हिन्दी का इतिहास शुरू से ही पुरुष केंद्रित रहा है। किसी भी इतिहास में स्त्री साहित्य को खारिज करने की हमेशा कोशिश रही है। सिर्फ उन्हीं का उल्लेख हम पाते हैं जिनसे इतिहास मुँह नहीं मोड़ पाया है। परंतु आज यह बात नहीं है। आज हर जगह स्त्री रचनाकार स्वीकृत है। कुछ रचनाकार अपने उत्कृष्ट योगदान के बावजूद उतनी चर्चित नहीं हुई जितनी प्रसिद्धि उन्हें मिलनी चाहिए। नाम तो अनेक है और साहित्य की विधाएं भी बहुत हैं पर आज चर्चा का बिंदु आत्मकथा है। वर्तमान समय में स्त्री विमर्श को अग्रसर पथ पर ले जाने में महिला आत्मकथाओं का विशेष योगदान है। इन आत्मकथाओं में स्त्री जीवन को स्त्री संवेदना के साथ अभिव्यक्त किया गया है। आत्मकथाओं के माध्यम से स्त्री अस्मिता का बुनियादी स्वर साहित्यिक परिदृश्य में गुंजित होना सुखद बयार की भांति है।
वस्तुतः आत्मकथा पाठक से सीधा संवाद करने का उपक्रम है। आत्मकथा के माध्यम से लेखिकाएं समाज से सीधा संवाद करती हैं और स्त्री अस्मिता के विभिन्न प्रश्नों को उठाती हैं। इसीलिए आत्मकथा केवल जीवन के तथ्य और घटनाओं का विवरण नहीं है बल्कि समाज, स्त्री, पितृसत्तात्मक व्यवस्था की नई व्याख्या भी है। पितृसत्तात्मक समाज में स्त्रियों के सामाजिक जीवन को कितना प्रभावित किया है और कितना भ्रमित किया है इसका अभिलेख हमें आत्मकथा में मिल जाता है। इस दृष्टि हम देखें तो आत्मकथा स्त्री समाज को एक दिशा देती है और साथ ही स्त्रियों में एक सामाजिक और अस्मिता बोध की चेतना का विकास करती है। आत्मकथा में आत्म तत्व सर्व प्रमुख होता है।
स्त्री आत्मकथा में स्त्री जीवन के यथार्थ का संतुलित विवेचन होता है। स्त्री की दृष्टि से सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक यथार्थ का प्रतिरूपण ही स्त्री आत्मकथाओं की विशेषता रही है। हिंदी साहित्य की पहली आत्मकथा जानकी देवी बजाज की आत्मकथा मेरी जीवन यात्रा है जो सन 1956 ई0 में प्रकाशित हुई थी इसके बाद अनेक आत्मकथाएं प्रकाशित हैं जो अपना-अपना वैशिष्टय रखती हैं। जैसे रमणी रमणिका गुप्ता की आत्मकथा आपहुदरि राजनैतिक परिदृश्य उपस्थित करती है तो निर्मला जैन की आत्मकथा जमाने में हम साहित्यिक परिदृश्य को उभारती हैं। साहित्यिक परिदृश्य को उभारने में मन्नू भंडारी की आत्मकथा एक कहानी यह भी और ममता कालिया की कितने शहरों में कितनी बार भी प्रमुखता से आते हैं। शिवानी की आत्मकथा ‘सुनहु तात यह अमर कहानी’ उनकी कहानियों की तरह ही सरल व सरस है। इन सब आत्मकथाओं में चंद्रकिरण सोनरेक्सा की आत्मकथा ‘पिंजरे की मैना’ सबसे अलग है। इसमें ना ही हादसे जैसी बोल्डनेस है और ना ही और औरतें (कृष्णा अग्निहोत्री) जैसी आत्मकेंद्रीयता।
पिंजरे की मैना आत्मकथा उस रूप में व्यक्त नहीं करती है जिस रूप में अन्य आत्मकथाएं करतीं हैं। यहाँ बिना किसी लाग-लपेट के सीधी-सच्ची दिल से निकली बात को दिल तक पहुँचाने का प्रयत्न है। वह स्वयं कहती है कि “बस इतना सा अंतर मेरी कृतियों और इस आत्मकथा में है कि वे जग बीती थी और यह आप बीती हैं।“
