‘द वॉइस ऑफ़ हिन्द रज़ब’ समकालीन सिनेमा में एक तीखा हस्तक्षेप है, जहाँ फ़िल्म केवल मनोरंजन नहीं बल्कि समय का दस्तावेज़ बनकर उभरती है। काओथर बेन हानिया की यह फ़िल्म डॉक्यूमेंट्री और फिक्शन की सीमाओं को धुंधला करते हुए गाज़ा में हुई त्रासदी को बेहद ईमानदारी और संवेदनशीलता से सामने लाती है। सटीक सूचनाओं के अभाव और दुष्प्रचार के दौर में यह फ़िल्म अपने कथ्य और साहसिक फिल्मांकन के कारण विशेष महत्व रखती है। यही वजह है कि वास्तविक घटनाओं का सिनेमाई रूपांतरण यहाँ गहरे प्रभाव के साथ सामने आता है, जो दर्शक को मानसिक रूप से तैयार रहने की मांग करता है और लंबे समय तक उनके मन-मस्तिष्क के भीतर गूंजता रहता है।
कहानी है एक सर्द दिन की जब फिलिस्तीन रेड क्रिसेंट के एम्बुलेंस कार्यालय में आपातकालीन कॉल आती है। उत्तरी गाज़ा में एक परिवार पर हमला हुआ है। गोलियों से छलनी वाहन में एक पाँच वर्षीय बच्ची हिंद रजब जिन्दा है, पर अपने परिजनों के बीच फँसी हुई, घंटों तक मदद की पुकार लगाती है। पास में ही एम्बुलेंस होने के बावजूद सैन्य प्रतिबंध उसके लिए राहत को असंभव सा बना देते हैं। यह घटनाक्रम मानवीय असहायता की चरम स्थिति को उजागर करता है। हालिया समय की यह त्रासदी दर्शकों को सीधे उस भय, अकेलेपन और निराशा के अनुभव से जोड़ देती है, जहाँ कोई भावनात्मक दूरी शेष नहीं रहती।
इस फ़िल्म की संरचना का सबसे सशक्त पक्ष इसका सीमित स्पेस है क्योंकि इसका पूरा कथा-विन्यास एक डिस्पैच सेंटर के भीतर घटता है, जहाँ कर्मचारी एक कॉल को संभालने की कोशिश कर रहे हैं। फोन के दूसरी तरफ एक मासूम आवाज़ है, जो लगातार मौत के साये में घिरी हुई सहायता मांगती है। फ़िल्म का यह क्लॉस्ट्रोफोबिक वातावरण तनाव को निरंतर बनाए रखता है। जिसके चलते यह फ़िल्म निर्देशकीय दृष्टि से स्पष्ट राजनीतिक फ़िल्म बन जाती है, जो व्यक्तिगत त्रासदी के साथ-साथ व्यापक सत्ता-संरचनाओं, कब्ज़े और मानवीय संस्थाओं की सीमाओं पर सवाल उठाती है।
फ़िल्म का एक विवादास्पद पहलू इसमें इस्तेमाल की गई वास्तविक आवाज़ का है। जिससे इसका शुरुआती प्रभाव भीतर गहरा झकझोरता है लेकिन आगे चलकर यही निर्णायक असहजता भी पैदा करता है। क्या यह पीड़ा का उद्घाटन है या उसका प्रस्तुतीकरण? यही द्वंद्व इस कृति को विशिष्ट बनाता है, जहाँ सिनेमा की नैतिक सीमाएँ प्रश्न बनकर सामने आती हैं। तकनीकी रूप से फ़िल्म काफ़ी सधी हुई है, जिसमें ध्वनि का प्रयोग कथा का मूल आधार बनता है जबकि छायांकन और संपादन संयम के साथ प्रभाव रचते हैं। फ़िल्म से हिंसा को फ्रेम से बाहर रखकर केवल आवाज़ों और चेहरों के माध्यम से भयावहता का अनुभव कराया गया है, जो इसे सनसनीखेज़ होने से बचाता भी है।
यह कहानी प्रशासनिक जटिलताओं और मानवीय त्रासदी के टकराव को भी रेखांकित करती है। कुछ मिनटों की दूरी अनुमति और समन्वय की प्रक्रिया में घंटों में बदल जाती है, जो ‘प्रशासनिक हिंसा’ का रूप ले लेती है। ऑडियो को दृश्य रूप में प्रस्तुत करने की तकनीक उस मासूम आवाज़ को लगभग मूर्त बना देती है एक ऐसी उपस्थिति, जो दिखाई दिए बिना भी पूरे समय बनी रहती है।
सिनेमा का यह अनुभव आसान नहीं है क्योंकि यह मनोरंजन नहीं है बल्कि सामना है उस कड़वी हकीकत का जिसे पचा पाना हर किसी के लिए आसान नहीं। फ़िल्म कोई निष्कर्ष प्रस्तुत नहीं करती अपितु असहज प्रश्नों के साथ आपको छोड़ जाती है। इस बात के साथ की क्या दर्शक मात्र साक्षी रह सकता है या उसे इस सच्चाई को स्वीकार करना होगा? यह कृति स्मृति और प्रतिरोध का दस्तावेज़ तो बनकर उभरती ही है, जो याद दिलाती है कि सुर्खियों और आंकड़ों के पीछे वास्तविक जीवन और आवाज़ें होती हैं, जिन्हें अनसुना करना संभव नहीं।
फ़िल्म निर्देशकीय कौशल से जिस तरह कसी हुई है इसके लिए इसे ऑस्कर से नोमिनेट किया जाना ही काफ़ी नहीं बल्कि इसे पुरुस्कृत भी किया जाना चाहिए। अपने समय की इस बेहद कड़वी फ़िल्म बल्कि हकीकत से रूबरू होइए और देखिए की सिनेमा ऐसे भी बनता है। कायदे से यह सिनेमा बनाया नहीं बल्कि उसे जिया गया है कहा जाना चाहिए। दिल बड़ा हो तो इसे खोजिए और देख डालिए क्योंकि हाल के राजनीतिक वितंडे के बीच यह फ़िल्म भारत में बैन कर दी गई है। क्योंकि सच कड़वा होता है और उसे इस फ़िल्म के जैसा कड़वा होना भी चाहिए तभी वह आपको भीतर तक पिघलाकर नरम बना सकेगा।
अपनी रेटिंग- 4 स्टार







