साल 1900, उत्तरप्रदेश का अकबरपुर गाँव जहाँ जन्म लेता है एक बच्चा लक्ष्मी, 10-12 साल की उम्र में ही वह अपनी माँ को खो देता है। उसकी माँ बड़ी आध्यामिक थीं तो उसके दिल में भी माँ के विचार उठने लगे कि उसे भी अपनी माँ के जैसे राम जी के पास जाना है। बस फिर क्या 10-12 साल की उम्र में जब उसे पढना, खेलना चाहिए था उसी उम्र में उसका ब्याह हो गया। लेकिन पढ़ाई, लिखाई खेल कूद से दूर उस बालक मन ने उस उम्र में ही वैराग्य धारण कर लिया और सालों की तपस्या, भारत भ्रमण करते हुए वह पहुंचा कैंची (हिमाचल) वहीं उसने आश्रम बनाया। एक से बढ़कर एक उसने अपने तपोबल से लोगों को चमत्कार दिखाए। धीरे-धीरे उसकी प्रसिद्धि इतनी बढ़ी की देश-दुनिया के लोग उसे नीब करौरी बाबा के नाम से जानने लगे। कहते हैं यह बाबा स्वयं हनुमान जी का अवतार थे। इसलिए ही इन पर बनी और हालिया रिलीज हुई फ़िल्म का नाम भी ‘हनुमान अंश’ रखा गया है। तो चलिए इस आध्यात्मिक सिनेमाई यात्रा पर इस रिव्यू के माध्यम से-
कहानी का आरंभ भोसले (चंदन आनंद) से होता है, जो अपने पोते को नीम करौली बाबा के बारे में बता रहे हैं। भोसले 1942 के उस दौर को याद करता है, जब वह क्रांतिकारी था और अंग्रेजी हुकूमत से बचते हुए जीवन बिता रहा था। बाबा से उसकी मुलाकात तत्कालीन राजनीतिक और सामाजिक माहौल से जोड़ती है। इसके बाद कथा लक्ष्मीनारायण नाम के उस बालक की ओर मुड़ती है, जो अपनी मां की मृत्यु से भीतर तक टूट चुका है। जब उसे बताया जाता है कि उसकी मां भगवान के पास चली गई हैं, तो उसके बाल मन में एक सीधा लेकिन गहरा सवाल जन्म लेता है- अगर मां भगवान के पास हैं, तो भगवान कहां हैं? यही प्रश्न उसे घर से बाहर निकालता है और उसकी तलाश मंदिरों, जंगलों, नदियों, गांवों और साधुओं के बीच से गुजरती हुई एक लंबी अंतहीन आध्यात्मिक यात्रा में बदल जाती है।
फ़िल्म की एक खूबी भी है कि लक्ष्मीनारायण की खोज को केवल ईश्वर की तलाश बनाकर नहीं छोड़ा गया है। धीरे-धीरे उसके भीतर यह बोध पैदा होता है कि भक्ति केवल पूजा या साधना तक सीमित नहीं है। भूखे को भोजन देना, किसी जरूरतमंद की सहायता करना, जीव-जंतुओं के प्रति संवेदना रखना और बिना किसी भेदभाव के मनुष्य से प्रेम करना भी उसी भक्ति का विस्तार है। इस बदलाव को फ़िल्म का केंद्रीय विचार कहा जा सकता है। निजी पीड़ा से शुरू हुई यात्रा अंततः आत्मबोध और सेवा तक पहुंचती है।
बालक लक्ष्मी के प्रकृति से संवाद करने वाले दृश्य मन मोहते हैं। पेड़-पौधों, पक्षियों और दूसरे जीवों के साथ उसकी सहज निकटता को निर्देशक ने किसी बड़े चमत्कारी प्रदर्शन की तरह पेश करने के बजाय कथा के स्वाभाविक हिस्से के रूप में रखा है। एक महंत जब उसकी प्रतिभा और साधना से प्रभावित होकर उसे अपने आश्रम की जिम्मेदारी देना चाहते हैं, तब बालक उस पद और उससे जुड़ी प्रतिष्ठा को स्वीकार नहीं करता। उसका यह निर्णय फ़िल्म में वैराग्य के अर्थ को सामने लाता है। वह समझ चुका है कि आध्यात्मिक मार्ग पर उपलब्धि भी कभी-कभी बंधन बन सकती है। यह प्रसंग फ़िल्म के सबसे अर्थपूर्ण दृश्यों में से एक है।
