भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनकी आभा समय की कसौटी पर खरी उतरती है और उनकी उपस्थिति मात्र से ही एक पूरा युग परिभाषित हो जाता है। धरम सिंह देओल, जिन्हें दुनिया धर्मेंद्र या प्रेम से ‘धर्मेंद्र पा जी’ के नाम से जानती है, उन्हीं अद्वितीय सितारों में से एक थे। अपने छह दशक से अधिक लंबे करियर में, उन्होंने 300 से अधिक फिल्मों में काम किया और पर्दे पर प्रेम, एक्शन, कॉमेडी और संजीदगी का ऐसा अद्भुत मिश्रण प्रस्तुत किया कि उन्हें ‘ही-मैन’ (He-Man) और ‘गर्म-धरम’ जैसे उपनामों से नवाजा गया। उनका जीवन, संघर्ष, सफलता और अंतिम विदाई, भारतीय सिनेमा के एक गौरवशाली युग के अवसान का प्रतीक है।
प्रारंभिक जीवन और संघर्ष (1935-1959): मायानगरी का आकर्षण
धर्म सिंह देओल का जन्म 8 दिसंबर 1935 को पंजाब के लुधियाना जिले के सानेहवाल गाँव में एक जाट परिवार में हुआ। उनके पिता, किशन सिंह देओल, गाँव के स्कूल के हेडमास्टर थे और माँ, सतवंत कौर, एक गृहिणी थीं। उनका बचपन देहाती पृष्ठभूमि और अनुशासन के बीच बीता।
किशोरावस्था से ही धर्मेंद्र का मन पढ़ाई से ज़्यादा फिल्मों और फिल्मी सितारों में रमता था। उस दौर के सुपरस्टार सुरैया और दिलीप कुमार उन्हें इतने पसंद थे कि उन्होंने खुद को बड़े पर्दे पर देखने का सपना संजो लिया। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि सिनेमा हॉल की चारदीवारी से बाहर की दुनिया उन्हें कम रास आती थी।
सिनेमा के प्रति इस अथाह प्रेम ने उन्हें मुंबई की मायानगरी की ओर खींच लिया। पंजाब में 19 वर्ष की आयु में प्रकाश कौर से उनका विवाह हो चुका था, लेकिन सपनों की उड़ान के आगे घरेलू जिम्मेदारियाँ गौण हो गईं। 1950 के दशक के उत्तरार्ध में, वह फिल्मफेयर पत्रिका द्वारा आयोजित ‘न्यू टैलेंट’ प्रतियोगिता में विजेता बने, जो मुंबई आने और फिल्म उद्योग में कदम रखने का उनका पहला आधिकारिक टिकट था।
फिल्मी सफ़र की शुरुआत और पहचान का दौर (1960-1965):
‘फूल और पत्थर’ से पहले धर्मेंद्र ने 1960 में अर्जुन हिंगोरानी की फिल्म ‘दिल भी तेरा हम भी तेरे’ से अपने अभिनय करियर की शुरुआत की। शुरुआती दौर कठिन संघर्ष का था। उन्हें अधिकांशतः ‘रोमांटिक लीड’ या सहायक भूमिकाएँ मिलती थीं। उनकी पहली सफल फिल्मों में ‘सूरत और सीरत’ (1962), बिमल रॉय की क्लासिक ‘बंदिनी’ (1963) और ‘हकीकत’ (1964) शामिल हैं।
‘बंदिनी’ (1963): इस फिल्म में नूतन के साथ उनका सीधा-सादा, आदर्शवादी डॉक्टर का किरदार काफी सराहा गया। यह वह दौर था जब उनकी सादगी और आकर्षक व्यक्तित्व ने उन्हें दर्शकों के बीच एक भरोसेमंद चेहरा बना दिया था।
‘हकीकत’ (1964): चेतन आनंद द्वारा निर्देशित भारत-चीन युद्ध पर आधारित इस युद्ध फिल्म में उन्होंने फौजी की भूमिका निभाई। फिल्म की संजीदगी और धर्मेंद्र की गंभीर उपस्थिति ने उनकी बहुमुखी प्रतिभा को प्रदर्शित किया। इन फिल्मों से उन्हें सम्मान मिला, लेकिन सुपरस्टारडम की वह ऊँचाई अभी दूर थी।
‘ही-मैन’ का उदय: करियर का निर्णायक मोड़ (1966-1970)
धर्मेंद्र के करियर का निर्णायक मोड़ 1966 में आया, जब ओ.पी. रल्हन की फिल्म ‘फूल और पत्थर’ रिलीज़ हुई। इस फिल्म में उन्होंने एक क्रूर, बागी, लेकिन दिल से नरम ‘ही-मैन’ की भूमिका निभाई। ‘फूल और पत्थर’ (1966): इस फिल्म में मीना कुमारी के साथ उनका अभिनय और उनके नए, एक्शन-ओरिएंटेड लुक को दर्शकों ने हाथों-हाथ लिया। यह वह फिल्म थी जिसने उन्हें ‘एक्शन हीरो’ के रूप में स्थापित किया और उन्हें पहली बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया। यह हिंदी सिनेमा में उनकी ‘चर्चित अभिनेता’ के रूप में स्थापना थी।