चंद्र किरण जी का यह कथन पूरी तरह से स्पष्ट करता है कि उन्होंने अपनी आत्मकथा को कहानी शैली में ही लिखा है। वर्तमान समय के प्रसिद्ध होने के तमाम हथकंडे इस आत्मकथा में हमें देखने को नहीं मिलते हैं। न ही प्रेम के नाम पर भावुकतावादी रोमांस और देह का चित्रण मिलेगा। आज साहित्य में भी मसाला ढूंढने की प्रवृत्ति बड़ी तेजी से विद्यमान है, पर जिन्हें मसालों की तलाश है कृपया वह इस आत्मकथा को न पढ़ें क्योंकि इसमें मसाले जैसा कुछ भी नहीं है। चंद्र किरण जी कहती हैं कि “आज की पीढ़ी इन्हीं मौकों का दामन पकड़कर दूसरे का सच उसी के मुहँ पर मार कर स्वयं को विजयी सिद्ध करने का आनंद लेना ज्यादा पसंद करती है।“
आत्मकथाओं के व्यापक क्षेत्र में पिंजरे की मैना के द्वारा चंद्र किरण सोनरेक्सा ने हिंदी साहित्य में अपनी सुदृढ़ उपस्थिति दर्ज कराई है। चंद्रकिरण की आत्मकथा उनके शब्दों में आपबीती है। इस आत्मकथा में लिंग भेद, रुढ़िग्रस्त विचारधारा, स्त्री शिक्षा के बंधे बंधाए चौखटे अपने पुरजोर विरोध के साथ दर्ज है। इसमें पितृसत्तात्मक समाज में आत्मनिर्भर होने के प्रयास में टूटती बिखरती स्त्री का यथार्थवादी चित्रण है। संबंधों की दृष्टि से देखें तो इस आत्मकथा में पुरुषों के विवाह की दशा, विधवा विवाह, परंपरागत विवाह प्रथा की रूढ़ियों इत्यादि के कारण उपजी स्त्री समस्याएं बिना किसी भूमिका के उपस्थित हुई है।
चंद्र किरण जी ने भारतीय समाज में स्त्री के जीवन का चित्रण इस प्रकार से किया है कि मैथिलीशरण गुप्त की कविता चरितार्थ हो जाती है। जिसमें वह कहते हैं कि अबला जीवन तुम्हारी यही कहानी आंचल में है दूध और आंखों में। चंद्र किरण जी का कहना है कि दमन की प्रक्रिया इतनी अधिक है कि स्त्री अपनी पहचान अपना अस्तित्व अपना अधिकार सब कुछ भूल जाती है। वह सिर्फ पारिवारिक और सामाजिक उत्तरदायित्व के निर्वहन भर रह जाती है। इसी कारण से इतिहास ग्रंथों में स्त्री की सृजन एवं संघर्ष की जो छवि है उसका उल्लेख नहीं मिलता है। इस आत्मकथा में जो है वह एक सरल स्त्री की आत्म कहानी है जो एक मध्यमवर्गीय परिवार से है और अपने परिवार को संरक्षित व सुरक्षित रखने के लिए स्वयं की अस्मिता की भी तिलांजलि दे देती है। चंद्रकिरण स्वयं कहती है की आत्मकथा का केवल एक उद्देश्य होता है अपनी जीवन यात्रा का निष्पक्ष दर्शक की तरह पुनरावलोकन करना। पिंजरे की मैना उसी का फल है।
आत्मकथा के माध्यम से वह बताती हैं कि उनका कथा साहित्य कितना समृद्ध रहा है। आकाशवाणी की नौकरी के समय उनकी अनेक रचनाएँ रेडियो पर प्रसारित हुई जो आज अनुपलब्ध है। जब तक कान्ति जी थे तब तक उनका एक ही कहानी संग्रह प्रकाशित हुआ था। बाद में उनके अन्य संग्रह जवान मिट्टी आदमखोर और अन्य कहानी संग्रह प्रकाशित हुए और उपन्यास का प्रकाशन उनके बच्चों के प्रयास से हुआ। चंद्र किरण जी को सर्वाधिक प्रसिद्धि उनकी आत्मकथा पिंजरे की मैना से मिली है जो उन्होनें अपने पुत्र के अनुरोध पर लिखा।
निम्न मध्यवर्गीय परिवार के उतार चढ़ाव, अन्तर्द्वंद्वो के बीच सृजनशील नारी की आत्मकथा है पिंजरे की मैना। इस आत्मकथा में उनका क्रांतिकारी लेखन और सामाजिक दृष्टि उभरकर सामने आई है। दो जून की रोटी के लिए भारतीय स्त्रियों की पीड़ा, त्याग और समर्पण को बड़ी कुशलता से स्व के माध्यम से अभिव्यक्त किया है। वस्तुतः: यह आत्मकथा नारी मन की पीड़ा का शब्दकोश बन पड़ा है। नारी के जीवन का बंधन, उसकी परतन्त्रता, उसकी अधिकार विहीनता आदि सब कुछ मूर्त रूप में पिंजरे की मैना में साकार दिखाई देते हैं। पितृसत्ता और समाज का सामंतवादी रूख कैसे स्त्री जीवन को प्रताड़ित करता है इसका यथार्थपरक रूप पिंजरे की मैना में चित्रित हुआ। एक लेखिका का दर्द यह भी है कि वह पहले माँ, पत्नी, बहू और बाहर काम करने वाला कर्मचारी है फिर वह सबसे बाद में लेखिका है। एक स्त्री लेखक की इस पीड़ा को पिंजरे की मैना बखूबी बयां करती है। पिंजरे की मैना परम्परागत दाम्पत्य का, स्त्री विमर्श का पूरा आख्यान प्रस्तुत करती है।
