मुझे ग़ालिब का यह शेर बहुत पसंद है :
वह बादा-ए-शबाना की सरमस्तियाँ कहाँ
उठिए! बस अब कि लज़्ज़त-ए-ख़्वाब-ए-सहर गई
अल्लामा इक़बाल जब ग़ालिब के मज़ार के दर्शन कर रहे थे तो मजार-ए-ग़ालिब पर एक नौजवान लड़का यही ग़ज़ल इस कदर दर्द भरे अंदाज़ में पढ़ रहा था कि इस शेर पर पहुँचकर इक़बाल भी आँखों से आँसू न रोक सके थे।
शायद अब रो पड़ने की बारी हमारी है।
क्यों?
इसलिए कि हमारे चारों ओर की दुनिया तेज़ी से डिजिटल हो रही है और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बनती जा रही है। चैट जीपीटी और दूसरे एआई टूल्स ने भाषा, लेखन और संचार माध्यमों में एक नई क्रांतिकारी तब्दीली पैदा कर दी है। ऐसे में बहुत से लोग यह सवाल कर रहे हैं कि क्या उर्दू, हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाएं इस तकनीक से ख़तरे में पड़ गई हैं? या फिर नई तकनीक में इन के लिए नए अवसर जन्म ले रहे हैं?
हमारा कहना यह है कि उर्दू, हिन्दी व इत्यादी भाषाओं के साथ जो भी हो, लेकिन एआई टूल्स की वजह से केवल उर्दू एवं हिन्दी इत्यादि ही नहीं, बल्कि हर भाषा की रचनात्मकता ख़तरे में पड़ गई है। ज़रा देखिए कि हमारी भाषाओं को संभावित ख़तरे कौन-से हैं। हम यह देख ही रहे हैं कि भाषाओं के इस्तेमाल में एआई टूल्स आमतौर पर औपचारिक (फ़ॉर्मल) भाषा को तरजीह देते हैं। इस औपचारिक भाषा की प्रकृति महज़ बुनियादी और खानापूरी वाली होती है जिसके नतीजे में भाषा की प्राकृतिक रवानी और क्षेत्रीय अभिव्यक्ति प्रभावित होती है।
लेकिन इसका सबसे बुरा असर यह है कि ज़्यादातर लोग इसे रचनात्मक लेखन के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। यह साहित्यिक और रचनात्मक बेईमानी की सबसे बदतर मिसाल है।
अब यही देख लीजिए; मैंने चैट जीपीटी से कहा कि ‘इश्क़ के शीर्षक पर एक कविता लिख दीजिए।’
चैट जीपीटी ने जो जवाब दिया, उसे देखिए। वह कहता है:
‘यह रही इश्क़ के विषय पर एक नई और दिल से लिखी गई कविता…’
इश्क़
इश्क़ कोई शब्द नहीं,
जो होंठों से कहा जाए,
ये तो वो ख़ामोशी है
जो आँखों से बह जाए।
इश्क़ कोई सौदा नहीं,
जो तौल के निभाया जाए,
ये तो वो आग है
जिसमें खुद को जलाया जाए।
कभी मुस्कान बनकर
लबों पे ठहर जाता है,
कभी आँसू बनकर
पलकों से उतर जाता है।
ना इसकी कोई मंज़िल है,
ना कोई रास्ता तय,
इश्क़ तो बस इश्क़ है,
बेहद, बेपरवाह, और निस्सहाय।
जो मिल जाए तो इबादत,
जो ना मिले तो दुआ,
इश्क़ हर हाल में
दिल की सबसे सच्ची सदा।’
अब बताइए, एआई भी कह रहा है कि यह कविता उसने दिल से लिखी है। एआई के पास दिल कहाँ है भाई? और अगर है भी, तो क्या एआई के उस दिल में भी इंसानों की तरह जज़्बात और एहसास मौजूद हैं कि वह दिल से कविता लिख रहा है? है न कमाल की बात?
