अवकाश पर स्त्री
स्त्रियाँ जब अपनी देह का साथ न पाकर
स्वयं को आराम देने के लिए
अवकाश पर होती हैं
उस दिन वो सुबह चाय की चुस्कियों के साथ
पूरे दिन का गणित लगा रही होती हैं
कि कब-कब कैसे समय बिताना है
थोड़ा सोचविचार कर
अपनी थकान को झटकर मुडेर पर रख देती हैं
फिर सिलसिलेवार
घर-आँगन के कोने को रच-रच को बुहारती हैं
दीवारों पर लगे जाले को इत्मीनान से उतारती हैं
अल्मारी के बिखरे कपड़ों को सलीके से तहा रही होती हैं
रसोई के डिब्बे को धोकर सुखाकर करीने से सजाती हैं
सफेद और रंगीन कपड़ों को मशीन में अलग-अलग खंगाल रही होती हैं
चादरों की सिलवटें हटा तकिए का गिलाफ बदल रही होती हैं
बच्चों की बिखरी किताबें,शर्ट की टूटी बटन,कैरम व शतरंज की गोटियों को
आहिस्ता-आहिस्ता अपनी जगह पर जमा रही होती हैं
इन सबके साथ मन में उठने वाले अनेकों उद्गगारों को
भावनाओं के मलमली कपड़े में लपेटकर
संवेदना की सूई से बारीक तुरपाई कर रही होती हैं
कुछ इस तरह से आराम करते हुए
वो अवकाश का दिन बिता रही होती हैं
सच में ये औरतें भी न
पूरे दिन बस यूँ ही आराम फरमा रही होती हैं
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ख्वाहिशों के हजार रंग
इंद्रधनुषी रंगों से सजी होती हैं
मासूम लड़कियों की ख्वाहिशें
मन के कोरे पन्ने पर
साल दर साल एक एक कर दर्ज होती रहती हैं
उनको पूरा करने की चाह लिए
दिन रात उसी को जीने लगती हैं ये
रत्न जड़ित अरमानों की चादर ओढ़े
जेहन में गहरे उतार लेती हैं ये अपने सतरंगी सपने
जब इनकी इच्छाओं को पर मिलता है
तब ये झूम उठती हैं खुशी के मारे
तितलियों सा फिरना
फूलों सा महकना
सूरज सा चमकना
खुले आसमान में स्वछंद उड़ना
ये सारी ईप्साएं अंतस में लेकर
फुदकती गमकती रहती हैं
देखो इनको इनके ख्वाहिशों में रंग भरते रहने देना
नहीं तो मर जाएंगे उनके भीतर के सभी रंग
और ढोती रहेंगी आजीवन वो बेरंगी ख्वाहिशों का बोझ





