कविता-कानन
एक
एक कविता
जो मिट्टी से निकली हो
एक गीत
जो दिल से जुड़ा हो
कोई एक आदमी हो
जो दूसरे के
हित में खड़ा हो
कोई एक खेत
जिसमें आस्था उगायी जाए
कोई एक रेल
जो दिलों से दिलों तक
चलायी जाए
एक सड़क जिसमें
हर संदेह पर
नाका पड़ा हो
एक घर
जिसमें प्रेम रहता हो
एक सड़क
जो विश्वास पर चले
ऊपर वाले का
कोई एक नाम
जो धर्म की परिभाषाओं से
ज़्यादा बड़ा हो
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प्रेम की औनी पौनी कविता
तुम कविता होती हो
जब भी सोचता हूँ
पर इतना लिखने पर भी
कविता तुम नहीं हो पाती
नहीं मिलते आँखों होठों
गालों ज़ुल्फ़ों और उनके
लाख खमों और अदाओं के लिए
पूरे- पूरे शब्द
और हार जाती है लय
हर बार तुम्हारी चाल से
कविता सोचता तो सुन्दर हूँ
पर कम निकलती है
तुम्हारे ख़याल से
फिर- फिर नयी यादों
नयी बातों
और नए- नए से एहसासों को
पहनाता हूँ शब्दों का जामा
और कोशिश करता हूँ
कि कम से कम एक कविता
ऐसी लिखूँ जो आईना लगे
जिसमें तुम्हारा
पूरा रूप अस्तित्व
पूरा-पूरा सजे
पर हर बार शब्द वाक्य भाव
निकलते हैं उम्मीद से थोड़े
और तुम इश्क़ के
अगले पड़ाव पर पहुँच जाती हो
मैं अपने अधूरेपन का बक्सा लिए
पिछले स्टेशन पर ही तुम्हारा
इंतज़ार करता हूँ
सच है कि कविता तुम नहीं हो पाती
फिर भी मैं दोनों से ही
प्यार करता हूँ।
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यात्राओं में
यात्राओं में
ये कदम
अनंत काल से हैं
यात्रा में
कभी मेरे
कभी तुम्हारे
कभी हमारे
इन यात्राओं के बीच
रहे हैं
संबंधों के अल्प अंतराल
जब लगा कि
आ चुका है पड़ाव
और लगा कि
हो गया है जुड़ाव
ठीक तभी
स्वयं की खोज में
फिर से निकला मुसाफ़िर
ये सत्य भी
कि यात्राएँ
बड़ी हैं क्षणिक उद्वेगों से
ये कदम
अनंत काल से हैं
खोज में
कभी मेरी
कभी तुम्हारी
कभी हमारी
ये अन्वेषण हिस्सा है
अपने होने को
होना सिद्ध करने का
ये तलाश विकट है
विकल है अचल है
इस खोज का ध्येय
एक और खोज के ध्येय की
चाह है
इसे नकारा नहीं जा सकता
ये विचार
अनंत काल से प्रतीक्षा में हैं
कभी मेरी
कभी तुम्हारी
कभी हमारी
हर शब्द समूह का
कविता होना तय नहीं है
पर हर शब्द समूह का
एक स्वप्न है अमरता
और अमरता लय में निहित है
लय प्राप्ति के लिए
उतारना आवश्यक है
व्याकरणों और सधे नियमों से
भाषा को
लहकती घास को
ढालना होगा कवि को
हर बार नए रूप में
इन यात्राओं में
खुद को पाने से
कहीं सहज है
खुद को खो देना
एक बीज
अनजानी दिशा से आया
अपने स्वर में बो देना
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प्रतीक्षा और प्रेम
तुम नदी हुई
मेरे समुद्र होने की प्रतीक्षा में
तुमने पहाड़ों, मैदानों
किनारों से
तोड़ डाले अपने संबंध
और सारी जमा पूँजी
समेटते उड़ेलते
चलती रही तुम ता उम्र
मेरे समुद्र होने के साथ
ये तय था
कि फिर एक नदी का
नहीं रह पाऊँगा मैं
तुम मिलोगी और खारेपन में
खो दोगी अपना अस्तित्व
रहोगी मेरे भीतर
भाप बनने तक
और बादल जब तक
तुम्हें विदा कर के नहीं ले जाते
तुम्हारा नदी होना
तुम्हारा चलना
तुम्हारा बाकी संबंधों को
ताक पर रखना
और किसी भी शहर
गाँव ये देश की हो कर नहीं रहना
ये समर्पण शायद
मैं कभी न समझ पाया
कि सागर हो कर
मैंने सिर्फ किनारों की देखा है
दूर दूर से ही
लहरों से ही उन्हें छुआ है
मैंने तो जीवन को
सिर्फ दर्शक बन कर देखा है
तुम नदी
तुमने बता दिया कि
प्रतीक्षा भी प्रेम है।
– अमरदीप