इसके बाद, धर्मेंद्र ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने अपनी रोमांटिक छवि को एक्शन और कॉमेडी के साथ सफलतापूर्वक जोड़ा।’अनुपमा’ (1966) और ‘मझली दीदी’ (1967): हृषिकेश मुखर्जी की इन फिल्मों में उन्होंने अपनी संजीदा अभिनय क्षमता का प्रदर्शन किया, जहाँ उन्होंने एक संवेदनशील कवि और एक आदर्शवादी डॉक्टर की भूमिका निभाई।
‘सत्यकाम’ (1969): यह फिल्म उनके करियर के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शनों में से एक मानी जाती है। हृषिकेश मुखर्जी निर्देशित इस फिल्म में उन्होंने एक ऐसे ईमानदार और नैतिक व्यक्ति ‘सत्यप्रिय’ का किरदार निभाया, जो जीवन भर अपने आदर्शों पर अडिग रहता है। इस फिल्म को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया, जो उनकी कलात्मक श्रेष्ठता का प्रमाण है।
सुपरस्टारडम और गोल्डन एरा (1970-1980): वीरू की अमरता
1970 का दशक धर्मेंद्र के सुपरस्टारडम का ‘स्वर्ण युग’ था। एक्शन, रोमांस और कॉमेडी के ‘त्रिवेणी संगम’ ने उन्हें उस दौर के सबसे अधिक मांग वाले अभिनेताओं में से एक बना दिया। ‘मेरा गाँव मेरा देश’ (1971): इस फिल्म में उन्होंने ‘डकैत’ की भूमिका निभाई, जिसे दर्शकों ने खूब पसंद किया। ‘सीता और गीता’ (1972): हेमा मालिनी के साथ उनकी जोड़ी ने इस फिल्म को सुपरहिट बनाया, और उनकी ‘रोमांटिक-कॉमिक’ टाइमिंग को सराहा गया। ‘यादों की बारात’ (1973): एक मल्टी-स्टारर हिट, जिसने उन्हें ‘युवाओं के दिलों की धड़कन’ बनाए रखा।
‘शोले’ (1975): रमेश सिप्पी की यह क्लासिक फिल्म भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक मील का पत्थर है। ‘वीरू’ के रूप में उनका किरदार अमर हो गया। जय (अमिताभ बच्चन) के साथ उनकी दोस्ती, बसंती (हेमा मालिनी) के साथ उनका रोमांस, और गब्बर सिंह से उनका मुकाबला… ‘शोले’ ने धर्मेंद्र को न केवल एक अभिनेता, बल्कि एक सांस्कृतिक प्रतीक बना दिया। यह फिल्म आज भी भारतीय सिनेमा के मानक के रूप में देखी जाती है।
‘चुपके-चुपके’ (1975): हृषिकेश मुखर्जी की इस कॉमेडी फिल्म में उनका ‘प्रोफेसर परिमल’ का किरदार उनकी बहुमुखी प्रतिभा का एक और उदाहरण है, जिसमें उनकी कॉमेडी टाइमिंग बेजोड़ थी। ‘धरम- वीर’ (1977): इस फंतासी एक्शन फिल्म ने उन्हें ‘ही-मैन’ की छवि में और मजबूत किया। यह वह दौर था जब उनकी पेशेवर जोड़ी हेमा मालिनी के साथ बनी, जो बाद में निजी जीवन में भी परिणित हुई।
एक्शन और मसाला फिल्में (1980-1990): ‘गर्म-धरम’
1980 के दशक में, धर्मेंद्र ने अपनी ‘एक्शन हीरो’ की छवि को और सशक्त किया। यह वह दौर था जब उन्होंने कई ‘बी-ग्रेड’ या ‘मसाला’ एक्शन फिल्मों में भी काम किया। ‘लोहा’ (1987), ‘हुकूमत’ (1987), ‘आग ही आग’ (1987) आदि: इन फिल्मों को भले ही समीक्षकों से बहुत प्रशंसा न मिली हो, लेकिन जनता के बीच ये अत्यधिक लोकप्रिय थीं, खासकर छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में।
इन फिल्मों में उनकी दमदार डायलॉग डिलीवरी, एक्शन और बेबाकी ने उन्हें ‘गर्म-धरम’ का खिताब दिलाया। उनकी यह व्यावसायिक सफलता एक रिकॉर्ड थी; 1987 में उन्होंने एक साल में 9 हिट फिल्में दीं, जो आज भी बॉलीवुड का एक अनूठा रिकॉर्ड है।
