सूरज की किरणों ने धरती के आँचल में अपनी शैशवास्था पूरी कर बाल क्रीड़ाएं करना प्रारंभ कर दिया था, खाली बंजर खेतों पर उगी घास की छोटी- छोटी असंख्य तलवारों की नोक पर रात की नमी का खून मात्र बूंद की शक्ल में बचा था। मार्च का यह शुरुआती समय फाल्गुन के आगमन की आरंभिक सूचना देते जगह-जगह से झांक रहा था। धरती की हरी साड़ी पर जगह-जगह प्रकृति बासंती रंग के तरह-तरह के फूल काढ़ने लगी थी। कुछ नया होने वाला था, कुछ नया हो रहा था। लेकिन, क्या उन दोनों के जीवन में भी कुछ नया हो रहा था? कीं दोनों के? अरे, वही दोनों जो अपने आसपास से बिलकुल बेखबर, प्रकृति की रंग बिरंगी कारीगरी से मुंह फेर कर सफेद और काले रंगों में ही अपनी दुनिया ढूंढ रहे हैं। इस सुरम्य और धन-धान्य से संपन्न घाटी की छोटी सी पहाड़ी पर स्थित सरकारी इंटर कॉलेज के वे दो नवकिशोर जो, मार्च के पहले सप्ताह में अपने अमूल्य जीवन के कुछ आठ-दस महीनों का लेखा-जोखा देने की कवायद में मशरूफ़ थे। वही कवायद जिसे हम सब परीक्षा के नाम से जानते हैं।
वैसे तो हर व्यक्ति हर पल ही एक परीक्षा से गुजरता रहता है, एक मूल्यांकन सतत चलता रहता है, जीवन की प्रथम सांस से अंतिम सांस तक, कुछ को तो जीवन जीने के लिए नहीं परीक्षा देने के लिए ही मिला होता है। जैसे ही गर्भ से बाहर आए नहीं कि कई तरह से मूल्यांकन शुरू हो जाते हैं- प्रथम मूल्यांकन लिंग निर्धारण पर, यह मूल्यांकन तो कभी-कभी गर्भ में भी हो जाता है, फिर रंग का मूल्यांकन, फिर नाक-कान-आंख जितने कोणों से संभव हो सकता है देखने वाले उतने कोणों से मूल्यांकन करते हैं। मूल्यांकन का सिलसिला अनवरत चलता ही रहता है। मूल्यांकन व्यक्ति का, व्यक्ति के द्वारा ही, और वह करता है ठीक वैसे ही जैसे कि परीक्षा व्यक्ति देता भी है और लेता भी है। यानि दोनों प्रक्रियाएं दोतरफी ही होती हैं पर न जाने क्यों मूल्यांकन शब्द अपने रूपाकार में भारी भरकम होते हुए भी उतना नहीं डराता जितना कि परीक्षा।
इसी शब्द से आक्रांत छोटी सी पहाड़ी की ढाल में स्थित सरकारी इंटर कॉलेज के दोनों युवा कॉलेज के बाहर स्थित छोटे से लाल मंदिर के बड़े से गेट की चारों ओर बनी दीवार पर बैठे थे कॉपियों में खोए हुए। नही! नहीं! चारदीवारी, मंदिर के चारों ओर ही बनी है किंतु, मंदिर इतना छोटा है और गेट इतना बड़ा कि दूर से देखने वाले को गेट की ही चारदिवारी लगती है। पहाड़ी के इस ढाल पर कई छोटे-छोटे मंदिर हैं। इस पहाड़ी की तलहटी पर जहां से चढ़ाई शुरू होती है, वहीं पर खेत के पुश्ते की दीवार पर एक बड़ा सा आला है, जिसमें एक छोटा, तेल से सना काला चीकट सा त्रिशूल बड़ी शान से खड़ा अपने होने के एहसास से हर आने जाने वाले को शीश नवाने, हाथ जोड़ने या चिहुँक कर ठहरने को विवश कर देता है। उस काले चीकट त्रिशूल के बगल में रखे काले चीकट और आले के अनुपात में काफी बड़े से दीये की जगमगाती लौ में हर गुजरने वाले को, शीश नवाने के लिए बाध्य करने की क्षमता त्रिशूल से कुछ अधिक थी। वैसे भी आग और अस्त्र-शस्त्र ने मानव सभ्यता के विकास और विनाश में कितनी बड़ी भूमिका निभाई है यह किसी से छिपा थोड़े ही है।