नवोदित लोग तो इसे मानवीय कोशिश ही समझेंगे। वरिष्ठ साहित्यकार अपने अनुभव और अभ्यास के आधार पर शब्दों की बनावट, प्रवाह, प्रभाव और ताज़गी का अंदाज़ा आसानी से लगा लेंगे लेकिन आम पाठक के लिए कई बार इस साहित्यिक चोरी को पकड़ना मुश्किल हो जाता है। हमने देखा है कि नई पीढ़ी के कई लोग मशीन से बनी रचनाओं का बिना किसी झिझक के इस्तेमाल कर रहे हैं। न उन्हें किसी का लिहाज़ है और न ही ईमानदारी का एहसास।
गद्य में तो यह काम और भी आसान नज़र आता है। शुरुआत में जब दोस्तों ने इसका ज़िक्र किया तो हमें यक़ीन नहीं हुआ कि भला कोई मशीन कविता कैसे कर सकती है? कविता तो एहसासात और जज़्बात का काम है, और किसी मशीन में एहसास और जज़्बा कहाँ? लेकिन श्रीमान, हमने देखा कि हमारी पीढ़ी के बाद वाली पीढ़ी यानी जेन-ज़ी धड़ल्ले से मशीन को अपने इशारों पर नचा रही है और मशीन की मेहनत को अपने नाम से छपवाकर सरकारी संस्थानों से ‘इनाम-ए-हुस्न-ए-ख़िदमत’ यांनी मौल्यवान सेवा अथवा योगदान पुरस्कार भी समेट रही है।
क्या यह साहित्यिक बेईमानी और ख़यानत नहीं है कि कोई व्यक्ति मशीन से निबंध लिखवाए और अपने नाम से प्रकाशित कराकर वाहवाही बटोरे? फिर कोई असली, मौलिक रचनाकार कैसे पैदा होगा? इस मामले में तो हम पहले ही असली साहित्यीक जनों के वास्तविक अकाल से गुज़र रहे हैं, उस पर ये लोग! इस स्थिति ने रचनात्मक क्षमताओं में कमी की हालत पैदा कर दी है। चूँकि एआई तुरंत सामग्री उपलब्ध करा देती है इसलिए इस बात की पूरी संभावना है कि बहुत से लोग खुद लिखने की प्रक्रिया छोड़कर मशीनों पर निर्भर हो जाएँ। यह स्थिति लंबे समय में भाषा की रचनात्मक वृद्धि के लिए हानिकारक होगी।
अगर मशीनी अनुवाद की बात करें तो कई एआई मॉडल अभी तक उर्दू, हिन्दी एवं इतरत्र भारतीय भाषाओं की बारीकियों और मुहावरों को सही ढंग से नहीं समझ पाते। नतीजतन भाषा में बिगाड़ और ग़लत इस्तेमाल आम हो गया है। ग़लत और घटिया अनुवादों की बाढ़ आ गई है। इन मशीनी टूल्स के सहारे बहुत से कम-पढ़े-लिखे लोग भी अनुवादक बने बैठे हैं। चूँकि हर कोई एटीएम मशीन की तरह एआई टूल्स में अपनी ज़रूरत का कार्ड डालकर मनचाही सामग्री हासिल करने की होड़ में लगा हुआ है, इसलिए भारतीय भाषाओं और साहित्य के विशेषज्ञों की ज़रूरत ही ख़त्म होती जा रही है।
बचपन में एक मज़ाहिया शेर पढ़ा था:
दिल हो क़ाबू में तो दिलदार की ऐसी-तैसी
कौन झंझट में पड़े, प्यार की ऐसी-तैसी
बस दिल की जगह एआई और प्यार की जगह उर्दू, हिन्दी भाषा, शायरी या गद्य, कोई भी शब्द रख दीजिए, बात पूरी हो जाएगी। मशीनी अनुवाद और स्वचालित लेखन के कारण पेशेवर अनुवादकों, लेखकों और शिक्षकों की अहमियत भी कम होती जा रही है। अगर हम मौजूदा मशीनी व्यवस्था की बात करें तो चैट जीपीटी जैसे टूल्स ने उर्दू, हिन्दी इत्यादि भाषाओं में लिखना, सीखना और पढ़ना पहले से कहीं ज़्यादा आसान बना दिया है। जो लोग इन भाषाओं से दूर थे, वे अब इन के क़रीब आ रहे हैं। शब्दकोशों और शब्द-भंडार में भी इज़ाफ़ा हो रहा है। एआई मॉडल इन भाषाओं की सामग्री को डिजिटल रूप में सुरक्षित करने में मदद करते हैं, जो भाषा के अस्तित्व के लिए फ़ायदेमंद है।
छात्रों और शिक्षकों, दोनों के लिए ये टूल्स सहायक साधन बन सकते हैं, ख़ासकर व्याकरण, सार-लेखन और रचनात्मक लेखन के अभ्यास के लिए। मशीनी अनुवाद के ज़रिये दुनिया भर के लोग उर्दू, हिन्दी इत्यादि भाषाओं की सामग्री तक पहुँच हासिल कर सकते हैं। यह भाषा के प्रसार का एक प्रभावी माध्यम है। लेकिन सबसे बड़ा नुक़सान वही है जिसका ज़िक्र हम पहले कर चुके हैं, कि मानवीय लेखन और मशीनी लेखन के बीच का फ़र्क़ मिटता जा रहा है और रचनात्मक लेखन भी मशीनी प्रक्रिया से गुज़रकर पाठकों तक पहुँच रहा है। इसकी वजह से हमारी भाषाओं की शिक्षण और शोध की बुनियादें कमज़ोर होती जा रही हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं कि एआई टूल्स को सहायक के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए, विकल्प के रूप में नहीं। ये टूल्स स्थानीय मुहावरों, लहजों और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को सुरक्षित रखने में नाकाम हैं जो हमारे साहित्य का मूल तत्व और सार हैं। अपनी भारतीय भाषाओं को चैट जीपीटी और अन्य एआई टूल्स से गंभीर ख़तरा तब पैदा होता है जब हम अपनी रचनात्मक क्षमता पर भरोसा करने के बजाय हर काम मशीनों के हवाले कर देते हैं।
लेकिन सृजन के मामले में एआई को बिल्कुल भी ज़िम्मेदारी न सौंपी जाए। एआई को मशीन ही रहने दिया जाए, उसे शायर या लेखक न बनाया जाए। वरना समझ लीजिए कि रचनात्मक अव्यवस्था और उच्छृंखलता हमारा रास्ता रोके खड़ी है। फिर हमारे पास यह कहने का भी मौक़ा नहीं बचेगा कि
‘लम्हों ने ख़ता की थी, सदियों ने सज़ा पाई।’







