नन्दिनी की आँखों से नींद कोसों दूर थी। सुबह की घटना रह-रहकर उसकी आँखों के सामने घूम जाती है। उसने सपने में भी नहीं सोचा था, उसका सगा छोटा भाई, उसके साथ ऐसा व्यवहार करेगा! सिर्फ दो साल छोटा सार्थक, जो बचपन में हर समय उसके पीछे भागता रहता था।
‘नन्दी दी, मुझे अपने साथ पिक्चर ले चलो ना !’
‘नन्दी दी, मुझे अपने साथ बाजार ले चलो ना !’
समय के साथ वही भाई आज कैसा तो बदल गया है! पैंतालीस साल की उमर में साठ का लगने लगा है। यह घर भी तो कैसा बदरंग हो गया है। इसकी चमक भी फीकी पड़ती जा रही है। बदलाव चारों तरफ हुआ है, चाहे वह मौसम हो या मकान, गाँव हो या शहर, सब पुराना अदृश्य हो गया है।
नन्दिनी ने अपने कमरे की खिड़की खोल दी। ठंडी हवा का झोंका उसके बालों को सहला गया। घुटनों तक लम्बे बाल! इन बालों को सँवारते सँवारते माँ की नाक में दम आ जाता था। हर महीने वह उसके बाल काट देतीं थीं, परन्तु थोड़े समय बाद फिर उतने ही बढ़ जाते थे। बहुत दिनों के बाद आज फिर नन्दी ने अपने लम्बे बालों को खुला छोड़ दिया था। अचानक उसे किसी के बहुत परिचित हाथों के स्पर्श का एहसास हुआ।
‘नंदी बालों को यूँ खुला न छोड़ा करो किसी की नज़र लग जायेगी।’ ईशान की आवाज़!
पर कहाँ है ईशान? दो महीने हो गये ईशान को, उसे और बच्चों को इस दुनिया में अकेला छोड़कर गये हुए। नंदी ने बालों का ढ़ीला सा जूड़ा बना लिया। छोटी थी तो जब-तब सार्थक उसके बालों को खींच कर तंग करता रहता था। वह भाग कर घर के पीछे की तरफ, थोड़ी दूर बहती हुई, नदी के किनारे जाकर बैठ जाती थी। घर के पीछे बहती हुई नदी, बड़े-बड़े बरगद के वृक्ष!सारे दिन हवा सारे घर को महकाती रहती थी। ठंडी नदी के जल को छूकर आती हवा, और चाँदनी रातों में जब नदी पार कोई आदिवासी बाँसुरी की करुण धुन छेड़ता था तो हरिप्रसाद चौरसिया की बाँसुरी का स्वर भी फीका पड़ जाता था। हवा के झोकों के साथ, पानी पर तैरते स्वरों से तन-मन एक अजीब सुरुर से भर जाता था। अब तो उस घर की सिर्फ यादें ही शेष हैं।
उस घर में बहुत सारी पास-पड़ोस की बड़ी-बूढ़ियाँ आती थीं, जो सब बच्चों की कोई चाची थी तो कोई ताई। एक वृद्धा थीं, जिन्हें बड़ों से लेकर बच्चे तक सब ‘नारायण की अम्मा’ कहते थे। नन्दिनी के घर की प्रत्येक बच्ची के कान वही छेदती थीं। जब कुछ साल पहले नन्दिनी की बेटी के कान छिदवाने थे तो ईशान उसे शहर के मशहूर सर्जन के यहाँ ले गये थे। और एक थी वह, जिसके कान नारायण की अम्मा ने घर की सुई में काला डोरा ड़ाल कर छेद दिये थे। कान छेदने के बाद वह माँ को हिदायतें देती थी कि तीन-चार दिन सरसों के तेल में हल्दी डालकर लगाना, बस कान ठीक हो जायेगा और अब तो,’सोफरामायसिन’ लगाना, तेल तो छुआना भी मत, नहीं तो कान पक जायेगा, ऐसी-ऐसी नफ़ासत भरी दलीलें जब आती हैं, तब नन्दी को नारायण की अम्मा जरूर याद आती है।
