शाम का धुँधलका धीरे-धीरे शहर पर उतर रहा था।
मोबाइल स्क्रीन पर ‘नो नेटवर्क’ का सूखा-सा वाक्य चमक रहा था।
जैसे किसी ने संवाद के सारे दरवाज़े बंद कर दिए हों।
आरव ने झुँझलाकर फोन मेज़ पर पटक दिया।
यह तीसरी बार था जब उसकी मीटिंग ‘नेटवर्क इश्यू’ के बहाने स्थगित हुई थी।
लेकिन क्या सचमुच यह केवल नेटवर्क का मामला था? या कुछ और भी था—जो अदृश्य था, अनकहा था, और कहीं भीतर बहुत गहराई में उलझा हुआ था?
आरव एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करता था। उसकी ज़िंदगी ईमेल, कॉल, और वीडियो कॉन्फ़्रेंस के बीच सिमट गई थी।
हर संबंध ‘ऑनलाइन’ था—परंतु हर भावना ‘ऑफ़लाइन’।
उस दिन, जब नेटवर्क बार-बार गायब हो रहा था, उसने पहली बार खिड़की खोली।
बाहर बारिश हो रही थी।
बूंदों की टप-टप में एक अजीब-सी सच्चाई थी—जिसे कोई नेटवर्क बाधित नहीं कर सकता था।
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई।
“भैया, आपका वाई-फाई काम नहीं कर रहा क्या?” सामने खड़ा था पंद्रह- सोलह साल का लड़का—सुमित, जो उसी बिल्डिंग में अख़बार बाँटता था।
“हाँ, नहीं चल रहा,” आरव ने अनमने भाव से कहा।
“मैं देख दूँ?” उसने सहजता से पूछा।
आरव ने पहली बार गौर से उसे देखा—उसकी आँखों में आत्मविश्वास था, और चेहरे पर एक अनगढ़ मुस्कान।
“तुम्हें आता है?”
“हाँ, थोड़ा-बहुत… नेटवर्क का काम करता हूँ।”
सुमित ने राउटर के तारों को इधर-उधर किया, सेटिंग्स देखीं, और कुछ ही मिनटों में इंटरनेट वापस आ गया।
“हो गया,” उसने मुस्कुराते हुए कहा।
“अरे वाह!” आरव चकित था।
“तुम तो बड़े एक्सपर्ट हो!”
“बस, सीख लिया… ज़रूरत थी।”
“ज़रूरत?”
“हाँ,” सुमित ने थोड़ी देर चुप रहकर कहा, “माँ गाँव में रहती हैं… उनसे बात करने के लिए।
वहाँ नेटवर्क ठीक नहीं रहता, तो यहाँ सब ठीक रखना पड़ता है।”
आरव कुछ क्षणों के लिए निःशब्द हो गया।
उसे याद आया—उसने कब आख़िरी बार अपने माता-पिता से बिना किसी काम के बात की थी? शायद महीनों पहले… या उससे भी पहले।
उसका नेटवर्क हमेशा ‘फुल’ रहता था—लेकिन संबंधों की सिग्नल स्ट्रेंथ शून्य के आसपास भटकती रहती थी।
“तुम रोज़ अख़बार बाँटते हो?”
“हाँ, सुबह। फिर दिन में काम… और रात को पढ़ाई।”
“थक नहीं जाते?”
“थकान तो होती है, पर बात कर लेते हैं तो सब ठीक हो जाता है,” सुमित ने सहजता से कहा।
“किससे?”
“माँ से… और कभी-कभी खुद से भी।”
यह उत्तर आरव के भीतर कहीं गूंज गया।
उसने महसूस किया—वह वर्षों से खुद से बात नहीं कर पाया था। हर संवाद ‘नेटवर्क’ के सहारे था—लेकिन आत्मसंवाद का कोई सिग्नल नहीं था।
“चाय पियोगे?” आरव ने अचानक पूछा।
सुमित चौंका—”आपके पास समय है?”
यह प्रश्न जैसे आरव के भीतर एक आईना बन गया।
“हाँ,” उसने धीमे स्वर में कहा, “आज नेटवर्क का बहाना है।”
दोनों खिड़की के पास बैठ गए।
बाहर बारिश अब भी जारी थी।
“भैया,” सुमित ने चाय का घूँट लेते हुए कहा, “आप लोग बड़े अजीब होते हैं। सब कुछ है—फोन, इंटरनेट, पैसे… फिर भी बात नहीं करते।”
“और तुम?”
“हमारे पास कुछ नहीं होता, तो हम बात कर लेते हैं।”
यह वाक्य किसी गहरे सत्य की तरह कमरे में ठहर गया।
आरव ने अपना फोन उठाया।
स्क्रीन पर फिर से ‘नो नेटवर्क’ का संदेश आ गया था।
लेकिन इस बार वह मुस्कुरा रहा था।
उसने फोन को साइड में रख दिया और कहा—
“चलो, आज बिना नेटवर्क के ही बात करते हैं।”
सुमित हँस पड़ा—”भैया, असली नेटवर्क तो यही है।”
उस रात, पहली बार, आरव ने महसूस किया कि ‘नेटवर्क’ केवल सिग्नल का खेल नहीं है, यह संबंधों का, संवेदनाओं का, और संवाद का अदृश्य जाल है। जिसमें सबसे बड़ा बहाना हम खुद बन जाते हैं। और शायद जब नेटवर्क चला जाता है, तभी जीवन का असली कनेक्शन शुरू होता है।






