"बेताबियाँ समेट के सारे जहान की
जब कुछ न बन सका तो मेरा दिल बना दिया"
- जिगर मुरादाबादी
अहा, प्रेम! आह, प्रेम! काश, प्रेम! उफ्फ, ये प्रेम!
प्रेम की कोई स्थायी परिभाषा है ही नहीं, ये तो प्रेम के बदलते रूपों के साथ-साथ परिवर्तित होती जाती है! जिसने जैसा जिया, वैसा लिखता गया।
जरा सोचिये, गर 'प्रेम' न होता तो कविता होती? क्या तब भी लिखे जाते ग्रंथ? क्या इतने ही बिकते किस्से-कहानियाँ? यादों की इस दुनिया में भला किसकी तस्करी होती?
आख़िर कौन है ये? क्या है ये? क्यूँ है ये? जो असमय, अनामंत्रित दबे पाँव चला आता है। कभी चुपचाप साँसों को छूकर, हवा के झोंके-सा गुज़रता है और कभी संघनित मेघों-सा बरस, ह्रदय के कोमल अहसासों को हौले से भिगो जाता है। तो कहीं अचानक ही एक कोरी मायूसी थमाकर, धुन्ध बन ...
प्रीति अज्ञात










