साल 1885 में असम में जन्मे हरि नारायण दत्त बरूआ असमिया भाषा के एक ऐसे चर्चित लेखक थे जिन्होंने बच्चों के लिए कई किताबें लिखीं और उन्हें आज भी स्कूली पाठ्यपुस्तक में शामिल किया जाता रहा है। प्राचीन असमिया वैष्णव साहित्य पर कई किताबें लिख उन्होंने असमिया वैष्णव साहित्य में शोध के नए मार्ग प्रशस्त किये। असम के नलबाड़ी के पास कलकुची गाँव में जन्में बरूआ ज्यादा पढ़-लिख नहीं सके स्नातक तक पढने वाले बरूआ गुवाहाटी, उत्तर लखीमपुर, काकजन और असम के अन्य हिस्सों में मिडिल इंग्लिश स्कूलों में अध्यापन कार्य करते रहे। चित्रदर्शन (उपन्यास) और भारत दर्शन (यात्रा वृतांत) के साथ पुष्पावली (कविताओं का संग्रह) लिखने वाले बरूआ ने श्रीमद् भागवतम्, चित्रा भागवत, श्री शंकर बाक्यामृत, असमिया महाभारत असमिया साहित्य में जो क्रान्ति की वह विचारणीय होने के साथ-साथ शोध का भी कारण है। यही वजह है कि उन्हें आज आधुनिक असमिया भाषा को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले लेखक के रूप में सम्मानजनक दृष्टि से देखा जाता है।
असम की राष्ट्रीय पहचान की सामूहिक चेतना में स्थायी स्थान रखने वाले व असमिया इतिहास के एक महत्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में, उन्हें उस समय असमिया समाज की आवश्यकताओं की गहरी समझ थी और उन्होंने इस समझ को प्रभावशाली कार्यों में रूपांतरित किया। जब एक तरफ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम भारत के नवजागरण का युग था तब उन्होंने भारत को आत्मनिर्भर और शिक्षित देखने की कल्पना जाहिर की- एक ऐसा स्वतंत्र भारत जो अपनी विरासत की महिमा को संजो सके।
असम के बाहर के साहित्य जगत के लोग भी बरूआ के बारे में नहीं जानते होंगे। यही वजह रही कि राष्ट्रीय फ़िल्म पुरूस्कार प्राप्त करने वाले असमिया भाषा के फ़िल्म समीक्षक उत्पल दत्ता इन दिनों वृतचित्र के फ़िल्म निर्माण में संलग्न है। अब तक की उनकी बनाई वृतचित्र भिन्न-भिन्न व्यक्तियों को सामने लेकर आती रही हैं। लीक से हटके किस्म का सिनेमा बनाने वालों की कैटेगरी में उत्पल को शामिल किया जाना चाहिए। भारतीय भाषाओं के उन्नयन हेतु समर्पित सिने-सृजन के क्षेत्र में एक विशिष्ट नाम बन चुके असमिया भाषा के उत्पल दत्ता द्वारा निर्मित व निर्देशित यह वृत्तचित्र ‘हरिनारायण (The Renaissance Man)’ वस्तुतः असमिया साहित्य के एक अप्रतिम नायक- हरि नारायण दत्त बरूआ- को केंद्र में लाने का एक सांस्कृतिक प्रयत्न है। यह वृतचित्र न केवल एक साहित्यकार की जीवनगाथा का दिग्दर्शन कराता है, अपितु आधुनिक असमिया भाषा की निर्मिति तथा नवजागरण-युगीन चेतना की समवेत ध्वनि भी प्रस्तुत करता है।
उनके बनाए इस वृत्तचित्र हरिनारायण (the renaissance man) को देख बरूआ के बारे में जो रोचक जानकारियाँ मिलती हैं वे समृद्ध तो करती ही हैं साथ ही पता चलता है कि 20वीं शताब्दी में केवल बंगाली भाषा ही प्रचलन में थी। जब यह भाषा असमिया में परिवर्तित हुई, तो उन्होंने छात्रों की उम्र के अनुसार शैक्षिक सामग्री का लेखन और अनुवाद किया। उन्होंने पहले ही ‘साहित्य सोपान’ नामक पाठ्यपुस्तक में लेख, कविताएँ और अन्य साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित कीं, जिनमें कठिन विषयों को सरल और सहज भाषा में प्रस्तुत किया गया। साहित्य सोपान में उन्होंने कई अन्य लेखकों की रचनाएँ भी सम्मिलित कीं। वे उस समय जोरहाट नॉर्मल स्कूल में अध्यापन कर रहे थे। इसी दौरान उन्होंने असमिया पाठ्यपुस्तकों का लेखन और प्रकाशन प्रारंभ किया। इस प्रकार, उन्होंने एक असमिया प्रकाशन संस्था के विकास में योगदान दिया।
यह बात रोचक है कि उन्होंने व्यावहारिक अनुभव से शिक्षा में नवीकरण पहलुओं को समझा, इसीलिए उन्होंने इन पाठ्यपुस्तकों की रचना की और ये पाठ्यपुस्तकें इतनी सुंदर ढंग से रची गई मिलती हैं कि मैं उनमें से ‘साहित्य सोपान’ की एक कविता का विशेष बन पड़ी है
“पानी की बूँदों को देखो और देखो कैसे विशाल समुद्र बनता है,
देखो कैसे धूलिकण एकत्र होकर एक मनोहर भूमि का निर्माण करते हैं।
इसे देखो, क्या तुम समझ सकते हो कि यह अनुवाद है?”