विशाल चतुर्वेदी का निर्देशन फ़िल्म की सबसे बड़ी ताकत है। उन्होंने बाबा के जीवन को किसी भव्य धार्मिक तमाशे में बदलने से काफी हद तक बचाया है। फ़िल्म में बड़े-बड़े दृश्य प्रभावों या लगातार चमत्कारों की जगह वातावरण, प्रकृति, मौन और भावनात्मक प्रसंगों पर भरोसा किया गया है। हरे-भरे पहाड़, झीलें, ग्रामीण परिवेश और शांत प्राकृतिक दृश्य कथा के साथ घुल-मिल जाते हैं। प्रकृति यहां सिर्फ पृष्ठभूमि नहीं रह जाती बल्कि बाबा की साधना और आंतरिक यात्रा का हिस्सा महसूस होती है। हालांकि बावजूद इसके निर्देशन में कई छोटी-छोटी कमियां अखरती हैं लेकिन दर्शक उन्हें नजरअंदाज भी आसानी से कर जाता है। कई जगह कहानी की गति धीमी पड़ती है तो कुछ प्रसंगों के बीच संक्रमण उतना सहज नहीं लगता। बाबा की ख्याति किस तरह धीरे-धीरे दूर-दूर तक फैलती है, इसका पर्याप्त विस्तार भी फ़िल्म में नहीं मिलता। दर्शक को कई बार लगता है कि एक महत्वपूर्ण घटना सामने आई और उसके भावनात्मक परिणाम को पूरी तरह विकसित किए बिना कहानी अगले प्रसंग पर चली गई। फ़िल्म का उद्देश्य शायद जीवन की घटनाओं से अधिक उनके आध्यात्मिक अर्थ को सामने रखना है।
बाबा से जुड़े प्रचलित प्रसंगों को कहानी में शामिल करना फ़िल्म को रोचक जरूर बनाता है। अंग्रेज अधिकारी द्वारा उन्हें ट्रेन से उतार दिए जाने के बाद ट्रेन का आगे न बढ़ना और बाद में अधिकारी का क्षमा मांगना, बाबा को भुजंगों में लिपटा दिखाना, जीभ पर पौधे उगाना आदि जैसे दृश्य इसी क्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसी तरह निर्धन भक्त के घर भोजन करने और भोजन समाप्त न होने वाला प्रसंग भी बाबा की लोक-आस्था से जुड़े विश्वासों को सामने लाता है। इन घटनाओं को निर्देशक ने पूरी तरह चमत्कार प्रदर्शन में बदलने के बजाय बाबा और उनके भक्तों के संबंध को रेखांकित करने के लिए इस्तेमाल किया है। हालांकि यहां फ़िल्म आलोचनात्मक दूरी बरत सकती थी। चमत्कारों को श्रद्धा की दृष्टि से दिखाना अपनी जगह है लेकिन उनके सामाजिक और मनोवैज्ञानिक अर्थों पर थोड़ी और पड़ताल फ़िल्म को और अधिक गंभीर बना सकती थी।
फ़िल्म का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि बाबा स्वयं को केंद्र में स्थापित करने के बजाय भक्तों को हनुमानजी की ओर मोड़ते दिखाई देते हैं। ग्रामीणों की बढ़ती श्रद्धा को अपने व्यक्तित्व के प्रति आकर्षण बनने देने के बजाय उसे आराध्य की भक्ति में बदल देना उनके चरित्र की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में रखा गया है। हनुमानजी की मूर्ति का निर्माण और सामूहिक भक्ति का दृश्य इसी विचार को आगे बढ़ाता है। यहां फ़िल्म का संदेश साफ है कि सच्ची आध्यात्मिकता व्यक्ति-पूजा में नहीं बल्कि अपने भीतर प्रेम और सेवा की भावना पैदा करने में है।