बचपन की कितनी-कितनी बातें! साथ-साथ खेलना, गुड्डे-गुड़ियों का व्याह रचाना!वह हमेशा गुड़िया की माँ बनती और पास में रहने वाली सुमन गुड्डे की माँ। नियत दिन बैंड-बाजे के साथ उसकी गुड़िया से ब्याह रचाने सुमन का गुड्डा आता। साथ में बच्चों की बड़ी सी बारात आती। छत पर सारे बारातियों को भोजन कराया जाता और दान-दहेज के साथ, झूठ-मूठ के आँसुओं के साथ गुड़िया को विदा कराया जाता। ऐसे ही एक बार गुड़िया का ब्याह रचाते समय घरातियों और बारातियों में घमासान युद्ध छिड़ गया। बारातियों ने उसकी गुडिया के बाल नोचकर उसे एक तरफ फेंक दिया तो
सार्थक और उसकी मित्र मण्डली ने गुड्डे के हाथ-पैर अलग करके उसे छत पर से नीचे फेंक दिया। उसी लड़ाई-झगड़े में सार्थक ने नन्दी का सिर दीवार से फोड़ दिया। सिर से बहते खून को देखकर सारे बराती भाग खड़े हुए। माँ ने सार्थक को मारा ही नहीं, पूरे दिन खाना भी नहीं दिया। रात को माँ से छुपाकर जब उसने सार्थक को खाना खिलाया, तो वह उसके गले लग गया और सिसक-सिसक कर कहने लगा, ‘सच दीदी, भगवान की कसम, अब तुझे कभी नहीं मारूँगा। तेरे बाल भी नहीं खीचूँगा।’
समय के साथ आज वही सार्थक कितना बदल गया है। छोटा था तो माँ से वही पैसे माँगकर लाता और दोनों श्याम बाबू के यहाँ गोल-गप्पे खाने भाग जाते थे। दोनों का स्कूल भी एक ही था और जब नन्दिनी को सेंट जोन्स में एडमीशन मिला तो वह भी उसी की कॉलेज में आ गया। नन्दी सेकंड ईयर में थी, सार्थक फर्स्ट ईयर में। कॉलेज में आते ही वह अपने आपको नन्दिनी का कर्त्ता-धर्ता समझने लगा।
‘सच-सच बता, लाइब्रेरी की सीढ़ियों के पास तू उस चोट्टे से क्या बातें कर रही थी?’
‘कौन चोट्टा?’
‘वही, उमर खय्याम।’
‘कौन उमर खय्याम? साफ-साफ बोल’
‘वही सलीम शहजादा, जो हर लड़की को देखकर रुबाइयाँ गाने लगता है।’
‘अच्छा, तू अरमान की बात कर रहा है। तुझे पता भी है, वह कितना ब्रिलियन्ट है। उस से नोट्स माँग रही थी।’
‘अच्छा! इतना हँस-हँस कर।’
‘तो क्या रो-रो कर माँगती?’
‘लड़कियाँ तेरी क्लास में ब्रिलियन्ट हैं ही नहीं, अब किसी लड़के से बात करते देखा तो पापा से कहकर तेरा कॉलेज आना बन्द करवा दूँगा।’
‘बड़ा आया। ठीक से कपड़े पहनना तो सीख ले, उल्टी शर्ट पहने हुए है।’
सार्थक तो उसका कॉलेज जाना बंद नहीं करवा सका, पर ईशान ने करवा दिया। थर्ड ईयर खत्म होते ही उसकी ईशान से शादी हो गई। गुड़ियों के ब्याह पर जार-जार रोने वाला सार्थक उसकी विदाई पर एकदम चुप हो गया। धीरे से नन्दिनी ने उससे कहा,
‘ऐसा काठ का पुतला बना क्यों खड़ा है? दो-चार खुशी के आँसू ही बहा दे। अब इस घर का साम्राज्य और उस साम्राज्य का एकछत्र सम्राट तू ही है।’
नन्दी के इतना कहते ही वह फूट-फूट कर रोने लगा।
‘मुझे नहीं चाहिए यह साम्राज्य, मत जा तू।’
‘पापा के इतने अरमानों से बनाये इस घर को सँभालना सार्थक।’