असल में जूलिया कार्नी की कविता “Little drops of water, Little drops of sand, Make the mighty ocean, And the pleasant land.” का अनुवाद यह कविता अनुदित नहीं बल्कि मौलिक नजर आती है। बरूआ के समय जब स्वतंत्रता संग्राम अपने चरम पर था तब एक विदेशी कंपनी शैक्षणिक संस्थानों में असमिया भाषा की पाठ्यपुस्तकों की आपूर्ति कर रही थी। अपने आत्मकथा में लेखक बताते हैं कि उस कंपनी के प्रभाव को समाप्त करने हेतु, उन्होंने उन्हीं विषयों पर असमिया में पाठ्यपुस्तकें लिखीं जिन्हें वह कंपनी प्रकाशित कर रही थी। और वे हमारी स्थानीय प्रकाशन संस्था, बर्कटोकी कंपनी द्वारा प्रकाशित हुईं। शिक्षा के विस्तार का संकल्प लेकर, उन्होंने अपने पिता के नाम पर नलबाड़ी में देबीराम पाठशाला हाई स्कूल की स्थापना करने के साथ ही अपने व्यक्तिगत जीवन में वैष्णव परंपरा के अनुयायी रहने वाले बरूआ ने संत श्रीमंत शंकरदेव द्वारा प्रारंभ की गई ‘सांचीपत्र’ में प्राप्त शंकरिया साहित्य को मुद्रण में लाकर इसे एक राष्ट्रीय उत्तरदायित्व के रूप में स्वीकृत करवाया।
यह भी एक रोचक पहलू है कि असम का सामाजिक जीवन अब भी शंकरदेव, माधवदेव, या शंकरिया साहित्य की परंपरा से प्रभावित है। इस परंपरा को हरि नारायण दत्ता बरूआ ने विशेष रूप से सुदृढ़ और विस्तारित किया। उन्होंने शंकरिया साहित्य को जो विभिन्न स्थानों में बिखरा हुआ था, उसे व्यवस्थित रूप से संकलित कर साझा किया और उसका प्रचार-प्रसार किया।
असम में बरूआ के लिखे ‘भारत भ्रमण’ को उनकी चर्चित यात्रा-कथाओं में से एक स्वीकार किया जाता है। हरिनारायण (The Renaissance Man) एक सांस्कृतिक दस्तावेज है, जो केवल हरि नारायण दत्त बरूआ की जीवनगाथा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आधुनिक असम की साहित्यिक-शैक्षिक चेतना का भी समाहार प्रस्तुत करता है। उत्पल दत्ता की यह सिने-कृति भारतीय भाषाओं के साहित्यकारों के प्रति राष्ट्रीय स्मृति को समर्पित एक गंभीर प्रयास है। असमिया भाषा व अस्मिता के पुनरुत्थान में हरिनारायण की भूमिका को उजागर करता यह वृत्तचित्र निश्चय ही भारतीय प्रादेशिक सिनेमा के एक अमूल्य आयाम के रूप में देखा जाना चाहिए।
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन एक महान राष्ट्रीय जागरण का युग था। प्रत्येक भारतीय एक स्वतंत्र और सार्वभौम राष्ट्र की आकांक्षा रखता था। देश के दूरदर्शी नेताओं ने केवल स्वतंत्रता का ही नहीं, अपितु एक आत्मनिर्भर, शिक्षित एवं सांस्कृतिक गरिमा से युक्त भारत का स्वप्न देखा था। संभवतः बरूआ के इसी योगदान को केंद्र में रखते हुए डॉक्टर एन एन दत्त ने प्रोफेसर बन्दना दत्त और गरिअसी दत्त के साथ मिलकर इस 21 मिनट लंबी फ़िल्म के निर्माण में सहारा दिया। फ़िल्म दिखाती है कि इन्हीं राष्ट्रप्रेमियों में हरिनारायण दत्त बरुआ एक प्रखर व्यक्तित्व के रूप में उभरे- माटी के प्रति अटूट निष्ठा और समर्पण के प्रतीक बनकर। उन्होंने अपने अंतिम श्वास तक इसी स्वप्न को साकार करने हेतु जीवन समर्पित कर दिया। राष्ट्रनिर्माण में उनके योगदान न केवल उस कालखंड में महत्त्वपूर्ण रहे, बल्कि आज भी असम के सामाजिक जीवन पर उनकी अमिट छाप दृष्टिगोचर होती है। यह चलचित्र उनके कार्यों की आज की प्रासंगिकता को पुष्ट करता है। यह फ़िल्म एक ऐसे गुमनाम भारतीय नायक को समर्पित है, जिसने एक स्वतंत्र और शिक्षित भारत का स्वप्न देखा तथा उस स्वप्न को साकार करने हेतु अपना समूचा जीवन समर्पित कर दिया। फ़िल्म अपनी एडिटिंग की कसावट, कलरिंग और म्यूजिक के सुगठित मिश्रण में सटीक शोध का जो तड़का लगाती है वह इसे देखने योग्य बनाता है।






