बृजेश प्रसाद हिंदी के युवा आलोचक और लोक साहित्य के गंभीर अध्येता हैं। इन्होंने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से एम.ए., सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ गुजरात से एम.फिल. और प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय, कोलकाता से पीएच.डी. की है। देश-विदेश की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में निरंतर लेखन के माध्यम से वे समकालीन साहित्यिक विमर्श में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
तेजस पूनियां – बंगाल, जो कभी अपनी समृद्ध सांस्कृतिक, शैक्षिक और ऐतिहासिक विरासत के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध रहा है वो पिछले 2-3 दशकों में आपको किस तरह बदला हुआ नजर आता है?
बृजेश प्रसाद – ये सच है कि बंगाल अपनी समृद्ध सांस्कृतिक, शैक्षिक और ऐतिहासिक विरासत के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध रहा है लेकिन अब यह बंगाल कई स्तरों पर उपेक्षा का शिकार प्रतीत होता नजर आता है। विरासत के रूप में विक्टोरिया मैमोरियल, राष्ट्रीय पुस्तकालय, चिड़िया घर, इन्डियन म्यूजियम, बैरकपुर जहाँ इंडियन रिबेलियन ऑफ़ 1857 की चिंगारी भड़की और मंगल पाण्डेय जैसे महान स्वतंत्रता सेनानी ने इतिहास रचा, वहाँ उनके नाम पर एक सुसंगठित संग्रहालय या प्रभावशाली स्मारक तक का अभाव खटकता है और इन जैसे जैसे भव्य स्थलों की उपस्थिति के बावजूद समुचित विकास का अभाव भी स्पष्ट दिखाई देने लगा है। इसी प्रकार, सुरेन्द्र नाथ बैनर्जी और रवीन्द्रनाथ टैगोर जैसे महान व्यक्तित्वों से जुड़े स्थानों के आसपास की अव्यवस्था और गंदगी हमारे सांस्कृतिक दृष्टिकोण पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
दक्षिणेश्वर काली मंदिर, कालीघाट शक्तिपीठ जैसे धार्मिक स्थलों के आसपास भी अपेक्षित स्वच्छता और प्रबंधन का अभाव दिखाई देता है। परंतु इन सब से भी अधिक चिंताजनक स्थिति बंगाल की शिक्षा व्यवस्था की है। यहाँ भाषा एक बड़ी बाधा बनकर उभरती है- छात्र या तो बांग्ला माध्यम में पढ़ते हैं या अंग्रेज़ी माध्यम में। जो विद्यार्थी न तो बांग्ला में सहज हैं और न ही अंग्रेज़ी में दक्ष, वे बीच में ही छूट जाते हैं। यह एक गंभीर संरचनात्मक समस्या है। फिर यहाँ सामाजिक स्तर पर भी ज्यादा बदलाव नहीं हुए, बस लोग किसी तरह जी रहे हैं। इस बीच कई राजनीतिक कारण भी रहे, सरकारें बदलती रहीं लेकिन कई चीज नहीं बदली तो मुंबई टाइप का गुंडा राज। हालांकि बंगाल रहने और सरकारी यातायात के मामले में, कई चीजों के खान-पान के मामले में बहुत ही सस्ता रहा है हमेशा से। लेकिन इसके अतिरिक्त, विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में योग्य शिक्षकों का अभाव है। जो शिक्षक उपलब्ध हैं, उन्हें अत्यंत कम मानदेय दिया जाता है कई स्थानों पर एक व्याख्यान के लिए ₹200-₹300 तक। यह न केवल शिक्षकों के प्रति अन्याय है बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है। प्रेसिडेंसी यूनिवर्सिटी (पूर्व में हिंदू कॉलेज) जैसी संस्थाएँ, जिन्होंने स्वामी विवेकानंद, राजेन्द्र प्रसाद, अमृत्य सेन और अभिजीत बैनर्जी, बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय, हेनरी विवियन डेरोजियो, माइकल मधुसूदन दत्त, अमृत लाल बोस जैसे महान व्यक्तित्व दिए. यह हमारी धरोहर की पहचान है लेकिन यह प्रश्न उठता है कि हम कब तक अपने अतीत की महिमा का ही गुणगान करते रहेंगे? इतिहास को स्मरण करना आवश्यक है परंतु उससे भी अधिक आवश्यक है- नए इतिहास का निर्माण।
तेजस पूनियां – बंगाल की वैचारिकी और उसके विस्तार को आप एक बंगाली होने के नाते किस तरह देखते हैं?