पर कहाँ सँभाल पाया सार्थक! पापा आर्किटेक्ट थे। शहर से दूर इस एकान्त स्थल में उन्होंने अपने सपनों के घरौंदे को बड़े चाव से बनाया था।
नाम था ‘नेस्ट’ अनूठी वस्तुओं के संकलन और संयोजन से बना हुआ ड्राइंग-रूम। पारम्परिक शैली में भारतीय पद्धति से की गई साज-सज्जा। काठियावाड़ी सोफे और चौकियों के पास ठेठ नक्काशी दार पुरातनकाल का हुक्का, तिपाई पर चाँदी का प्राचीन पानदान। दीवारों पर ‘मधुबनी’ की कलाकृतियाँ। सब कुछ अपनी मिट्टी की महक से सुवासित। उन्हें पढ़ने का बेहद शौक था और वही शौक नन्दिनी में भी आया था, इसलिए पूरे घर में सबसे अच्छा कमरा उन्होंने जो बनवाया, वह था उनका स्टडी रूम। चार-दीवारों से घिरा स्टडी-रूम एक जीवन जीने के लिये पर्याप्त था। अपने डिजाइन के लिये सारे शहर में प्रसिद्ध था उनका वह घर और स्टडी रूम!दो दीवारों पर जड़ी दो खिड़कियाँ, अभिव्यक्ति की चमक से भरपूर, रेशमी पर्दों के आवरण में यादों को अपने में समेटे, दो आँखों जैसी खिड़कियाँ। एक दीवार पर कुछ कलाकृतियाँ, हाट जाती हुई आदिवासी युवतियाँ, पुरानी यादों के प्रतीक कुछ मास्टर पीस!ऐसा लगता था, जैसे प्रत्येक चित्र में एक भूली-बिसरी कहानी दबी हुई है। एक दीवार पर नीचे से लेकर ऊपर छत तक बने हुए बुक-शेल्फ किताबों से अटे हुए। ऊपर तक पहुँचने के लिये घुमावदार सीढ़ियाँ। सतरंगी रंगों से भरपूर किताबें, लगता था, एक इन्द्रधनुष बिछ गया है। कितना कुछ सहेज रखा है, इन बेजान पन्नों ने, अपने अन्दर, एक पूरा का पूरा जीवन। किसी की यादें सिमटी हैं, किसी के दुःख, किसी की खुशियाँ। प्रेमचन्द से लेकर शेक्सपियर तक सब मिल जाएँगे यहाँ। पूरे कमरे में बिछा हुआ लाल रंग का कार्पेट। दो बड़ी-बड़ी कुर्सियाँ। पापा यहाँ घंटों गुजार देते थे, नन्दिनी भी। बड़े ममत्व से उसने कुर्सियों पर हाथ फिराया तो उसके हाथ धूल से भर गये। किताबों पर भी मन भर धूल जमी थी, लगता था, महीनों से कोई उस कमरे में नहीं आया है।
नन्दिनी का मन हुआ, शादी से पहले की तरह ही वह सार्थक को बुलाये और डाँट दे, ‘पापा ने यह स्टडी रूम क्या सिर्फ मेरे लिये ही बनवाया है। मैं ही किताबों को झाड़ती-झटकती रहूँ। देखना जब ससुसाल जाऊँगी तो सारी किताबें अपने साथ ले जाऊँगी। पर हुआ क्या? वही ढाक के तीन पात। ईशान भी निरा बिजनैसमैन निकला। पढ़ने से उसे कोई सरोकार नहीं था, उसे बस रात-दिन नोट दिखते रहते थे। वह फिर भी खाली समय में पढ़ती रहती थी। अचानक उसे स्टडी रूम में घुटन महसूस होने लगी। वहाँ से निकल कर वह बगीचे की तरफ जाने लगी कि सन्नाटे को चीरती हुई उसे कनिका की आवाज़ सुनाई दी – ‘हाथी मरे भी तो सवा लाख का होता है। नन्दिनी भी ऐसा ही हाथी है, हमारे लिए। जीजाजी कितना छोड़ गये हैं। तुम्हारी हालत इतनी खराब है, दीदी को कहो तुम्हारी कुछ मदद करें। वैसे भी उनकी दो बेटियाँ ही है इतने धन का क्या करेंगी?’
