ग़ज़ल-गाँव
ग़ज़ल-
नज़दीकियाँ ये कैसी, कैसी ये दूरियाँ हैं
अब तो नसीब में बस, ग़म और सिसकियाँ हैं
जो साथ तू नहीं तो, मंज़र उदास हैं सब
अश्कों की बारिशें हैं, यादों की बदलियाँ हैं
बेटी हुई विदाई, सूना है घर का आँगन
रोता है कोना-कोना, फैली विरानियाँ हैं
कैसी मची तबाही, देखो नजर घुमाकर
आतंक का है साया, वीरान बस्तियाँ हैं
तेजाब ने जलाया,जबसे वजूद उसका
ख़ुद से डरी हुई है, ख़्वाबों से दूरियाँ हैं
आवाज़ क्या उठाई, दुश्मन बना ज़माना
लो ढूँढते ‘कुमुद’ में, सब आज गलतियाँ हैं
********************************
ग़ज़ल-
झूठ कहते हैं सभी कि इश्क़ से नाता नहीं
कौन ऐसा है यहाँ जो इश्क़ का मारा नहीं
हिज्र के सैलाब ने बरबाद सब कुछ कर दिया
इश्क़ में ऐसा भी होगा ये कभी सोचा नहीं
राह तकते रह गए माँ-बाप बेटे की मगर
साथ सपने ले गया वो फिर कभी लौटा नहीं
गुल्सितां में सब के सब माली से हैं सहमे हुए
दिल में है दहशत गुलों के क्यों, समझ आता नहीं
ज़िन्दगी की दौड़ में तुम भाग लो जितना मगर
चाह कर भी मौत से भागा तो जा सकता नहीं
गुनगुनाने की वजह अब तो ‘कुमुद’ तुम बोल दो
बेसबब तो प्यार की कोई ग़ज़ल गाता नहीं
– कुमुद साहा




