न पूर्वक व्यायाम, योगासन, आदि से शरीर के अन्दर जमी हुई गन्दगी को धीरे धीरे दूर किया जा सकता है। जीवन संध्या सुखद बनाने के लिए प्रयास करते रहना चाहिए।
मनुष्य के जीवन की चारों अवस्थाएँ बहुत महत्वपूर्ण हैं। सब एक दूसरे के साथ जुड़ी है। शैशव,तरुणाई, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था। शैशवावस्था के रंग ढंग, तरीक़े अलग होेते हैं। तरुणाई की अपनी ऊर्जा होती है। प्रौढ़ावस्था का सामर्थ्य उसकी योजनाकारिता भिन्न होती है। वृद्धावस्था मार्गदर्शन की क्षमता का सामर्थ्य रखती हैं। बढ़ती उम्र के साथ मनुष्य की मानसिक क्षमता कम हो जाती है। यह सोच गलत है। उनका अनुभव अन्तिम समय तक परिवार, समाज और राष्ट्र, संसार के लिए उपयोगी हो सकता है। बुजुर्गों में धैर्य, अनुभव और प्रदायिनी शक्ति होती हैं।
बुजुर्गों की जीवन संध्या कितनी सुखद होगी वह इस बात पर निर्भर है कि उन्होंने इसके लिए कितनी सार्थक योजना बनाई है। अगर इस अवस्था को सकारात्मक दृष्टि से स्वीकार करते हैं तो इसमें प्रसन्नता की अपार सम्भावनाएँ हैं। यह अवस्था तरुणाई का मार्गदर्शन होती है पर ज़रूरत इसकी है कि लोग उनकी सामर्थ्य को पहचान, उससे लाभ उठाएँ। यह सच है कि युवावस्था में अंकुश बिल्कुल भी नहीं सुहाता है परन्तु वृद्धावस्था का अनुभव और धैर्य अगर उसके साथ हो तो वह अपने विकास के मार्ग पर लाभ उठा सकता है। अतः सबसे अहम और दिमाग़ में रखने की बात है कि वे उनकी उपेक्षा न करें। यदि वृद्धावस्था चुका हुआ सामर्थ्य होता तो देश के सर्वोच्च पदो पर अनुभवी इन्सानों या यूँ कहिए बुड्ढों के चुने जाने का कोई अर्थ नहीं ही होता ।
हम वृद्धावस्था की उपलब्धियों के बारे अगर बात करते हैं तब हमारे सामने बहुत ज़्यादा और अनूठे उदाहरण हैं जैसे- जॉर्ज बर्नाड शॉ द्वारा रचित नाटक का मंचन उनके 91 साल की उम्र में किया गया था। वि॰ चर्चिल 60 वर्ष की उम्र में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बने थे। अटल बिहारी वाजपेयी वर्षों तक संसद के सदस्य रहे, पर 74 वर्ष की आयु में भारत के प्रधानमंत्री बने। भारत के अबुल कलाम आज़ाद ने एक वैज्ञानिक के रूप में 40 वर्षों तक कार्य किया ,पर 70 वर्ष की आयु में भारत के राष्ट्रपति के पद केलिए चुने गये थे। कांट (1724-1804 ) नामक एक महान लेखक ने अपने जीवन के अन्तिम दिनों में तीन प्रसिद्ध महान ग्रन्थों की रचना की थी । (1800और1802के बीच तीन ग्रंथ- तर्क शास्त्र, भौतिक भूगोल और शिक्षाशास्त्र)। गोस्वामी तुलसीदास जी ने 75 साल की अवस्था मे ‘राम चरित मानस’की रचना की थी।
कहने का तात्पर्य यह है कि जब तक प्रकृति मनुष्य के जीवन पर पूर्ण विराम नहीं लगाती, तब तक मनुष्य का उत्तरदायित्व और उपयोगिता समाप्त नहीं होती है। बच्चे माँग कर, श्रम कर कुछ हासिल करते हैं, प्रौढ़ों, युवाओं से हस्तान्तरित होने के बूते पर हासिल करते हैं, पर वृद्ध इन्सान मौन रह कर हासिल करना चाहता है। मौन ही उनकी भाषा है। एक बात और बूढ़े लोगों में परिवार,समाज और राष्ट्र को देने की सामर्थ्य के साथ ललक या यूँ कहें तीव्र इच्छा भी होती है। आवश्यकता इस बात कि है कि उनके सामर्थ्य का परिवार और समाज के लोगों को अहसास रहे। उन्हें हौसला देना है, हतोत्साहित नहीं करना है। दूसरी बात आर्थिक सम्पन्नता ही केवल मनुष्य के सामर्थ्य को नहीं बाँचती है। तीसरी बात, इस अवस्था में सामाजिक, मानसिक और संवेदनात्मक सुरक्षा की बहुत आवश्यकता महसूस होती है। अन्त में बहुत ज़रूरी बात कि उनकी भावनाओं का मज़ाक़ नहीं उड़ाना चाहिए।
अगर वृद्ध इन्सान हमेशा याद रखे कि वह ढलती संन्ध्या का मुसाफ़िर है, तो समाज के सभी वर्गों को भी बराबर याद रखना होगा कि सभी को इस अवस्था में आना है।





