प्रीतम एंड पेड्रो .शुक्र है, ओटीटी वालों को कभी-कभी कहानी की भी याद आ जाती है!
3 जुलाई को हॉटस्टार पर रिलीज़ हुई प्रीतम एंड पेड्रो फटाफट देख डाली यह कोई औपचारिक समीक्षा नहीं है। वैसे भी आजकल समीक्षा लिखना लोकतंत्र में चुनाव लड़ने जैसा हो गया है। आप चाहे जितनी ईमानदारी से लिखिए, आधे लोग आपको पक्षपाती घोषित कर देंगे और बाकी आधे पूछेंगे—“भाई, प्रमोशन के कितने पैसे मिले?”तो पहले ही साफ कर दूँ…न पैसे मिले हैं, न पॉपकॉर्न फ्री मिला है। यह सिर्फ़ एक दर्शक मात्र की खुशी है। तो कभी-कभार ओटीटी देखकर नसीब होने वाली यह खुशी जब मन में नहीं समाती है तो एक दर्शक की चाहत बनकर यूँ कागज़ पर छलक जाती है।
घबराइए मत। इसमें कोई स्पॉइलर नहीं है। हम उन लोगों में से नहीं है…जो फिल्म देखकर बाहर निकलते ही कहते हैं…“अरे, अंत में तो हीरो मारा जाता है…” और फिर मासूमियत से जोड़ देते हैं।“अरे! तुम्हे पता नहीं था क्या? माफ़ कीजियेगा।
आजकल ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म की हालत किसी ऐसे रेस्टोरेंट जैसी हो गई है जहाँ हर सब्ज़ी में एक ही मसाला डाला जाता है। कहानी कोई भी क्यों न हो शुरुआत दो गालियों से होगी, बीच में चार हत्या, दो अंतरंग दृश्य, थोड़ा ड्रग्स, थोड़ा अँधेरा, थोड़ा स्लो मोशन… और निर्देशक यह मानकर चलता है कि दर्शक तभी प्रभावित होंगे जब हर तीसरे मिनट पर उनका ब्लड प्रेशर बढ़े।
कभी-कभी तो लगता है कि स्क्रिप्ट लिखने से पहले लेखक को गालियों की न्यूनतम संख्या का लक्ष्य भी शायद दिया जाता होगा।तो ऐसे मसालेदार माहौल में प्रीतम एंड पेड्रो आती है और बिना किसी लाग – लपेट के बड़ी शालीनता से पूछती है।
“अगर कहानी अच्छी हो तो क्या तब भी इतनी सजावट ज़रूरी है?”
और जवाब खुद ही दे देती है…“अरे नहीं यार बिल्कुल नहीं।”
राजकुमार हिरानी का नाम इस एमेजोन की सीरीज़ से जुड़ा हुआ है बतौर निर्देशक… हिरानी की सबसे बड़ी खूबी हमेशा से यही रही है कि वे दर्शकों को मूर्ख नहीं समझते, वे जानते हैं कि हँसाया भी जा सकता है, रुलाया भी जा सकता है और सोचने पर भी मजबूर किया जा सकता है। वह भी बिना कान फाड़ देने वाले बैकग्राउंड म्यूज़िक और बिना कैमरे को हर पाँच सेकंड में उल्टा- पुल्टा किये बग़ैर।
बैसे आजकल की तथाकथित हिट सीरीज़ कई बार कैमरे को इतना घुमाया जाता हैं कि समझ ही नहीं आता कहानी चक्कर खा रही है या दर्शक।
बहरहाल प्रीतम एंड पेट्रो, कहानी साइबर क्राइम पर आधारित है। लेकिन राहत की बात यह है कि इसे देखकर आपको ऐसा नहीं लगेगा कि किसी आईटी कंपनी का ट्रेनिंग मॉड्यूल को देख रहे हैं। लेखक ने तकनीक को कहानी पर लादा नहीं है, बल्कि कहानी के भीतर बारीकी से पिरोया है।और यही फर्क कहानी को औसत लेखन से निकालकर श्रेष्ठ बनाता है इस सीरीज़ की सबसे बड़ी ताकत इसकी पटकथा है।
आजकल अधिकतर सीरीज़ में आठ एपिसोड की कहानी जो चार ही एपिसोड में खत्म हो सकती है, लेकिन उसे खींच खाचकर आठ एपिसोड तक ले जाया जाता है…ताकि दर्शक का सब्सक्रिप्शन एक महीना और चलता रहे।
पर यहाँ इस सीरीज़ में बिल्कुल उल्टा ही हुआ है…छह एपिसोड और बस… पर एक भी अतिरिक्त नहीं लगता। मजे की बात ये है पूरी सीरीज़ के कहीं पर भी ऐसा नहीं लगता कि लेखक महासय(महाशय) अचानक कहीं छुट्टी पर निकल लिए हों और बचीं हुई स्क्रिप्ट किसी छुटभैया लेखक महोदय के सुपुर्द कर गये हों।
हर एपिसोड खत्म होने पर मन कहता है…
“चलो… बस लगें हाथ एक और एपिसोड देख ही डालो यजमान।” यही “बस एक और” की चाहत किसी भी वेब सीरीज़ की सबसे बड़ी उपलब्धि है। कम से कम हमारी नज़र में तो।
अब बात कहानी की जान अरशद वारसी की..कुछ कलाकार अभिनय नहीं करते, अभिनय उनसे होता है। उनकी कॉमिक टाइमिंग देखकर लगता है कि हास्य उनके डीएनए में लिखा हुआ है। चेहरे के छोटे-छोटे भाव, संवादों के बीच की चुप्पी और सामान्य-सी प्रतिक्रिया भी हँसी पैदा कर देती है। आजकल जहाँ तथाकथित बुद्धिजीवी कलाकार चिल्लाकर सा फुसफुसा कर कॉमेडी करते हैं, वहाँ अरशद बस मुस्कुराकर हँसा देते हैं।