बमुश्किल बीस कदम चलने पर एक स्थानीय देवता के मंदिर के दर्शन होंगे ठीक गदेरे के ऊपर। फिर दो कादम चले नहीं कि एक और मंदिर जो पहाड़ को, पत्थरों की दीवार से थामने की कोशिश में बनाया गया गया है। उसे समुचित रूप से मंदिर न कहकर मंदिरनुमा ढांचा जरूर कहा जा सकता है। इस मंदिरनुमा ढांचे के अंदर रखी टाइल पर अंकित हैं कई सारे देवी -देवताओं के चित्र और मध्य में कुछ भी नहीं। ना कोई शिवलिंग ना धूप-दीप, न पुष्प-अर्घ्य आदि कुछ भी नहीं। कभी किसी को देखा भी नहीं है वहाँ दिया-बाती करते हुए। क्या मंदिरों का भी अपना-अपना भाग्य होता है?सोचते हुए बल पड़ जाते हैं माथे पर उनके। उसी गदेरे पर बनी पुलिया की दूसरी तरफ है एक बड़ा सा मंदिर जो विशालकाय खड़िक के पेड़ की सघन छाँव में अपनी दिव्यता और भव्यता से ही नहीं ठंडी हवा और गझिन छाया के कारण भी लालायित करता है हर गुजरने वाले को पलभर ठहरने के लिए। यह मंदिर जिस छोटी सी टीलेनुमा पहाड़ी पर बना था, उसी के पूर्वी ढाल पर बसे बीस-बाइस मकानों के छोटे से गाँव का सामूहिक मंदिर है। प्रांगण काफी बड़ा है इसका। शिव मंदिर होने की वजह से हर सोमवार, विशेषकर माघ और सावन के सोमवारों को यहाँ पर छोटा-मोटा मेला सा लग जाता है, नहीं! व्यापारिक मेला नहीं, धार्मिक, आस्था का मेला। आसानी से कुछ व्रतों में ही मान जाने की वजह से ही तो भोले भण्डारी कहलाये शिव।
‘भण्डारी’ शब्द ने चिंतन के घोड़े को किसी दूसरी राह पर दौड़ा दिया सरपट, बेलगाम। इन दो मासूम किशोरों से दूर सामने उपस्थित था कॉलेज का वह ढीठ भण्डारी उपनामधारी छात्रनेता जो सनातनी देवी-देवताओं की जाति निर्धारण कर रहा था सगर्व। मैं हैरान आँखों से ही देख और कानों से ही सुन रहा था, वह बता रहा था कि एक ब्रह्मा को छोड़कर सारे हिन्दू देवी-देवता क्षत्रिय हैं, उसके अपने वर्ण के। इस बात को जब उसके जैसे ही किसी गर्वीले युवा ने चुनौती दी तो उसने प्रमाण के रूप में भोले के साथ भण्डारी, हनुमान के साथ गुसाईं, विष्णु के क्षत्रिय अवतारों और रजोगुण प्रधानता की तथा दुर्गा के क्षत्राणी होने के समस्त प्रमाण सामने रख दिए। मैं और मेरे जैसे कई अन्य प्राध्यापक इस चुनावी सभा में छात्र-छात्राओं के इस शास्त्रार्थ को सुन अवाक थे। इतना गहन चिंतन!!
चिंतन का घोड़ा इतना भार इस चढ़ाई पर और अधिक नहीं झेल पाया और वापस उन्हीं दो किशोरों की तरल आवाज पर ठिठक गया। मैं उन्हें देख रहा हूँ, आँखों से नहीं, कानों से। नजरों में ना जाने ऐसा क्या होता है कि सामने वाला स्वतः ही सजग हो जाता है और वही दिखने या दिखाने लगता है जैसा देखने वाला चाह रहा हो तो इसलिए मैं अकसर कानों से ही देखने की कोशिश करता हूँ। तो, कानों से देखने की इस प्रक्रिया में मैंने पाया कि छोटा युवक जो कद काठी में बड़े वाले युवा से अधिक मजबूत है, के हाथों में एक नोटबुक है। नोटबुक से वह प्रश्न पूछ रहा है, “अच्छा, बता सार .. सारव…. सार्वजानिक उदयोग कौन से होते हैं?”
