कविता-कानन
सफ़र
चल पड़ता है
एक सुहाने सफ़र पर
मेरा मन
जब एकांत में पाता है ख़ुद को
यादों का सामान लिए
जिनमें होती हैं
कुछ मुस्कुराहटें,
कुछ अधूरे सपने,
कुछ एहसास खट्टे-मीठे,
कुछ अनुभव भी तीखे-तीखे,
कुछ दर्द, कुछ खुशियाँ,
कुछ अपनापन, कुछ दूरियाँ
पड़ाव आते हैं कई उसमें
ठहरती हूँ कुछ पल के लिए
आँकती हूँ ख़ुद को
उन सामानों के साथ
विस्मित होती
कभी रोती,
कभी मुस्कुराती
लौट आती हूँ वापस
अपने सामान के साथ
सुरक्षित
यथार्थ में जीने के लिए
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बेवजह
बेवजह ही तो था
तुम्हारा मेरी ज़िन्दगी में
चले आना
और बेवजह
चले जाना
लेकिन
ये तुम्हारे लिए था
मेरे लिए तो
ये बेवजह
कई वजहें दे गया मुझमें
कई तब्दीलियाँ दे गया
अब मैं बेवजह
ख़ुद से बातें करती हूँ
बेवजह ही तो हँस पड़ती हूँ
कभी रो भी देती हूँ
और ख़ुद से नाराज़ हो
वजह ढूँढती रहती हूँ
तुम्हारे मेरी ज़िन्दगी में
बेवजह आने
और चले जाने की
– कुमुद साहा




