कैसी तो मनहूस घड़ी थी, जब न जाने किस भावावेश में आकर प्रमिला के मुंह से निकल गया- ‘ तू मेरी बात ठीक से सुनता क्यों नही? दसवीं में 80 प्रतिशत से नीचे नंबर आए तो साइंस कॉलेज में कैसे एडमीशन हो पाएगा तेरा? ये बात तेरे दिमाग में धंसती क्यों नही?’ गुमसुम आशु दांतों से नाखून चबाता कभी नीचे जमीन पर तो कभी आसमान की तरफ खोई नजरों से ताकता रहा।
‘ मोबाइल देखने से फुर्सत मिले, तब न? किताबें तो इसे काटने दौड़ती हैं, टुकड़खोर कहीं का . . . पिता ऊंची आवाज में दहाड़ने लगे।
‘टुकड़खोर कहा आपने मुझे? तो आप भी कान खोलकर सुन लो, जब तक चार पैसे कमाने लायक नही हो जाऊंगा,तब तक कभी लौटूंगा भी नही आपके दरबज्जे पर। हां, याद रखना इसे। मैं आपकी नाकारा औलाद हूं, ठीक है फिर, चला जाता हूं आपका ये घर छोड़कर। आपके टुकड़ों को खाने कभी नही लौटूंगा इस देहरी पर।‘ धम धम करते हुए वह दरबज्जे से बाहर निकलने लगा।
‘आशु बेटा, आशु, सुन तो। ऐसे गुस्सा नही करते।‘ रूआंसी आवाज में टेरने लगीं वे।
‘ जाने दो, घूम फिरकर शाम तक लौट ही आएगा. . .
बदहवास प्रमिला नंगे पैर दरबाजे के बाहर बाहर सड़क पर तेज तेज चलते हुए टेरती, आंखें फाड़कर यहां वहां देखती तलाशती रही मगर दूर दूर तक कहीं नजर नही आया। मोबाइल तक नही ले गया, सोचकर बेचैन हो उठीं। शाम ढलने पर देर रात इंतजार में बाट जोहते जोहते थकी आंखें टकटकी लगाए निहारतीं रहतीं। रोते रोते आंखें सूजतीं, गला रूंधता गया। पस्त मन हाहाकार करता रहा। वो मनहूस काला दिन और आज का दिन, उंगलियों पर दिन, महीने, साल गिनते गिनते थक गयी वह। उम्र की लंबी चौड़ी सीढियां तय करते करते देह बुढाने झुराने लगी मगर उसे नही लौटना था, सो नही लौटा।
आशु की सूरत पल भर के लिए आंखों से ओझल नही हो पाती। कोई दिन ऐसा नही जाता, जब प्रमिला आशु को यादकर रोई न हो। उसकी सूरत याद आती- उसकी वे पतली भौंहें, हंसती आंखें, लंबे पतले शरीर पर ढीला टीशर्ट पहने आशु के झबरीले गुच्छेदार बाल! कभी बचपन की मासूम हरकतें तो कभी आंचल में दुबककर सोते समय कोई कहानी, कोई गाना सुनाओ न, उसकी वे मीठी मनुहार भरी बातें यादकर कलेजे में हूक सी उठती। उसकी वेदना उसके चेहरे पर ऐसे चिपक गयी जैसे, दीवार पर सालों से टंगा चित्र हो कोई।
पिता ने तुरंत बेटे की गुमशुदगी की रपट भी लिखवाई। कितने मंदिरों, मस्जिदों, गिरिजाघरों और नामी दरगाहों पर मत्था टेककर प्रार्थनाएं करते रहे मगर ऊपर वाले के यहां कहीं कोई सुनवाई नही। नही सुनीं गईं वे आर्त पुकारें। पुलिस, अस्पताल, रेलवे स्टेशन से लेकर न जाने किन किन जगहों पर ढुढाई कराने में कोई कसर नही छोड़ी मगर हर जगह से निराशा हाथ लगी। अखबारों में मृतकों की शिनाख्त वाली खबरें पढ़ते ही पिता बेटे को चीन्हने चुपचाप निकल जाते। बेटे को याद करके बेचैन पछतावे का लंबा घूंट पीते हुए किसी तरह दिन तो कट जाता मगर रात में लेटते ही अपराधबोध गहरा होकर अवसाद में बदल जाता और वे अंदर बाहर के काले घुप्प अंधेरों से घिर जाते।
अचानक कस्बे में नई तैनाती हुई महिला पुलिस इंस्पेक्टर सौम्या की, जिससे आसपास के लोग घुल मिलकर अपना दुख दर्द बांटने लगे। किसी रोज प्रमिला का किस्सा सुनकर सौम्या बोल पड़ी-‘ विश्वस्त सूत्रों से पता चला कि घर से भागे लडके आसपास के मंदिरों, होटलों, मठों में मुफ्त की रोटियां तोड़ रहे हैं। हमारा एक कजिन झारखंड के मठ में साधु बना मिला है। आशु का पता करते हैं, शायद यहीं कहीं हो। कैसा था आपका बेटा दिखने में, पहचान लेंगी?’