” ठीक से पढ़, हिंदी पढ़नी भी नहीं आती तुझे? बड़ा वाला युवक चिढ़कर कहता है, “एक ही बार में सारबजनीक क्यों नहीं बोल पा रहा है तू? और उदयोग नहीं, उद्योग होता है।” सुनकर चेहरे पर मुस्कान और बचपन की वह कथा याद हो आई, जो अक्सर हमें पापा तब सुनाया करते थे जब हम भाई-बहन शब्दों को गलत ढंग से पढ़ते-लिखते या बोलते थे। कथा के अनुसार किसी गांव में एक परिवार रहता था, जो पूरी पट्टी में ‘लाटा- काला’ नाम से विख्यात था। एक बार उनके घर में भगवान सत्यनारायण की कथा का आयोजन हुआ। परिवार के तीन बच्चों को गांव वालों को सत्यनारायण की कथा में आमंत्रित करने हेतु भेजा गया। अब जैसे ही बड़ा बेटा किसी से कहे कि ,”चाचा आज घर में सरगनारायण की कथा है आपको आना है,” तो दूसरा टोक दे, “अरे सरगनारायण नहीं, सटकनारायण”, वह बात पूरी कर पाए उससे पूर्व तीसरा बोल पड़े,”छि! कुछ नहीं आता तुम दोनों को, सबतनारायण बोलो।“ गांव वाले हंसे, सुधारें, पर वही ढाक के तीन पात। इस घटना के बाद उनका मूल नाम गांव वालों को कभी याद ही नहीं रहा, वे तीनों भगवान सत्यनारायण की कृपा से जगत में सरगनारायण, सटकनारायण और सबतनारायण के नाम से ख्यात हुए। अस्तु वे तो लाटा- काला के परिवार से थे, पूर्णतया निरक्षर माता-पिता की निरक्षर संतान। किंतु यह दोनों क्रमशः अपने-अपने जीवन के लगभग नौ और ग्यारह साल अक्षरों के बीच गुजार चुके थे।
“ठीक है, ठीक है, प्रश्न का उत्तर आ नहीं रहा है, और मुझे सिखा रहा है?” छोटे वाले ने बड़े के रुआब को दरकिनार करते हुए कहा, “अच्छा चल बता भारतीय अर्थशास्त्र में दुर … दुरभलता का क्या अर्थ है?”
“दुरभलता नहीं, दुर्लभता। दुर्लभता का अर्थ है सुलभ न होना।“
“क्या सुलभ न होना?, पूरा बता, यहां तो तूने बहुत लिखा है। यह तो ‘लॉन्ग-आंसर-टाइप’ प्रश्न है।“
“अरे, पहली लाइन सही होनी चाहिए, नीचे पढ़ता कौन है? लिख दूंगा मैं कुछ भी, तू चिंता मत कर। हेडिंग्स बता दे एक बार,फिर देख पूरे मार्क्स ना आएं तो कहना।“ बड़े ने अपने तजुर्बे को थोड़ा गंभीर और ऊंची आवाज में व्यक्त किया।
“पता है मुझे, ज्यादा ज्ञान मत झाड़, यह तो हमारे गुरु जी ने भी कहा है कि कॉपी खाली नहीं होनी चाहिए, कुछ भी लिखो बस पेज का रंग नीला होना चाहिए।“
“यार, तू भी बस भात खाने ही आया आठवीं तक, अब पढ़ना पड़ रहा है नौवीं से तो पजामा गीला…” उपहासात्मक स्वर हवा में बिखरे इससे पहले ही वह बोल पड़ा, “ले भात क्यों नहीं खाऊंगा? तू नहीं खाता क्या? भात तो कहीं का हो अपमान नहीं करना चाहिए, पिताजी कहते हैं।“ कहते ही लगा, वह पिताजी के साथ चला गया है चेतना से। पिताजी, जो अभी किसी के घर में पुताई पर गए हैं। उसके पिताजी, जो ड्राइवरी, कारर्पेंट्री, मिस्त्रीगिरी, पुताई, खेती, मैकेनिकी और भी न जाने क्या-क्या, सब जानते हैं। उसे देखकर आश्चर्य होता है कई बार, कि उसके इतने हुनरमंद पिता को न केवल गाँव वाले बल्कि खुद दादाजी बेचारगी भरी नजरों से देखते हैं कि वह जीवन में कुछ ढंग का नहीं कर पाए। पिताजी, पढ़ने में बहुत होशियार थे ऐसा उसने पिताजी के मुंह से ही नहीं, हर बात में पिताजी को गाली देने वाले दादाजी से भी सुना था। “आरक्षण क्या होता है?” वह अचानक प्रश्न पूछता है। सामने बैठा युवक अचकचा सा जाता है। “आरक्षण! आरक्षण!… अरे यार, आरक्षण का प्रश्न तो समाजशास्त्र और शायद राजनीतिशास्त्र में आता है? एकदम से झल्ला उठता है वह। “कहां से पूछ रहा है तू? दिखा कॉपी, यह तो मैंने लिखा ही नहीं है।“ वह कॉपी पर झपटे, इससे पहले ही वह बोला, “नहीं, इसमें नहीं लिखा है। पिताजी कहते हैं कि उनकी नौकरी आरक्षण खा गया, तो वह ध्यान आ गया था मुझे।“
“क्या यार! अभी पिताजी को याद मत कर, जो कॉपी में लिखा है उस पर ध्यान दे। वैसे भी, जिसको भी नौकरी नहीं मिलती वह यही बहाना बनाता है। ला, अब मैं पूछता हूं तुझे।“ कहकर उसने सामने पड़ी उसकी नोटबुक उठा ली, ”ओ बेटे की…तेरा अंग्रेजी का है आज! अच्छा बता, व्हाट वास मिस्टर व्हाइट’स ड्रीम?”
