ग़ज़ल
ग़ज़ल-
दर्द थोड़ा, थोड़े आँसू, कुछ गिले हैं और भी
बाद तेरे ज़िन्दगी ने ग़म दिए हैं और भी
तू गया तो यूँ लगा की ज़िन्दगी ही रुक गई
पर हकीकत है यही की हम चले हैं और भी
जब मुझे दिखला न पाया अक्स मेरा साफ तू
क्यूँ जहन में ये न आया आइने हैं और भी?
इक तरफ तो तू जुदा हैं इक तरफ खुद से ही मैं
मुझसे मेरी ज़िन्दगी के फासले हैं और भी
मैं पतंगा, तू शमा थी और मिलन भी ना हुआ
फिर बिछड़ के क्यूँ मेरे ये पर जले हैं और भी
दिल में जिसने भी बसाया पा गया तुझको खुदा
वरना तेरी ओर बढ़ते काफिले हैं और भी
मर गया वो गर्व लेकिन लौट कर फिर आएगा
इश्क़ बाक़ी है जहाँ में, दिलजले हैं और भी
***********************************
ग़ज़ल-
फिर तुम्हारे और हमारे राब्ते गर हो सके
क्या मिटाओगी ये सारे फ़ासले गर हो सके
इक शमा ने दोस्त जुगनू को बनाकर ये कहा
तुम भी जलना साथ मेरे आज से गर हो सके
बाद मरने के मेरे गर तुम मुझे आवाज दो
लौट आऊंगा वहाँ से रास्ते गर हो सके
ख़त जलाए तुमने पर, एहसास ज़िंदा हैं सभी
अब इन्हें भी तुम जला दो आग से गर हो सके
जो नहीं उम्मीद कोई अब हमारे मिलने की
कोशिशे करना भुलाने की मुझे गर हो सके
प्यार मुझसे था जिसे वो अब भी तुझमें हैं कही
ये ग़ज़ल मेरी पढ़ाना तुम उसे गर हो सके
गर्व की ग़ज़लें रुलाती हैं तुम्हें गर आज भी
तो बचा लो उसको तन्हा रात से गर हो सके
***********************************
ग़ज़ल-
मुद्दतों के बाद तुमको अब सदा भी दूँ तो क्या
दरमियां जो कुछ नहीं अब वास्ता भी दूँ तो क्या
बाद जाने के तुम्हारे ज़िन्दगी भी रुक गई
अब बताओ तुम इसे मैं रास्ता भी दूँ तो क्या
ज़िन्दगी की छत खुली है ढँक न पाया कोई भी
खुद को ग़म की बारिशों में आसरा भी दूँ तो क्या
ज़िन्दगी की कश्तियों को डूबने का शौक है
बारहा इनको नये मैं नाखुदा भी दूँ तो क्या
मैं रुका था उम्र भर बस ज़िन्दगी ठहरी नहीं
पर न आया लौटकर वो अब सदा भी दूँ तो क्या
उम्र भर का दर्द दे के बेरुखी कहने लगी
क्या सताऊ मैं तुम्हें अब फासला भी दूँ तो क्या
दास्ताँ-ए-बेवफाई लिख के पूछे गर्व अब
बेवफा को इससे अच्छा आईना भी दूँ तो क्या
– भरत गर्वा गर्व