वीर हिरानी इस सीरीज़ का सुखद आश्चर्य हैं। पहले एक-दो एपिसोड में सचमुच लगा कि शायद संवाद अदायगी पर थोड़ा और काम हो सकता था। कई जगह लगा कि वे संवाद बोल नहीं रहे, बल्कि किसी मद्धम सुर में गुनगुना रहे हैं। फिर धीरे-धीरे समझ आया कि यह अभिनेता नहीं, किरदार बोल रहा है। उनकी वही लय, वही भोली-सी ईमानदारी, वही अनगढ़पन धीरे-धीरे किरदार की पहचान बन जाती है। एक नए अभिनेता के लिए इससे अच्छी शुरुआत कम ही दिखाई देती है।
हाँ, विक्रांत मैसी और बोमन ईरानी पर एक छोटी-सी शिकायत दर्ज करने का मन करता है। शिकायत उनसे नहीं, हमारी भोली सी यादों से है।
विक्रांत को देखते ही दिमाग कहता है…“भाई, यह कुछ न कुछ छिपा रहे हैं।” और बोमन ईरानी को देखकर लगता है कि अभी किसी छात्र को डाँट देंगे या कोई नया नियम सुना देंगे।
कुछ कलाकार इतने भले होते हैं कि उनके पुराने किरदार उनके साथ स्थायी रूप से चिपके हुए से लगते हैं।
कहानी का तकनीकी पक्ष बड़ा ही संतुलित लगा हमको…अब ये और बात है कि तकनीक-बकतीन के बारे में हम कुछ ज़्यादा जानते नहीं हैं।
आजकल कुछ सिनेमैटोग्राफर कैमरे के काम को इतना सुंदर बना देते हैं कि कहानी बेचारी फ्रेम के किसी कोने में मायूस सी बैठी नज़र आती है। बल्कि यहाँ पर कैमरा कहानी के साथ बराबर कदम ताल करता हुआ चलता है, उससे प्रतियोगिता नहीं करता।
बैकग्राउंड म्यूज़िक भी हर समय यह साबित करने में नहीं लगा रहता कि वही मुख्य कलाकार है। अगर सीरीज़ की कमी खोजने बैठूँ तो कहानी में कुछ मोड़ ऐसे आते हैं जिनका अनुमान दर्शकों को पहले से ही लग जाता है। लेकिन फिर अकस्मात् ख्याल आया कि आजकल दर्शक ट्रेलर देखकर ही पूरी कहानी का अंदाज़ लगा लेते हैं, यूट्यूब वाले रिलीज़ से पहले “Ending Explained” बना देते हैं, और सोशल मीडिया वाले पहले दिन ही क्लाइमैक्स वायरल कर देते हैं। ऐसे समय में अगर बेचारा दर्शक भी थोड़ा-बहुत अनुमान लगा ले तो इसमें कहानी का क्या दोष! हो सकता हैं भला। और हाँ… इस सीरीज़ की चटपटी चाट पर धनिया की गार्निशिंग करते हुए सीरीज़ में नज़र आते हैं क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग और सँजू बाबा यानी कि हमारे वयोवृद्ध अभिनेता संजय दत्त जी… बस मेहमान की तरह।
इन मेहमानों का सीरीज़ मे क्या काम है, वह आप खुद देखिए और पता कीजिए।
इतनी मेहनत तो आपको भी बनती हैं सीरीज़ प्रेमी मित्रो वरना अगली पीढ़ी यही पूछेगी…“सीरीज़ देखने की क्या ज़रूरत है, रील ही भेज दीजिए।”
कुल मिलाकर, प्रीतम एंड पेड्रो सिर्फ़ एक अच्छी सीरीज़ नहीं है, बल्कि ओटीटी की इस भीड़भाड़ वाली दुनिया में एक मीठी-सी चपत है…उन सबके लिए जो मान बैठे हैं कि दर्शक को प्रभावित करने के लिए जितना ज़्यादा शोर, उतना ज़्यादा असर। यह सीरीज़ बड़ी शांति से आकर बता देती है कि भाई, दर्शक अभी भी समझदार हैं, उन्हें हर पाँच मिनट में चौंकाने की ज़रूरत नहीं, बस एक ईमानदार कहानी दे दीजिए।
यह बिना किसी दिखावे, बिना अनावश्यक तामझाम और बिना “देखो हम कितने बोल्ड हैं” वाले आत्मविश्वास के सीधे अपनी बात कहती है। और मज़े की बात यह है कि लोग सुन भी लेते हैं।
आजकल जहाँ कई सीरीज़ खत्म होने के बाद राहत मिलती है कि चलो, जान छूटी… वहाँ यह खत्म होते ही एक अजीब-सा खालीपन छोड़ जाती है। और यही इसकी सबसे बड़ी जीत है। बैसे हमको पूरा विश्वास है कि हिरानी साहब ने जानते बूझते हुए ही दूसरे सीज़न की खिड़की खुली छोड़ दी है। बल्कि हमारा तो ये भी अनुमान है कि अगर लेखन का यही स्तर रहा तो प्रीतम एंड पेड्रो भी उन कुछ सीरीज़ो में शामिल होगी जिनके नए सीज़न का लोग कैलेंडर देखकर इंतज़ार करते हैं।
मेरी रेटिंगः तो भईया दस में से सबा दस है। बाक़ी तो… आपकी मर्जी बैसे “ऑल इज़ वेल!” तो हैं ही।
तथास्तु!!!






