जीवन क्या है जीवन क्यूँ है
ये प्रश्न निरंतर चलते हैं
इन प्रश्नों में उलझे जाने
कितने यौवन नित ढलते हैं
जीना है जीवन को कैसे
ये ही तो एक पहेली है
इन प्रश्नों के हल पाने को
कितने दीपक नित जलते हैं
जीवन क्या है मत रुको यहाँ
ये तो बस चलने वाला है
गर रूकते हो तो तुम्हीं रूके
ये आगे बढ़ने वाला है
इसको रोकें इसको समझें
इतनी किसकी औक़ात यहाँ
ये रचना है उस मालिक की
वो ही ये गढ़ने वाला है
जीवन नदिया के जैसा है
इनकी एक जैसी कहानी है
चढता जीवन उठती लहरें
इनकी अपनी ही रवानी है
सबको लगता है जीवन को
समझें तब ही कुछ बात बने
इन बातों से नहीं कुछ हासिल
अन्दर की जोत जगानी है
जीवन नदिया की भाँति बहे
तो फिर हलचल और शोर नहीं
चलता जीवन बहती नदिया
इससे सुंदर कुछ और नहीं
गर दोनों बहे चलती लय में
और इक पल भी प्रतिकूल ना हो
दोनों को मिलता है अनंत
उससे आगे कोई छोर नहीं
धारा जो उलटी बहती है
दो कदम नहीं चल पाती है
उल्टा बहना मुमकिन ही नहीं
अपना अस्तित्व गँवाती है
गर धारा खुद अनुकूल रहे
मैं ही नदियाँ हूँ ऐसे बहे
तो फिर नदिया के साथ साथ
धारा भी मंज़िल पाती है
बहती धारा को तुम देखो
नदिया से संगत करती है
जिस ओर चले नदिया जब तक
वो भी उसके संग चलती है
धारा अब धारा नहीं रही
अब तो वो भी नदिया ही है
खुद को खोकर खुद को पाकर
नदिया नदिया संग मिलती है
जीवन जन्मों का साक्षी है
सुंदर अनमोल ख़ज़ाना है
इसको जी लो तुम सहज सरल
फिर क्या है जिसको पाना है
जीवन के प्रश्नों में उलझे
तो तुम खुद को भी खो दोगे
मत भागो कस्तूरी मृग से
बस खुद के भीतर जाना है
जीवन क्या है जीवन क्यूँ है
बस चुप साधो कुछ भी ना कहो
जीवन दाता है साथ सदा
अब बस तुम उसके साथ रहो
जीवन से जीवन का संगम
फिर पल भर में हो जाएगा
खुद से ही तुम खुद बोलोगे
कितना सुंदर है भाग्य अहो
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