माँ के घुटने का दर्द अब उन्हें और भी ज़्यादा परेशान करने लगा था और अब वे चलते समय दीवार का सहारा लेने लगी थीं। धीरे-धीरे दीवारों पर उनकी उँगलियों के निशान उभरने लगे थे, मानो चुपचाप उनकी निर्भरता और कमज़ोरी की कहानी कहने वाले निशान अपनी छाप छोड़ने लगे थे। परिवार में रहने वाले हर सदस्य को यह बिल्कुल पसंद नहीं था। वे अक्सर शिकायत भी करते कि दीवारें गंदी हो रही हैं। एक दिन माँ को सिर में दर्द था, उन्होंने सिर पर तेल लगाया और चलते हुए दीवारों का सहारा भी लिया, जिससे तेल के दाग भी दीवारों पर लग गए। सभी ने नाराज़गी जताई तो मैंने भी ग़ुस्से में माँ को डांट दिया। कठोर शब्दों में कहा कि इस तरह वे दीवारों को छूते हुए न जाएँ। माँ चुप हो गईं। उनकी आँखों में दर्द था। मैं भी शर्मिंदा थी, पर और कुछ कह नहीं पाई।
उस दिन के बाद माँ ने दीवार का सहारा लेना छोड़ दिया। उन्होंने पहिए वाली कुर्सी का सहारा लिया और अब दीवार का सहारा न लेकर कुर्सी की मदद से ही घर के हर कोने में चलना शुरू कर दिया। पर उस दिन के बाद से मेरे दिल में गहरा पछतावा था। मैं उनकी वो नज़रें कभी नहीं भूल पाई—न ही खुद को कभी माफ़ कर पाई।
कुछ समय बाद हमने घर पेंट करवाने का सोचा। पेंटर आए तो मेरा बेटा, जो अपनी नानीजी से बहुत प्यार करता था, दीवार के उन हिस्सों को पेंट नहीं करने देना चाहता था, जहाँ नानीजी के हाथों के निशान थे। जब पेंटर ने उसकी बात समझी तो उसने भी अपनी कलात्मकता का जादू चलाया। पेंटर भी बहुत समझदार और रचनात्मक थे। उन्होंने आश्वासन दिया कि वे उन निशानों को नहीं मिटाएँगे, बल्कि उनके चारों ओर सुंदर गोल डिज़ाइन बना देंगे ताकि वे दीवार की सजावट का हिस्सा बन जाएँ। और ऐसा ही हुआ। धीरे-धीरे वे निशान हमारे घर की पहचान बन गए। जो भी घर आया, दीवार के उस हिस्से की तारीफ़ किए बिना नहीं रह पाया—बिना ये जाने कि उसके पीछे की क्या कहानी है।
समय बीतता गया। अब मेरी भी उम्र होने लगी थी। एक दिन चलते समय अचानक सिर चकराया और मुझे भी दीवार का सहारा लेना पड़ा। तभी मुझे याद आया कि मैंने माँ से क्या कहा था, और मैंने खुद को सहारे के बिना चलाने की कोशिश की। मेरा बेटा ये देख रहा था। वह तुरंत मेरे पास आया और बोला, “मम्मी, दीवार का सहारा लीजिए, आप गिर सकती हैं।” और फिर मेरा बेटा दौड़कर आया और बोला, “आप मेरे कंधे का सहारा लीजिए।” इतना सुनते ही मेरी आँखों से आँसू बहने लगे। काश, मैंने भी अपनी माँ के लिए यही किया होता… शायद उस वक्त वे भी हमारे साथ खुशी-खुशी अपनी तकलीफों को सहारा बना लेतीं।
बेटे ने हाथ पकड़कर मुझे सोफ़े पर बिठाया। फिर मेरी पोती अपनी ड्रॉइंग बुक ले आई। उसने मुझे दिखाया कि उसकी टीचर ने उसकी पेंटिंग की बहुत तारीफ़ की थी। मैंने गौर से देखा, उस तस्वीर में वही दीवार थी—जिस पर माँ के उँगलियों के निशान थे। नीचे टिप्पणी थी:
“हर बच्चा अपने बड़ों से ऐसे ही प्यार करे।” मैं अपने कमरे में गई और मन ही मन माँ से माफ़ी माँगते हुए बहुत रोई। धीरे-धीरे एक दिन हम सभी भी बूढ़े होंगे। हम सभी ने शायद कभी न कभी कोई गलती ज़रूर की है। समय के साथ-साथ अब हमें भी सुधरने की आवश्यकता है।