कला बनाम व्यवसाय: यह चरण दर्शाता है कि धर्मेंद्र ने कलात्मक संजीदगी (जैसे ‘सत्यकाम’) और शुद्ध व्यावसायिक मनोरंजन (जैसे ‘लोहा’) के बीच एक संतुलन स्थापित किया। उन्होंने दर्शकों की नब्ज को पहचाना और उनकी मांग को पूरा किया, भले ही कुछ आलोचकों ने उनके फिल्मों के चयन पर सवाल उठाए हों।
निर्माता, राजनीतिक जीवन और दूसरी पारी (1990-2025)
1990 के दशक में धर्मेंद्र ने अभिनय के साथ-साथ निर्माण में भी कदम रखा। ‘घायल’ (1990): अपने बेटे सनी देओल को लेकर उन्होंने यह फिल्म प्रोड्यूस की, जिसे अपार सफलता मिली। इस फिल्म को सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय फिल्म के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार सहित कई पुरस्कार मिले।
राजनीतिक पारी- (2004-2009): 2004 में, उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के टिकट पर राजस्थान की बीकानेर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और भारी बहुमत से जीतकर संसद पहुँचे। हालांकि, उन्होंने बाद में स्वीकार किया कि राजनीति उनके स्वभाव के अनुकूल नहीं थी और 2009 के बाद उन्होंने इससे दूरी बना ली।
2007 में आई फिल्म ‘अपने’ में उन्होंने अपने दोनों बेटों सनी और बॉबी देओल के साथ काम किया। इसके बाद ‘यमला पगला दीवाना’ (YPD) सीरीज (2011, 2013) ने उन्हें एक बार फिर कॉमेडी और फैमिली ड्रामा के माध्यम से दर्शकों के सामने एक नए अवतार में पेश किया।
हाल के वर्षों में, उन्होंने ‘रॉकी और रानी की प्रेम कहानी’ (2023) और ‘तेरी बातों में ऐसा उलझा जिया’ (2024) जैसी फिल्मों में काम किया, जहाँ उन्होंने साबित किया कि उम्र सिर्फ एक संख्या है और उनका आकर्षण आज भी बरकरार है।
पद्म भूषण (2012): भारत सरकार द्वारा दिया जाने वाला तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पाने के अलावा उन्हें फिल्म फेयर लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार (1997) भारतीय सिनेमा में उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए दिया गया। उनकी फिल्मों ‘सत्यकाम’ (1969) और ‘घायल’ (1990) को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों से सम्मानित किया गया, जो उनकी कला और निर्माण की गुणवत्ता का प्रमाण है।
धर्मेंद्र की अभिनय कला की सबसे बड़ी विशेषता उनकी सहजता और सादगी थी। वह कभी भी अपने किरदारों में ‘ओवर-एक्टिंग’ नहीं करते थे। चाहे वह ‘सत्यकाम’ का आदर्शवादी सत्यप्रिय हो, ‘शोले’ का आवारा वीरू, या ‘चुपके-चुपके’ का हास्य-विनोदी परिमल, उन्होंने हर किरदार को अपनी सहज मुस्कान और आँखों की गहराई से जीवंत कर दिया।
धर्मेन्द्र का निधन 24 नवंबर 2025 को 89 वर्ष की आयु में हुआ। पिछले कुछ समय से वह बढ़ती उम्र से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे थे। उनके निधन की खबर से पूरा देश शोक में डूब गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके निधन को भारतीय सिनेमा के “एक युग का समापन” बताया।
उनकी मृत्यु एक अभिनेता, एक निर्माता और एक सांसद के रूप में उनकी उपलब्धियों से कहीं अधिक है। यह एक ऐसे व्यक्ति की विदाई है जिसने भारतीय सिनेमा को ‘ही-मैन’ का एक ऐसा रूप दिया, जो एक्शन के साथ-साथ दिल को छूने वाला रोमांस भी जानता था। धर्मेंद्र ‘पा जी’ चले गए, लेकिन ‘वीरू’ की दोस्ती, ‘सत्यकाम’ की ईमानदारी और उनकी सहज मुस्कान हिंदी सिनेमा के सुनहरे पर्दे पर हमेशा चमकती रहेगी। उनकी विरासत उनके बेटों सनी और बॉबी देओल, भतीजे अभय देओल और उनकी फिल्मों के हर फ्रेम में जीवित रहेगी। वह सिर्फ एक अभिनेता नहीं थे, वह भारतीयता के एक सहज और दिलकश प्रतीक थे।







