पिता
पिता
नहीं उतरते दिल में
लयबद्ध हो
कविता, गीत की तरह
ना ही लोरी बन
लुभाते हैं रातों को
ठंडी ठंडी हवा में
वो बोध कथा की तरह आते हैं
बुरी संगत से बचाने के यत्न करते
सेब का टोकरा रखते
मेहनत की कुंजी से सफलता का
राह दिखाने वाले बनते
भाइयों को दिखाते एकता का बल
आखिरी सांस लेते हुए भी, कुछ बताते
उज्ज्वल भविष्य की आस करते
पिता मां की तरह ठंडी छाया नहीं बनते
वो बने रहते धूप, कड़वी हकीकत बताते
वो मनभावन रिमझिम से नहीं बरसते
वो आकाशीय बिजली से गरजते
कभी तूफान बन पटकते सीधा
स्वप्न से धरातल पर
पिता कभी
रंगमंच के कलाकार बन
सामने आ, तालियां नहीं बटोरते
वो पीछे रह निर्देशक बनते
पृष्ठभूमि में खड़े
मजबूत स्तंभ से
पिता गीत नहीं, लय नहीं, सुर नहीं होते
पिता होते हैं अलिखित गाथाएं
पिता को जानने को
पहाड़ होना होता है
धूप, मिट्टी, हवा और अनगिनत पदचिन्हों को
अपने
ऊपर छपने देने का
धैर्य होना होता है…
************
नायक
सोनम वांगचुक हमारा नायक नहीं था
हमारा नायक था रणछोड़ दास चांचड़
कि हमारे नायक जमीन पर काम नहीं करते
वो सिल्वर स्क्रीन पर चमक बिखेरने आते हैं
बेटी के पास बहुत सारे रोलर्स है
जिसे वो बालों में लगा कर इंतजार करती है
सीधे बालों को घुंघराले हो जाने का
करते तो हम सब भी यहीं है…
हमारे रोलर्स दिन भर घुमाते रहते हैं
सीधे सरल तथ्यों, बातों को
घुमावदार बनाते हुए ,
एक रोलर देशभक्ति घुमाता है
एक रोलर विदेशी संबध
एक और फंडिंग को घुमाता है
एक और फिर एक और
एक और भी …
कवि ने बहुत पहले बताया था
देश कोई कागज पर बना नक्शा नहीं
देश सच में कागज पर बना नक्शा नहीं है
फिर भी हमने जेबों में भर दिया इसे
चंद कमीजों की
इन दिनों के फैशन में
जब सब के हाथ मगन है
रील्स स्क्रॉल करने में
हर कोई होड़ में नायक बनने की
अब जब नायक, नायक नहीं रहे
ना रही प्रजा , भी प्रजा
अपनी जेब पर हाथ रख मुस्कुराता
हर तरफ छा गया है राजा….






