कविता-कानन
अविरत प्रतीक्षा
सुनो!
थमते वक्त के साथ
संयोग के गीत भी
परिवर्तित हो जैसे
शोकगीतों में
उद्वेलित मन की पुकार
तुमसे कहूँ
कि आओ समाहित कर
अपने अंक में
मेरा अस्तित्व खत्म कर दो
पर तुम्हारे भीतर की
मुझे लेकर पलती भ्रांति
और उसे दूर करने का प्रयास
स्मरण करा जाता
गुजरे हुए हादसे की तरह
ऐसा नहीं कि भूलने का
प्रयास नहीं करती
पर तुम्हारे और मेरे मध्य की
ये अंतहीन प्रतीक्षा
फिर भी थामें हुए
एक मुद्दत से
कहने लौट आओ
पर
खामोशी की भी
अपनी परिभाषा
मौन में सुन सको तो
स्मृतियों के वन में
क्योंकि
इतिहास के पन्नों में
अधूरे स्वप्न और
अधूरी कामनाओं के संग
एक अनुभव बहता रहा
विचारों के दलदल में
घिर चुका अपना ये बंधन
छिद्र-छिद्र होता
मेरी भावनाओं का दलदल
संयोग की आस लिए
बेजान बुत-सा
नयनों में विसर्जित
गहन अंधकार और
तुम्हें खोने का डर लिए
क्षण भंगुर जीवन में
बहता रहा
अविरल और
कभी न खत्म होने वाली
प्रतीक्षा में
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मंथर-मंथर
संघर्षों का कोई अंत नहीं
धैर्य रखे तो कब तक
हर कोई भीतर से
टूटता गया
मंथर-मंथर
जीवन के रंगमंच का
ये भावशून्य खेल
कब तक खेला जाएगा!
इस खेल ने तो
अब मेरे अस्तित्व को ही
गुमनाम कर दिया
मंथर-मंथर
ये रंगहीन परछाइयाँ
चुभती हैं हृदय में
और इनसे उड़ती हुई धूल
शेष खुशियों को
उड़ाती प्रतीत होती
सोचने को मजबूर करती
ये अंतहीन पीड़ा और कसक
अनिश्चित जीवन यात्रा
उलझती गयी
मंथर-मंथर
संघर्षों में परिवर्तन
ले आया ये मनहूस वर्ष
कोरोना रूपी काल सर्प
निगलता गया
सुख, चैन
मन की पीड़ा में
इजाफा होता गया
मंथर-मंथर
मैं मौन होती गयी
झरते अश्रु कण
सिसकती साँसों की आह ने
पोंछ लिये
दृढ निश्चयकर पुन:
कागजों में
उलझी उन स्याह लकीरों में
मंथर-मंथर
– डाॅ. रेखाश्री खराडी