“अरे, व्हाट नहीं व्हट होता है,” जवाब देने से पहले उसे बदला लेने का मौका मिल गया था। “ग्यारहवीं में पढ़ रहा है और इतना भी नहीं पता!” हे हे हे.. करके उसकी हंसी आसपास खिली फ्यूंली और किल्मोड़ के पीले फूलों पर तितली सी नाच उठी।
“चल, चल! बता प्रश्न का उत्तर।“
“मिस्टर व्हाइट”स ड्रीम वज् दैट ही शुल्ड हैव ए वेरी नाइस स्कूल विथ जेंटल एंड जनरस टीचर्स व्हू कुल्ड परमिट हिम टु लर्न ऑल अबाउट शू मेकिंग ओनली एंड नथिंग एल्स।“
“हा! हा! हा! शुल्ड, हा!हा!हा! कुल्ड, हा!हा!ही!ही! उसकी हँसी थामने का नाम ही नहीं ले रही थी। “इसमें हंसने वाली क्या बात है?”
“शुड और कुड होता है।“
“क्यों होता है? यह अंग्रेज पागल हैं क्या? लिखकर उसका उच्चारण क्यों नहीं करते होंगे पागल कहीं के!”
“पागल वह कहां हैं? पागल तो हम हैं, जो उनकी भाषा पढ़ते हैं।“
“वह भी पढ़ते हैं क्या हमारी भाषा?”
“उन्हें हमारी भाषा पढ़ने की जरूरत ही क्या है? सब कुछ तो अंग्रेजी में ही है… “
“लेकिन, संस्कृत वाले गुरुजी तो कहते हैं कि सारा ज्ञान वेदों और गीता में ही है।“
“हेs! हट, उस ‘एंटीना’ की बात कौन सुनता है?” एंटीना सुनते ही हंसी की एक पिचकारी और छूटी और उसने फागुनी रंगत को थोड़ा और बढ़ा दिया।
“पता है, केमिस्ट्री वाले गुरुजी एक दिन कह रहे थे कि दो-चार सालों में यह स्कूल भी बंद हो जाएगा!”
“ठीक ही है यार! बंद हो जाएगा तो कम से कम स्कूल आने का काम तो खत्म।“ एक लंबी सांस छोड़ी उसने।
“फिर क्या करेंगे?”
“मैं तो गाड़ियों का मैकेनिक बनेगा, वहीं गैराज में पड़ा रहूंगा, सुबह-शाम। कॉपी-किताबों में क्या जो रस मिलता है? वहां डीजल की सुगंध इंजन की घरघराहट! अहा! वह लगता पहुँचने ही वाला था गाड़ी के इनज़्न्स के बीच तभी, बड़े वाले ने जोर का झटका दिया उसे, “तेरे जैसों की वजह से ही बंद हो रहे हैं स्कूल।“ कहते हुए उसे यूं देखा जैसे पुलिसवाला संदिग्ध को देखता है।
“अब इसमें मेरा क्या कसूर है? मैं तो आ ही रहा हूं ना, मन करे ना करे फिर भी। तू सोच, जो गांव के लड़के प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने जा रहे हैं उनका नहीं है क्या कसूर?”
“उनका क्या कसूर!, जब हमारी सरकार ने ही गरीबों के लिए अलग और अमीरों के लिए अलग-अलग स्कूल बना रखे हैं। चल छोड़ यार!” कह कर वह फिर कॉपी के पन्ने पलटने लगा। पन्नों की फरफराहट मेरी आंखों से कानों में उतर रही थी मेरे कान अब अधिक देखने की स्थिति में नहीं थे। नजरें स्वतः ही उठ गईं उनकी ओर। शुक्र है, वे दोनों मेरी नजरों से अनजान बस कॉपी के प्रश्न-उत्तरों में उलझे हुए थे। वैसे वे देखते, तो क्या करता! मैं सोच रहा हूं।





