कविता-कानन
कोरस की लिपि
मैं कोरस में सबसे अंतिम पंक्ति में खड़ी थी
जो चीज़ें आपस में रगड़ खाई थीं
वो और कुछ नहीं
हमारे कंठ-तंतुओं से विसर्जित
विलाप की श्रुतियाँ थीं
जो शब्दों के मध्य की रिक्तता को पाटने
थाट से घनीभूत थीं
बा-मुश्किल ठहर पायीं
सच! मैं भाषायी छंदों में उलझ कर रह गई
षडज (सा) से गंधार (ग) तक कदमताल रही
फिर पंचम (प) स्वर में तुमने
आरोह के पंख फड़फड़ाकर
दूर तक उड़ान भर ली
एक मूकभाषा जो राग मालकौंस
और उसकी छः रागीनियों में गूँथी हुई थी
अदृश्य थी हमारे लिए
कदम चुपचाप थे
पर अवरोही स्वर लहरियाँ,
जो हमारे फेफड़ों से विसर्जित हो रही थीं
स्वतः ही टकराकर नाद उत्पन्न कर रही थीं
यही मधुर नाद शायद खोई हुई भाषा है
जिसकी लिपि अपठित नहीं रही
किसी शोकगीत की लिपि से
हूबहू मिलान थी
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बरगद की उम्र (दो कविताएँ)
(1)
तुम प्रेम
कितनी सहजता से लिख रहे हो
और मैं अप्रेम में असहज हूँ
पहाड़, नदी, झील और झरने
श्रृंगार कर लेते हैं
मेरे मन को भीतर तक भरने
मैं भर जाती हूँ
जब पहाड़ अट्टहास करता है,
नदी लहरों में खिलखिलाती है,
झील जलतरंगों से हँसी पसारती है
पेड़ मुझे हजार बरस जीने की दुआ देता है
सबसे ऊपरी शाख पर सात पत्ते
मेरी आत्मकथा को सहेजे
इंतजार करते हैं एक सदी तक
बरगद का पेड़ है यह
कभी बुड्ढा न होगा
शाखाएँ झुर्रियों का श्रृंगार कर लेंगी
पर नवपल्लव
जिनमें सुरक्षित सहेजी हुई है उम्र
उग ही आयेंगे
हरित पत्रदल से झूम उठेगा यह पेड़
हजारों साल जीने की दुआएं
नहीं जातीं निरर्थक
हर साल
मन्नत के घेरों में लिपटा हुआ
सुरक्षित है मेरा दस्तावेज
लाल सूती वसन में लिपटा
लौट आना है मुझे
तुझसे मिलने।
(2)
लौट आना ही है मुझे
नदी नालों की पारदर्शी सतह देखने
क्या पानी रंग धारण कर लेगा!
रूहें गंध धारण कर लेंगी!
क्या अचाही कम उम्रों को
बरगदों की उम्र लग जाएगी!
कच्ची उम्रों के
झुंड के झुंड पड़े हैं
क्षितिज की बिन अन्वेषित परतों में
सब के सब
लौट आना चाहते हैं
तृषित हैं सब
डुबकियाँ लगाकर
तर हो जाना चाहते हैं
उमियम झील के स्वच्छ जल में
झील का बदन
आर-पार ज्यों का त्यों
विरल-सघन सब रले मिले
तले में
सब कुछ साफ चमकीले
सत्य झलके मुझे
शैवालों की प्रजनित तमाम पीढियाँ
हाथ हिला रही थीं
बयां कर रही थीं
अप्रेम का जीवन।
– प्रतिभा शर्मा




