1995 पंजाब, सतलुज से जुड़ा हिंदुस्तान का एक उत्तरी हिस्सा जहाँ इमरजेंसी के दौर को पूरे 10 साल से ज्यादा हो चुके थे। पुलिस ओर मिलिटेंस के बीच लगातार चल रही इस जद्दोजहद से पूरा पंजाब थक चुका था। जहाँ एक तरफ पुलिसफ़ोर्स इस मिलिटेंस को हराने में लगी हुई थी वहीं दूसरी तरफ कुछ पुलिस वाले इस मौके का पूरा फायदा उठानेमें लगे हुए थे। उन्होंने मिलिटेंस और सिविलियंस के बीच फ़र्क करना बंद कर दिया था। इसका खामियाजा पूरा पंजाब भुगत रहा था। खेतों में फसलें उगने से डरती थीं, पत्ते बिना हवा के थरथराते थे। वर्दी और दहशतगर्दी के इस माहौल में अब दरिया भी उल्टे बहने लगे थे। बहती हुई लाशें बहता हुआ इतिहास होती हैं, वो कभी आंकडें नहीं बन पाती। उनमें पानी भर जाता है, वो डूब जाती हैं और उनके साथ डूब जाते हैं इंसाफ, आस और इतिहास।
“सतलुज” जैसी फ़िल्म पर लिखने के लिए उसके इस वॉइस ओवर से ही आपको सब कहानी और इतिहास का अंदाज लग जाता है। फ़िल्म कहती है कि- स्याह पन्ने पर लिखा हुआ काला सच जो ना दिखाई देता है ना पढ़ा जाता है। फ़िल्म का यह संवाद इसी पर भारी पड़ गया और इसे मात्र 48 घंटे में ही जी फाइव ओटीटी से हटा दिया गया हमेशा के लिए। कायदे से बॉलीवुड में फ़िल्में ढंग की कम ही बन रही हैं उस पर भी ऐसी फ़िल्मों को जब बड़ा पर्दा नसीब ना हो फिर वे ओटीटी की ख़ाक छानने लगें और वहां से भी हटा दी जाएं तो सिने-प्रेमियों के लिए आहत होना जरुरी है।
पंजाब भारत का वो राज्य जिसने आज़ादी के बाद देश का सबसे बड़ा जेनोसाइड देखा, नदियों के पानी मसला देखा, आनंदपुर साहिब और चौरासी के दंगे झेले, आपातकाल की आग में झुलसा, मुख्यमंत्री की हत्या से लेकर जसवंत सिंह तक के मसले देखे। 1995 के पंजाब के पट्टी, दुर्ग्याना और तरनतारन के कई शमशान से 25 हजार से ज्यादा लावारिस लाशों का मुद्दा उठता है। जसवंत सिंह जो एक मामूली नौकरी करता है बैंक में किस तरह वह इस जेनोसाइड को रोकने के लिए आव़ाज उठाता है और उसकी पुकार पहुँचती है विदेशों तक, ह्यूमनराइट्स कमिशन और वैश्विक स्तर तक पंजाब का नाम उछलने लगता है। जसवंत सिंह और ह्यूमनराइट्स जो सिर्फ़ चंद पुलिस वालों के खिलाफ़ आवाज उठा रहे हैं जिन्होंने अपनी तरक्की के लिए इंसानियत की सारी हदें पार कर 25 हजार से ज्यादा लोगों को आतंकी कह उन्हें मार दिया।
यह फ़िल्म उस दीपक की भांति बाहर आती है जो अकेला होकर भी पूरी दुनिया में रौशनी फैलाना चाहता है। जब जसवंत सिंह क्लाईमैक्स के एक सीन में कहता है- जब पहली बार सूरज अस्त हुआ और अँधेरा छा रहा था तो दुनिया को लगा की अब अँधेरा हमेशा रहेगा। लोग डर गए थे और उम्मीद छोड़ने लगे थे। तभी दूर किसी छोटी सी झोपड़ी में दीपक ने सर उठाया और कहा “मैं अँधेरे को चैलेंज करता हूँ।” अँधेरा चाहे कितना भी गहरा क्यों ना हो मैं अपने आस-पास उजाला फैलाऊंगा। उस दीपक की हिम्मत देख सभी झोंपड़ियों में दीपक जल उठे और दुनिया हैरान रह गई कि उन सबने मिलकर अँधेरे को हरा दिया।
जसवंत सिंह के संवाद के ठीक ऐसे ही यह फ़िल्म है जो बॉलीवुड में पसरे अँधेरे को उजाले की ओर ले जाने की कोशिश करती है। लेकिन आज भी कुछ लोगों को यह मंजूर नहीं की उजाला हो। कुछ लोग आज भी इस दुनिया को जसवंत सिंह के केस को जैसे अँधेरे में रखा ठीक वैसे ही रखना चाहती है।
उस दौर में न जाने कितने ही ऐसे पुलिस वाले रहे होंगे जो नौकरी छोड़ देना चाहते हों लेकिन उनके लिए 311 का पर्चा भरना भारी था। क्योंकि इसे वे भरते तो या तो वो हमेशा के लिए उन 25 हजार लोगों के जैसे मारे जाते या डिसअपीयर हो जाते। पंजाब का इतिहास उठाकर देखें तो 1995 के उस स्याह दौर में पुलिस कहती रही कि ये लोग यूरोप, अमेरिका में जाकर दिहाड़ी, मजदूरी या टैक्सी चलाकर अपना और अपने परिवार का पेट पाल रहे हैं। तो वहीं ह्यूमनराइट्स पूछता रहा कि- अगर ये लोग विदेशों में कमाई कर रहे हैं तो उनके नाम वीज़ा फाइलों की जगह शमशान घाट के रजिस्टरों में क्यों दर्ज है?