बृजेश प्रसाद – आज का युग वैश्वीकरण और तकनीकी क्रांति का युग है। हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ भौगोलिक सीमाएँ सिमट गई हैं और एक मोबाइल फोन के माध्यम से पूरी दुनिया हमारी मुट्ठी में है। ऐसे में केवल अतीत का गौरव-गान पर्याप्त नहीं है। इसे हमें कई तरह से देखना होगा मसलन-
1. इतिहास बनाम नव-निर्माण- इतिहास हमें पहचान देता है, परंतु भविष्य निर्माण के लिए केवल इतिहास पर्याप्त नहीं। यदि हम केवल अज्ञेय, मुक्तिबोध, प्रेमचंद और नागार्जुन जैसे स्थापित नामों तक सीमित रहेंगे तो नए रचनाकारों और विचारकों के लिए स्थान कहाँ बचेगा?
2. नई प्रतिभाओं का अभाव क्यों?- साहित्य, शिक्षा और अकादमिक जगत में एक प्रकार की “स्थापितता की राजनीति” काम करती है जहाँ केवल प्रसिद्ध नामों को प्राथमिकता दी जाती है। इससे नए लेखकों, शोधकर्ताओं और विचारकों को अवसर नहीं मिल पाता।
3. शिक्षा सुधार की अनिवार्यता- बहुभाषिक शिक्षा प्रणाली (Multilingual Education) को बढ़ावा देना, शिक्षकों को उचित वेतन और सम्मान, शोध और नवाचार को प्रोत्साहन, स्थानीय इतिहास और समकालीन मुद्दों को पाठ्यक्रम में शामिल करना।
4. विरासत का संरक्षण और उपयोग- विरासत केवल देखने की चीज़ नहीं बल्कि उससे सीखकर वर्तमान को समृद्ध करने का माध्यम है। यदि ऐतिहासिक स्थलों का संरक्षण और समुचित प्रबंधन किया जाए, तो यह न केवल सांस्कृतिक चेतना को बढ़ाएगा बल्कि पर्यटन और अर्थव्यवस्था को भी सशक्त करेगा।
आप कह सकते हैं कि बंगाल की स्थिति केवल आलोचना का विषय नहीं बल्कि सुधार और नव-निर्माण का अवसर भी है। हमें अपने अतीत का सम्मान करते हुए, उससे प्रेरणा लेकर, नए विचारों, नई प्रतिभाओं और नई नीतियों के माध्यम से एक नया इतिहास रचना होगा। इतिहास को ढोना नहीं, उससे आगे बढ़ना ही सच्ची श्रद्धांजलि है।
तेजस पूनियां – बंगाल में पिछले दो-तीन दशकों के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिवर्तन को आप किस तरह देखते हैं?
बृजेश प्रसाद – पिछले लगभग तीस वर्षों में बंगाल का स्वरूप अनेक स्तरों पर बदला है किन्तु यह परिवर्तन समान रूप से गहरा और व्यापक नहीं कहा जा सकता। कुछ क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति हुई है, तो कई क्षेत्रों में ठहराव या अपेक्षाकृत धीमी गति से विकास देखने को मिलता है।
बंगाल का समाज परंपरागत रूप से संवेदनशील, सांस्कृतिक रूप से समृद्ध और बौद्धिक चेतना से युक्त रहा है। आज भी यहाँ पारिवारिक संस्कार, शिष्टाचार और सांस्कृतिक अनुशासन अपेक्षाकृत मजबूत हैं। मातृभाषा (बांग्ला) के प्रति गहरा लगाव तथा बच्चों को उसी माध्यम से सांस्कृतिक शिक्षा देने की परंपरा कायम है। हालाँकि, शहरी जीवन में एक प्रकार का व्यक्तिगत अलगाव भी बढ़ा है। लोग अपने निजी दायरे तक सीमित रहते हैं। दूसरी ओर, प्रवासनके कारण विविध सामाजिक समूहों का मिश्रण हुआ है, जिससे सामाजिक संरचना अधिक बहुलतावादी तो बनी है, पर कुछ स्थानों पर तनाव और अव्यवस्था की स्थितियाँ भी उत्पन्न हुई हैं।
आर्थिक दृष्टि से बंगाल में अपेक्षित औद्योगिक विकास नहीं हो पाया। रोजगार के अवसर सीमित हैं और निजी क्षेत्र का विस्तार उतना नहीं हुआ जितना अन्य विकसित राज्यों में देखा जाता है। परिणामस्वरूप, युवाओं का बड़े पैमाने पर पलायन हुआ है- वे बेहतर शिक्षा और रोजगार के लिए देश के अन्य हिस्सों या विदेशों की ओर जाते हैं। फिर भी, स्थानीय स्तर पर जीवन-यापन अपेक्षाकृत सस्ता है। चावल, मछली, सब्ज़ियाँ आदि स्थानीय उत्पाद सुलभ और किफायती हैं, जिससे निम्न और मध्यम वर्ग का जीवन किसी हद तक संतुलित रहता है। यह आर्थिक “संतोष” कई बार व्यापक असंतोष या आंदोलन की तीव्रता को भी कम कर देता है।