अभिनय की बात करें तो नीम करौली बाबा की भूमिका में शोभिनव सत्या ने उम्दा अभिनय प्रदर्शन किया है। ऐसे व्यक्तित्व का किरदार निभाना आसान नहीं जिसके प्रति लाखों लोगों की गहरी आस्था रही हो। अभिनेता ने इस चुनौती का सामना ऊंचे स्वर या अत्यधिक नाटकीयता के बजाय चेहरे की शांति और सहज देहभाषा से किया है। कई दृश्यों में उनका मौन ही संवाद का काम करता है। बाल लक्ष्मीनारायण की भूमिका में विहान एस. हेगड़े भी प्रभाव छोड़ते हैं। बाल कलाकार के चेहरे पर दिखाई देने वाली जिज्ञासा और भीतर का अकेलापन कहानी के शुरुआती हिस्से को भावनात्मक आधार देता है। पूर्णिमा तिवारी और अनिल रस्तोगी भी अपने-अपने हिस्से में प्रभावी हैं। चंदन आनंद का चरित्र कहानी को वर्तमान और अतीत के बीच जोड़ने का काम करता है।
फ़िल्म का संगीत उसके आध्यात्मिक वातावरण को मजबूत करता है। ‘हृदय में जिनके सीता-राम’ जैसे गीत कथा से बाहर निकलने के बाद भी स्मृति में बने रहते हैं। ‘राम भजन की ओर’ सरल और सहज है, जबकि ‘पार्वती’ में गृहस्थ जीवन की ओर लौटने वाले प्रसंग को भावनात्मक आधार मिलता है। ‘नमः शिवाय’ जैसे भक्ति गीत फ़िल्म के धार्मिक वातावरण को गहरा करते हैं। संगीत का सबसे अच्छा पक्ष यह है कि वह अधिकांश जगहों पर कथा पर हावी नहीं होता। अंतिम हिस्से में फ़िल्म का स्वर कुछ अधिक रहस्यमय हो जाता है। जंगल के प्रसंगों और हनुमान चालीसा की उपस्थिति से कहानी रोमांच पैदा करती है। इसी दौरान बाबा का यह भाव सामने आता है कि केवल शब्दों से मंत्र बोलना पर्याप्त नहीं, उसके पीछे मन की एकाग्रता और श्रद्धा भी जरूरी है। यह विचार फ़िल्म की आध्यात्मिक दृष्टि को स्पष्ट करता है। ‘मननात् त्रायते इति मन्त्रः’ की अवधारणा भी इसी ओर संकेत करती है कि मंत्र का संबंध केवल उच्चारण से नहीं बल्कि चेतना से है।
फ़िल्म का सबसे मजबूत विचार शायद यही है कि आध्यात्मिकता मनुष्य को संसार से काटती नहीं बल्कि उसे संसार के प्रति अधिक संवेदनशील बनाती है। बाबा के जीवन से जुड़े प्रसंगों के माध्यम से फ़िल्म बार-बार सेवा, करुणा और प्रेम की ओर लौटती है। किन्तु इतना सब होकर भी फ़िल्म की कुछ सीमाएं हैं। मसलन कई घटनाएं इतनी तेजी से आती हैं कि उनके प्रभाव को आत्मसात करने का समय नहीं मिलता। कथा के कुछ हिस्सों में दोहराव भी महसूस होता है, खासकर तब जब बाबा की करुणा, भक्ति और चमत्कारों को अलग-अलग घटनाओं के जरिए बार-बार रेखांकित किया जाता है। यदि पटकथा इन प्रसंगों में थोड़ी और कसावट रखती तो फ़िल्म का प्रभाव और गहरा हो सकता था।
इसके बावजूद ‘हनुमान अंश’ को केवल धार्मिक फ़िल्म मानकर देखना उसके साथ न्याय नहीं होगा। यह मूलतः एक ऐसे मनुष्य की कहानी है, जो अपने निजी दुख का उत्तर बाहर खोजते-खोजते भीतर की यात्रा तक पहुंचता है। फ़िल्म यह सवाल भी उठाती है कि ईश्वर की तलाश आखिर किस रूप में पूरी होती है मंदिर में, तपस्या में, चमत्कार में या किसी भूखे मनुष्य को भोजन कराने में? निर्देशक का उत्तर स्पष्ट है भक्ति का अंतिम पड़ाव सेवा और करुणा है। शायद इसी अर्थ में ‘हनुमान अंश’ का वास्तविक आत्मबोध उसके पात्र में नहीं, दर्शक के भीतर घटित होता है जब वह यह सोचने लगता है कि ईश्वर की खोज आखिर बाहर कितनी है और भीतर कितनी।