फ़िल्म पहले ही सीन से जो सवाल उठाती है उसे अपने आख़िर तक बनाये भी रखती है। फ़िल्म बताती है कि कुलजीत सिंह हाईकोर्ट में गवाही देते उसके पहले अपने घर में मृत पाए गये। जसवंत सिंह के अपहरण और गैर-न्यायिक हत्या के मामले में पाँच दोषी पुलिस वालों को उम्रकैद दिलाने में कुलजीत की गवाही बेहद महत्वपूर्ण रही। इस फ़िल्म को लेकर शक भी होता है यहीं आकर कि अगर हाईकोर्ट में ब्यान देने के पहले कुलजीत सिंह मृत पाए गये तो फ़िल्म में जो आलिशान कोर्ट दिखाया गया है क्या वो सेशन कोर्ट है? फिर सवाल यह भी उठना लाजमी है कि यह सेशन कोर्ट है तो हाईकोर्ट इससे भी ज्यादा आलिशान रहा होगा उस समय पंजाब में? फिर आज तक भारत की किसी भी फ़िल्म में कायदे के कोर्ट सीन फ़िल्माए ही नहीं जा सके। पंजाब छद्म-युद्ध की आग में बरसों जला है यह जग-जाहिर है। जिसमें हजारों पुलिस के जवान और सैनिकों के साथ महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग मारे गए। जसवंत सिंह की पत्नी आज भी उन हजारों लोगों को न्याय दिलाने में लगी हुई हैं। जसवंत सिंह की याद में आज भी देशभर में शहीद दिवस बनाया जाता है। लेकिन क्या कारण है कि जसवंत सिंह के साथ उन हजारों लोगों को आज भी न्याय नहीं मिल पाया? फ़िल्म यह सवालिया निशान जरूर छोड़ जाती है।
फ़िल्म “सतलुज” तकनीकी, लिखावट, अभिनय सभी मामलों में कसी होने के तथा बार-बार आपकी आँखों को नम करने, कई सीन में आपके रोंगटे खड़े करने के बावजूद कोर्ट के सीन के साथ लिखाई के कुछ पन्ने कोरे और अधूरे छोड़ देती है। और आधा सत्य झूठ ही होता है यह भी इस फ़िल्म वालों को समझ लेना चाहिए। फ़िल्म का ओटीटी से हटाया जाना बेहद निराशाजनक तो है लेकिन क्या इस बात की आशंका मात्र के लिए कि यह फ़िल्म फिर से किसी जेनोसाइड को अंजाम दे सकती है इस बात के लिए उसे हटाया जाए तो यह आशंका भी निर्मूल साबित होती है इसे देखते हुए। जिस देश और राज्य ने इतना कुछ देखा और झेला हो वह अब 21 सदी के दौर में एक और बड़ा जेनोसाइड एक फ़िल्म के बिहाव पर तो नहीं करेगा। फ़िल्म बार-बार सिख धर्म के दसवें गुरु द्वारा रचित चंडी चरित्र का एक हिस्सा पढ़ती जाती है-
देह सिवा बरु मोहि इहै, सुभ करमन ते कबहूँ न टरों॥
न डरों अरि सो जब जाइ लरों, निसचै कर अपनी जीत करों॥
लेकिन ओटीटी पर बैन के बाद इसे बनाने वालों ने कोई खास जद्दोजहद क्यों नहीं की जिससे इसे आमजन तक पहुंचाया जा सके? क्या फ़िल्म को बनाने वाले दसवें गुरु की रचना को ही भूल गए? हालांकि यह फ़िल्म अँधेरे को चैलेंज तो करती है लेकिन अफ़सोस इसका दीपक दुनिया को रौशनी दिखा पाता उसके पहले ही बुझ गया। यही वजह है कि सतलुज जैसी फ़िल्में आव़ाज तो उठाती हैं कहीं-न-कहीं लेकिन इतिहास नहीं बना पाती।
अपनी रेटिंग- 3.5







