ग्याहरवीं कक्षा का वह साल, जैसे किसी बंद दराज़ में रखा हुआ पीला पड़ चुका कागज़… जिसे छूते ही यादों की खुशबू उभर आती है| उम्र छोटी थी, पर दिल में दुनिया को समझ लेने की जिद्द बड़ी|
90s’ का बचपन… बस नाम लेते ही मोहल्ले की वही पुरानी हलचल कानों में गूँजने लगती है| घर की छतों पर धूप सेंकती महिलाऐं, आँगन में बिछे पापड़, गलियों में दौड़ते बच्चे, साँप-सीढ़ी से लेकर गुल्ली-डंडा, पिट्ठू, छुपन-छुपाई तक न जाने कितने खेलों की आवाजें पूरे मोहल्ले को जिंदा रखती थीं| सब एक-दूसरे के दुःख-सुख में ऐसे घुल-मिल जाते थे, जैसे किसी बड़े परिवार की अलग-अलग शाखाएँ हो|
उन दिनों मैं पड़ोस की चहल-पहल से अंजान, अपनी किताबों और सपनों में खोई रहती थी| उम्र पढ़ने की ओर झुक गई थी, खेलों की तरफ़ पीठ मोड़कर मैं अपनी कॉपियों से होते हुए अलग राह पर चल पड़ी थी|
मुझे याद है मेरे घर की गली में जितने मकान थे उनमें लगभग सबमें किरायेदार रहते थे| पूरी गली में कोई चौदह-पंद्रह मकान होंगे, तो करीबन आधे से ज्यादा घरों में किरायेदार थे| हाँ, मेरे घर में पिछले एक-दो सालों से ऐसा नही था| पता नहीं क्यों? या तो हमें आधा घर काफ़ी नहीं होगा, या अब उस आमदनी की जरुरत नहीं लग रही होगी जो किरायेदार रखने से हो रही होगी| खैर तब ये बात मेरी समझ से बाहर ही थी|
जब हम छोटे थे तो गली में किसी के यहाँ नए किरायेदार देखकर बड़े खुश होते थे| तब हमारी मित्र मंडली जासूस टोली में बदल जाती| ये पता करने के लिए कि उनके घर में कितने लोग है? बच्चें है कि नहीं? यदि हैं भी तो किस उम्र के? क्या हमारी टोली में जुड़ने लायक है कि नहीं? ताकि शाम के समय सब मिलकर जम के हो-हुल्लड़ कर सकें|
पर इस उम्र तक आते-आते पढ़ाई का बोझ बढ़ने लगा तो मेरे हमउम्र बच्चों ने गली-मोहल्ले में खेलना छोड़ दिया| कुछ इक्के-दुक्के बच्चे खेलते नज़र आते|
मैं शाम को कई बार अपने घर के बाहर वाले चबूतरे पर जाकर बैठ जाती थी, जिससे मन भी लग जाता और आते-जाते लोगों से बातचीत हो जाती| फिर पढ़ाई और टयूशन के चलते धीरे-धीरे वह भी कम हो गया|
उस दिन बाहर बैठे-बैठे पता चला कि हमारे घर के सामने के पड़ोस में एक नया परिवार रहने आया है| कौतुहलवश मैंने जानना भी चाहा कि कौन है? तो ज्ञात हुआ कि कोई बिहारी परिवार के पति-पत्नी है बस| पिछले कुछ महीने तक पास के मोहल्ले में रहते थे, अब इधर आकर रहने लगे|
अपनी पढ़ाई की व्यस्तता में मेरी उनसे कोई जान-पहचान नहीं हो पाई| एक छुट्टी के दिन जब मैं बाहर से लौटी और अपनी स्कूटी लगा रही थी तो मेरी नज़र एक कम उम्र की महिला से टकराई और हम एक-दूसरे की ओर देखकर मुस्कुरा दिए| शायद यह वही बिहारी स्त्री थी, जिसे मैंने आज गौर से देखा था|
वह उम्र में बहुत छोटी लगती थी| जैसे अभी-अभी किशोरावस्था पार की हो और अचानक जिम्मेदारियों में धकेल दी गई हो| चेहरे पर हल्की झिझक थी, पर आँखों में एक अजीब सी संजीदगी|
गोरा-गुँवई रंग, धूप में काम करते रहने से हल्का सांवला पड़ गया था| बाल तेल से चिपके और एक ढीली चोटी में बंधे हुए, जिसे वो बार बार अपने कान के पीछे करती रहती थी|