सुनते ही लगा जैसे सालों से मुर्दा प्राणों में जान डाल दी हो किसी ने। भावुक स्वर में बोलने लगीं- ‘ नाक पर मस्सा और दाएं पैर की एड़़ी में काला निशान .. . कहते हुए वे अंदर जाकर मंदिर में सहेजकर रखी अपने बेटे की तस्वीर उठा लाईं!
कब, कहां, कैसे मिलेगी खोए बच्चों की सूची? अखबार में खबर पढ़ते ही खोए बच्चों के मां बाप की आंखों में आशा की दीया जगर मगर जलने लगा। घर पर बेटे की चाहत में आकुल व्याकुल सब लोग इंतजार करने लगे-‘ चाहे जो हो, हम अपने बच्चे की घर वापसी चाहते हैं, हर हाल में।
एक दिन अचानक कहीं से खबर मिली, तो तुरंत सौम्या गुमशुदा युवक को पकड़कर सबके सामने लाकर खड़ा कर दिया- ‘ आशु नाम है तेरा?’
‘ हां?’ गर्दन नवाए चुपचाप नीचे देखता रहा वह।
‘ कोई बालपन की बात याद है?’
‘इतने सालों बाद कैसे याद रह पाएगा?’ मां की पनीली आंखों से आंसुओं की मोटी धार ढुलक पड़ी।
‘ बेटा, तू अब कहीं नही जाएगा यही मेरे पास रहेगा ,’’ सालों बाद पुत्र को देखकर भावुक मां की ममता फफक उठी।
‘ जाना तो पड़ेगा ही, ये चार दिन की जिंदगानी है, जन्म और मृत्यु पूर्वनिश्चित। हम सबको एक न एक दिन मुक्तिधाम निकलना है।‘ रटीरटाई भाषा में कुछ बुदबुदाता रहा।
‘ ठीक है, मठ की तहकीकात के बाद ही आगे कार्रवाई करेंगे।‘ सौम्या ने बात संभालनी चाही।
अगले दिन आशु के पिताजी की नजरें बार बार अखबार की उस खबर पर चिपक गईं- ‘खोई संतान बनकर ठगी करने वाला धंधा जोरों पर। आसपास के कई गांव ऐसी ठगी की चपेट में आ गए हैं, जहां खोए बच्चों के मां बाप से खुलकर पैसे ऐंठा जा रहा।‘
सच्चाई का पता लगाने पुलिस इंस्पेक्टर सौम्या ने अपनी पूरी टीम के साथ आसपास के गांवों में धरपकड़ शुरू कर दी। उस दिन वह घुप्प अंधेरे में दबे पांव दो मील दूर बने मठ के उसी ठिकाने जा पहुंची, जहां चल रही कानाफूसी साफ साफ सुनी जा सकतीं थीं-
‘उन्हें यकीन दिला कि तू ही उनका खोया बेटा है? मां बाप इतने सालों बाद कैसे पहचान पाएंगे अपनी खोयी औलादें? बस, यहीं से हमारा धंधा शुरू होता है। बस, तू एक बार एक्सपर्ट एक्टिंग करके दिखा दे, फिर, कल सुबह पैसे की मांग की जाएगी। उनकी गांठ से पैसे निकाल किसी तरह। फिर किसी दिन मौका तककर निकल भागेंगे यहां से।‘
एक एक शब्द सीने पर हथौड़े की तरह चोट करने लगा।
जीवन कहां किस मोड़ पर आकर थम जाता है, सोचकर प्रमिला का दिल दहल गया। ऐसे भयावह दर्द का एहसास हुआ, जैसे किसी ने जहरीले इंजेक्शन को सीधे उसकी देह में जबरन घोंप दिया हो। अगले ही पल आंखों के सामने घुप्प अंधेरी गुफा नजर आईं। “ओ मेरा बेटा, मेरा पुत्तर, तू वाकई अब कहीं नही दिखेगा”। बेबस प्रमिला का मौन आर्तनाद कोई भी भला कैसे सुन सकता था?