ओह! तो इसलिए कनिका उसे दो महीने से जिद कर-कर के बुला रही
‘कुछ दिन हमारे पास आ जाओ दीदी, मन बहल जायेगा।’
उसे फिर सुबह की घटना याद आ गयी। वह सार्थक को बिना खबर किये ही यहाँ आ गयी थी। जब यह घर के दरवाजे पर पहुँची तो कनिका और सार्थक निहित को दही खिला रहे थे, और वह हाथ में फाइल लिए बाहर जाने के लिए तैयार खड़ा था। निहित जरूर इन्टरव्यू के लिए जा रहा होगा, यह नन्दिनी समझ गयी। दोनों बेटियाँ मामा-मामा कहकर सार्थक से लिपट गयीं और वह इस आशा में खड़ी रही कि अभी कनिका आकर उसे गले लगायेगी।
नन्दी की आँखें भीग गयी। विवाह के बाद आज पहली बार नन्दी पितृगृह की देहरी पर बिना ईशान के विधवा वेश में खड़ी है। कनिका और सार्थक ने उसे गले लगाने की जगह मुँह लटका दिया और निहित से कहा,
‘बुआजी आयी हैं। अब कल इंटरव्यू के लिए जाना।’
निहित आश्चर्य से कनिका को देखने लगा, तब धीरे बहुत धीरे इतना धीरे की नन्दिनी सुन न पाये कनिका ने कहा,’अपशगुन हुआ है। विधवा का शगुन लेकर जाओगे तो नौकरी नहीं मिलेगी।
धीरे बहुत धीरे कही हुई बात भी नन्दिनी ने सुन ली और वह निस्पन्द हो गई। आज न माँ हैं, न पापा। यही इकलौता भाई है और भाभी जो बहन को अभागन कह रही है। नन्दिनी कुछ नहीं बोली चुपचाप अन्दर आ गयी। अब ज्यादा दिन नहीं रहेगी। दो-तीन दिन में अपने घर वापिस लौट जायेगी। उसी के साथ उसे याद आई पड़ोस में रहने वाली ऋचा, जो अपने प्रत्येक शुभ काम को करने से पहले उससे आशीर्वाद लेने आती थी।
आम के बड़े से वृक्ष पर मँजरिया लगी हुई थी।
‘मैं यहाँ आम की गुठली रोपूँगा।’
‘नहीं, मैं लगाऊँगी।’
‘अच्छा, जिस से जब यह पेड़ बड़ा हो जाये और इस पर आम आयें, तो तू सबसे कह सके कि यह पेड़ मैंने लगाया है। चल हट, भाग यहाँ से।’ और वह गुलाब के पास गढ्ढा खोदने लगा।
‘मूर्ख! सारे गुलाब भी सुखा देगा। पीछे कितनी खाली जगह पड़ी है, वहाँ जाकर लगा।’
आज उन दोनों भाई-बहनों के लगाए हुए आम, जामुन, चीकू, अमरुद के पेड़ खूब फल दे रहे हैं। ममत्व से उसने आम के वृक्ष पर हाथ फिराया।
‘दीदी’
‘अरे, तू कब आया?’
‘तू इतनी रात को यहाँ क्या कर रही है?’
‘कुछ यादों को सहेज रही हूँ, जाते समय साथ लेती जाऊँगी।’
‘मुझे माफ कर दे, दी।’
‘क्यों?’
‘आज सुबह जो हुआ। मुझे पता है, सुनकर भी तू अनजान बन रही है। कनिका ने तो गलती की ही, पर मैं जो सुनकर अनजान बना रहा। चुप रहा।’
‘कनिका की जगह कोई भी होता तो यही करता, हमारे समाज में शुभ कार्य के लिए जाते समय विधवा का मुँह देखना अपशगुन ही होता है न! अब अगर दुर्भाग्य से वह विधवा तेरी बहन है तो अपशगुन शगुन में तो नहीं बदल जायेगा न!’
‘परिस्थितियों और अभावों ने उसे ऐसी बना दिया है, वरना….।’
‘कोई बात नहीं सार्थक। कनि को कुछ न कहना, मैं तुम्हारे सुबह हुए अपशगुन को शगुन में बदल दूँगी। ईशान बहुत बड़ा बिज़नेस छोड़कर गए हैं। निहित को अब नौकरी ढूँढ़ने की आवश्यकता नहीं है। वह सँभालेगा ईशान का बिजनेस।’
हतबुद्धि सा सार्थक वहीं आम के पेड़ के नीचे चबूतरे पर बैठ गया। नन्दिनी अपने कमरे में लौट गई। उसे लग रहा था, आज उसने ऐसा कुछ खो दिया है, जिसे परिभाषित नहीं किया जा सकता और खो देने के बाद सोच रही है, कौन सा सम्बन्ध अपना है, वह जो रक्त से जुड़ा है या वह जो मात्र चाहने की इच्छा से जुड़ा है।