फीके रंग की सूती साड़ी जो शायद किनारों से घिस गई थी| साड़ी का पल्ला सिर पर खिंचा हुआ जैसे बचपन से ये संस्कार सिखा दिया गया हो उसे| वह मेरी माँ से थोड़ा अलग तरीके से साड़ी पहनती थी| माँग में गाढ़ा सिन्दूर, मुझसे भी छोटा कद, बिलकुल दुबला शरीर, हाथों में काँच और लोहे की कुछ चूड़ियाँ…| चेहरा अभी भी बचपन की कोमलता लिए हुए था|
फिर वो मुझे कई बार स्कूटी निकालते डालते समय दिखती और मुस्कुराती|
इतने दिनों की मौन मुलाकात में मैं उसे इतना ही जान पाई थी| इतने दिनों में मैंने उसके पति को कभी नहीं देखा था, शायद वो दिनभर किसी फेक्ट्री में जाता था|
एकबार छुट्टी वाले दिन माँ जब घर पर नहीं थी और मेरे पास भी काम नहीं था तो मैं बाहर जाकर बैठ गई| ‘संतोसी’ भी वहीं बैठी थी| ये नाम भी मुझे आज ही जान पड़ा था… उसके साथ बैठकर|
उसने मेरा नाम तीन बार पूछा तब कहीं जाकर वो ये बोल पाई थी| उसकी भाषा में कुछ बिहारी लहज़ा था| “का होत है?.. हम देख लेब|… अइसन कइसे|”
मुझसे बोली कि आपको ऐसे मोपेड चलाते देखकर अच्छा लगता है| उसके साथ आधा घंटा बातें करना मेरे लिए किसी आश्चर्य से अलग न था|
संतोसी बिहार के एक छोटे से गाँव से थी| अपने परिवार के बच्चों में से वो चौथे नंबर पर थी| मेरे एक सवाल का जवाब उससे पाकर मेरी उत्सुकता उसके प्रति बढ़ती गई|
संतोसी जी आप पढ़ी लिखी हो…|
कहाँ पढ़े लिखे.. बस अपना नाम लिख लेते है| हमारे गाँव में पढ़ने का सोचने से पहले सादी हो जाती है दीदी|
तो आपकी शादी कब हुई?
यही पिछली बरसात में|
उम्र क्या है आपकी?
“अठारह बरस पूरे कर लिए इस साल| उन्नीसवां लगो है अब..| उसके चेहरे पर एक मुस्कान थी.. और मेरे चेहरे पर आश्चर्य की परछाई|
“तुम्हें पता है तुम लगभग मेरी उमर की हो|”
“सच्ची!”
“तुम्हारी इतनी जल्दी शादी हो गई?”
“अरे शादी! इसका मत पूछो दीदी| हमारे यहाँ शादी नहीं सौदा होता है|” अब उसके चेहरे के भाव अलग थे|
मैंने भी जानना चाहा, “कैसे?”
उसने बिना संकोच कहना जारी रखा| हम चार बहनें और एक सबसे छोटा भाई मेरा चौथा नंबर| हमारे यहाँ बस शादी के लिए लड़की का होना जरुरी है.. जो मेरे बाबा के पास झोली भर के थी| वो कहते है न “बेटी पराया धन होती है|” मेरी तीन बहनों का ब्याह भी ऐसे ही हुआ| जब मैं पंद्रह-सोलह साल की थी तब से घर में ये ही चर्चा होने लगी| उम्र, पढाई, मन.. कुछ भी नहीं पूछा जाता हमारे यहाँ| जो भी लड़के वाले हो वो अपनी हैसियत के हिसाब से गरीब माँ-बाप को उसका पैसा देकर लड़की ब्याह ले जाते है| लड़का कैसा दिखता है.. क्या करता है.. ये सब उस लड़की की किस्मत|
बस एक दिन चुपके से माई ने कान में कहा- “बिटिया, तोहार बियाह तय हो गेल बा|” कुछ हजार रुपये, थोड़ी-सी बातचीत और सौदा तय| उम्र पूछने की किसी को फुर्सत ही कहाँ थी? वहाँ तो सब कहते है- “लडकिया बोझ हई, जल्दी निपट देल ठीक होई|”
“तुमने मना नहीं किया?” शायद मेरा सवाल ही गलत था|
वो बस मुस्कुरा दी|
“मेरे बाबा को तो इसके लिए बाकि तीन बहनों से ज्यादा ही मिला| पूरे पचत्तर हजार.. और बस हम ब्याह दिए गए अपने से लगभग दोगुने उमर के लड़के से|
“तुम्हारे पति कैसे है?”
