वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय सूर्यबाला जी पर लिखी यह किताब अपने आप में अनूठी है क्योंकि लेखिका डॉ पूनम पिसे ने इसे गहन अध्ययन के साथ गहराई से शोध करते हुए सूर्यबाला जी के व्यक्तिव और कृतित्त्व दोनों में संवेदना के सूक्ष्म से सूक्ष्मतर स्तर को उकेरा है उसे विस्तार से व्याख्यायित किया है।
किताब की भूमिका वरिष्ठ साहित्यकार दामोदर खड़से जी ने लिखी है। वे कहते हैं “इस पुस्तक की तैयारी में निश्चित ही असीमित परिश्रम झलकता है।”
यह पुस्तक चार प्रमुख अध्यायों और उन अध्यायों के लगभग दस-बारह उप अध्यायों में विभाजित है। इन अध्यायों में सूर्य बाला जी के व्यक्तित्व-कृतित्व के अतंर्गत उनका पूरा जीवन परिचय, उनकी अभिरुचियों, उपलब्धियों के साथ संवेदना का शास्त्रीय विवेचन है और संवेदना को विभिन्न स्तरों पर जाँचा परखा गया है, वह चाहे फिर प्रकृति और संवेदना हो, मानवीय संवेदना या मानवेतर संवेदना या संवेदना के विभिन्न स्वरूप जैसे तनाव ,संत्रास ,प्रेम, क्रोध, भक्ति आदि।संवेदना की इन्हीं कसौटियों पर सूर्य बाला जी की कहानियों का सुस्पष्ट और विस्तृत विश्लेषण हुआ है।
संवेदना की अभिव्यक्ति में आने वाले भाषाई तत्त्वों की भी सविस्तॄत और सूक्ष्म व्याख्या पुस्तक में मिलती है जिसमें, भाषा, कहावतें, बिम्ब, शैली आदि सभी का निदर्शन गहराई से सूर्य बाला जी की कहानियों में हुआ है।
यह एक शोधपरक कृति है इसलिए इसका पठन भी बहुत ध्यान से होना चाहिए पर विशेष बात यह है कि यह कृति शोधपरक होने के बाद भी कहीं भी मन-मष्तिष्क को बोझिल नहीं करती बल्कि सूर्य बाला जी की कहानियों में संवेदनाओं के अन्वेषण करते हुए हमे निमग्न कर देती है और हृदय कई बार द्रवित हो जाता है और आँखें नम हो जाती हैं। वास्तव मे इस कृति में सूर्य बाला जी के व्यक्तिव और कृतित्व में संवेदना का पुंज इतनी सूक्ष्मता के साथ अभिव्यक्त हुआ है कि पाठक उन संवेदनाओं के साथ एकाकार हो उठता है। लेखिका पूनम ने सूर्य बाला जी की अनेक कहानियों के संदर्भ तो लिए ही हैं साथ ही संवेदना के विभिन्न आयामों को सुस्थापित करने के लिए विभिन्न आलोचकों के ग्रंथो का ,उनके विचारों का भी संदर्भ लिया है।
वरिष्ठ साहित्यकार सूर्य बाला जी को संवेदना के धरातल पर परिचित कराने का सुख तो यह कृति देती ही है साथ ही ज्ञान के कपाट भी उद्घाटित करती है।
कृति में लेखिका डॉ पूनम पिसे लिखती है-
“आधुनिकता के बदलते पैमाने पर संवेदना को मनुष्य के भीतर बनाये रखने की चुनौती का सूर्य बाला की कहानियाँ न केवल सामना करती है बल्कि सहर्ष सकारत्मक समाधान भी ढूँढती हैं।”
निश्चय ही आज के कठिन समय में मनुष्य के अंदर संवेदना को जागृत रखने की महती आवश्यकता है, ऐसे में लेखिका डॉ पूनम मानकर पिसे की यह श्रमसाध्य कृति उल्लेखनीय है। आप सब भी इस कृति को पढ़े और सूर्य बाला जी की कहानियों को संवेदना के स्तर पर समझते हुए मन को स्पन्दित करे। हिंदी साहित्य के विद्यार्थियों के लिए तो यह पुस्तक बहुत उपयोगी है। वनिका पब्लिकेशन ने बहुत सुंदर ढंग से यह कृति प्रकाशित की है। 312 पृष्ठों से आवृत यह कृति निश्चय ही पठनीय है और मन-मस्तिष्क दोनों को ही समृद्ध करती है।