राजनीतिक रूप से बंगाल ने एक लंबा वामपंथी शासन (लगभग तीन दशकों तक) देखा, जिसके बाद वर्तमान शासन ने सत्ता संभाली। सत्ता परिवर्तन के बावजूद आम जनजीवन में अपेक्षित तीव्र बदलाव नहीं दिखाई देता। कुछ क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर राजनीतिक हिंसा, गुटबाज़ी और असामाजिक तत्वों की सक्रियता की शिकायतें सामने आती हैं। हालांकि, यह भी सत्य है कि राजनीति का स्वरूप स्थानीय जनसंख्या, सामाजिक समीकरण और चुनावी रणनीतियों पर निर्भर करता है। केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय की कमी को भी विकास में बाधा के रूप में देखा जाता है। कई बार वित्तीय संसाधनों और योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर आरोप-प्रत्यारोप होते रहते हैं, जिससे विकास की गति प्रभावित होती है।
शिक्षा के क्षेत्र में गिरावट एक गंभीर मुद्दा बनकर उभरा है। सरकारी विद्यालयों की स्थिति कई स्थानों पर संतोषजनक नहीं है- शिक्षकों की कमी, अधोसंरचना का अभाव और गुणवत्ता में गिरावट स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। उच्च शिक्षा के स्तर पर भी, यद्यपि कुछ प्रतिष्ठित संस्थान मौजूद हैं, पर व्यापक स्तर पर गुणवत्ता को लेकर चिंताएँ बनी हुई हैं। यही कारण है कि अनेक अभिभावक अपने बच्चों को राज्य के बाहर बेहतर संस्थानों में भेजना पसंद करते हैं।
सांस्कृतिक दृष्टि से बंगाल आज भी अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है। साहित्य, संगीत, नाटक और कला के क्षेत्र में यहाँ की परंपरा अत्यंत समृद्ध है। दुर्गा पूजा जैसे उत्सव न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक हैं बल्कि सामुदायिक एकता और सांस्कृतिक जीवंतता का भी उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। घर-घर में साहित्यकारों और कलाकारों की विरासत- गीत, कविताएँ, नाटक आज भी जीवित है। छोटे-छोटे सांस्कृतिक मंचों और क्लबों के माध्यम से नियमित आयोजन होते रहते हैं, जो इस परंपरा को आगे बढ़ाते हैं।
बंगाल की ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत अत्यंत समृद्ध है, किन्तु इनका संरक्षण हमेशा संतोषजनक नहीं रहा है। कुछ प्रमुख स्थलों का हाल के वर्षों में विकास हुआ है पर अनेक स्थान अब भी उपेक्षा का शिकार हैं। धार्मिक स्थलों के प्रबंधन और राजनीतिक हस्तक्षेप को लेकर भी समय-समय पर बहस होती रही है। यह स्पष्ट है कि इन धरोहरों के संरक्षण और सुव्यवस्थित विकास के लिए दीर्घकालिक दृष्टि और निष्पक्ष प्रशासनिक प्रयासों की आवश्यकता है।
समग्र रूप से कह सकते हैं कि बंगाल एक ऐसे संक्रमणकाल से गुजर रहा है, जहाँ उसकी सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक आधार मजबूत हैं पर आर्थिक विकास, शिक्षा, प्रशासनिक सुधार और औद्योगिक प्रगति के क्षेत्रों में अभी भी व्यापक सुधार की आवश्यकता है। यदि इन क्षेत्रों में संतुलित और दूरदर्शी नीतियाँ लागू की जाएँ, तो बंगाल पुनः अपने ऐतिहासिक गौरव और प्रगतिशील पहचान को सुदृढ़ रूप में स्थापित कर सकता है।