वो बहुत बढ़िया आदमी है| हमारा पूरा ख़याल रखता है| कभी कुछ नहीं कहता| बहुत प्यार से रखता है| जिनसे मेरी शादी हुई वह बाकि मर्दों के स्वभाव से अलग है| बाहर से कठोर दिखते है पर बहुत समझते है मुझे| हमार दो बहनों के पति तो उनको मारते पीटते भी है|”
“बिहार से यहाँ कैसे आ गए?”
“काम धंधा इधर ले आया| वहाँ कमाई कम है| यहाँ जब से आए है उधर जाना ही नहीं हो पाया| करीब दो साल होने को है माई से मिली नहीं| बस कभी-कभी वो बहुत याद आती है|”
“आप प्रेगनेट हो?”
“का?”
“पेट से हो?” मुझे ये सवाल पूछने में बहुत हिचकिचाहट हुई| पर रहा नहीं गया| उसकी पतली दुबली काया में थोड़ा आगे आया हुआ पेट मुझे बार-बार ये पूछने को मजबूर कर रहा था|
“हाँ! छठां महीना उतरने को है|” उसके चेहरे पर इस बात की चमक थी|
इतने में माँ आ गई और मुझे अंदर जाने की आवाज भी उन्होंने लगा दी| जाते-जाते उसने मुझे कहा- “दीदी आपके घर में ठीकरी होगी क्या?”
ठीकरी होती क्या है वो मुझे सच में नहीं पता था, इसलिए उससे पूछ बैठी , “ये क्या होता है?”
उसने समझाया, “टूटी हुई मटकी के टुकड़े.. या मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े..|”
मैंने कहा- “वो तो नहीं है पर हाँ छत पर मिट्टी के दीये जरुर पड़े है पिछली दिवाली के|”
उसने कहा- “हाँ-हाँ! वही ला देना मुझे|”
मैंने आश्वासन दिया कि कल ट्युशन जाते समय दे जाऊँगी| और मैंने याद रख के ऐसा किया भी| छत से पाँच-सात दीये लाकर उसे दे दिए| जिसे पाकर वह खुश थी|
अगले एक-दो दिन अपनी व्यस्तता से मैं उससे नहीं मिली| पर उसकी बातें मेरे अंतर्मन में कई बार घूमती रहीं| जहाँ मैं अपना कमरा अपना सामान नहीं संभाल पाती वहाँ वो खुद को हर हाल में संभाल रही है| आज 21वीं सदी मर भी लड़कियों की किस्मत ऐसे क्यों लिखी जाती है|
उस दिन दोपहर को पड़ोस की शर्मा आंटी मम्मी से मिलने आई तो मैं भी पास में बैठी उनकी बातें सुनने लगी| उनकी बातों से पता चला कि संतोसी को बचपन से ही पकी हुई मिट्टी खाने का शौक है| वो छुप-छुपाकर पकी मिट्टी के टुकड़े खाती रहती है| पेट से होने की वजह से डॉक्टर ने उसे ऐसा करने से माना किया है तो उसके पति ने अपने घर से सारी ठिकारियाँ बाहर फेंक दी और मकान मालकिन को भी इसके बारे में बताया था| पर ये पागल लड़की इधर-उधर से माँग लाती है|
कुछ दिन पहले शर्मा आंटी से भी माँगे थे पर उन्होंने टाल दिया| तभी मैंने अपने-आप को स्वयं दोषी मानते हुए उन्हें सच्चाई बताई कि कल ही मैंने उसे हाथ भर के दीये लाकर दिए थे|
मेरी बात सुन कर दोनों ने अपना सिर पकड़ लिया| और मुझे भी महसूस हुआ कि अनजाने में मैंने कितना बड़ा पाप कर दिया|