इस आत्मकथा का नामकरण अपने आप में सारी कहानी बयां कर देता है। पिंजरे की मैना में पिंजरा पितृसत्ता का प्रतीक है वह स्त्री को सदैव कैद करके रखना चाहता है। यह पिंजरा उस परिवेश में, उस परिस्थितियों में ज्यादा मजबूत था परंतु आज भी हमारे समाज में मौजूद थे। जो स्त्री को शिक्षा ग्रहण नहीं करने देता है और उसके हर व्यवहार को उसके चरित्र, इज्जत, मान और सम्मान से जोड़ता है। बिना यह देखें कि वह भी एक मानवीय अवधारणा है। पुरुष उसका मार्ग रोकने के लिए उसके चरित्र को हथियार बनाता रहा है और समाज उसमें धार देता रहा है। यह स्थिति अधिकांश घरों और स्त्रियों का सच है। दूसरों शब्दों में कहना हो तो मैं सुधा अरोड़ा जी को उद्धृत करना चाहूंगी जिन्होंने कहा है कि “एक रोने कलपने वाली, बुझी हुई पत्नी कमोबेश सबके घरों में मौजूद है जो खुद तनाव और बीमारियों से त्रस्त रहते हुए भी गैर जिम्मेदार पति को बच्चों समेत, परिवार के दोनों पहियों को अपने मजबूत कंधों पर यथासंभव भरसक खींचती चली जाती है।“ (हंस पत्रिका, अगस्त 2010 पृष्ठ 130 से साभार)
स्त्री ने अपने साहस से नये प्रतिमान गढ़े हैं और इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है चंद्र किरण जी। पितृसत्तात्मक पिंजरा उन्हें कैद कर सकता था और किया परंतु चंद्र किरण जी ने पिंजरे समेत उड़ना सीख लिया। पिंजरे में बंद यह मैना न सिर्फ श्रेष्ठ रचनाकार बनी बल्कि एक अच्छी माँ, नौकरी में अच्छी कार्यकर्ती , और परिवार में सभी दायित्वों में सफल स्त्री भी बनी।
पिंजरे की मैना में मैना संपूर्ण स्त्री समाज के संदर्भ में है और पिंजरा पितृसत्तात्मक समाज है जो स्त्री को सदैव ही कैद करके रखना चाहता है। यह पिंजरा तत्कालीन परिवेश में, तत्कालीन परिस्थितियों में ज्यादा मजबूत था। परंतु आज भी यह पिंजरा हमारे समाज में मौजूद है जो स्त्री को शिक्षा ग्रहण नहीं करने देता है और उसके हर कार्य प्रणाली को उसके चरित्र, उसके मान सम्मान से जोड़ता है। बिना यह देखें कि वह भी एक मानवीय अवधारणा है। पुरुष सदैव से ही स्त्री का मार्ग रोकने के लिए उसके चरित्र को हथियार बनाता रहा है और समाज उसमें धार देता रहा है। कुछ समय की चंद्र किरण जी की साहित्यिक अनुपस्थिति और अप्रसिद्धि इसी का परिणाम है। निःसंदेह चंद्र किरण जी ने अपने पति कांति जी के जिस रूप का चित्रण किया है वह कोई नवीन नहीं है बल्कि हमारे समाज में व्याप्त अधिकांश पतियों का चरित्र है जो अपनी सुविधा के अनुसार स्त्री को स्वतंत्रता देने के लिए आगे बढ़ता है। जब तक चंद्र किरण जी अपने लेखन और नौकरी से (आर्थिक रूप से) परिवार का संपूर्ण भार अपने ऊपर उठाती हैं उनकी यह स्वतंत्रता कांति जी के सांचे में फिट बैठती है, परंतु अपने साहित्यिक जीवन में जब संपादकों के प्रोत्साहन या प्रशंसा इत्यादि कोई भी प्रकरण से संबंधित पत्र आते हैं तो वह उनके चरित्र हनन का परिणाम बन जाते हैं। स्त्री का चरित्र उत्तम नहीं है तो वह नौकरी करने के लिए भी उत्तम नहीं होगा परंतु नौकरी आर्थिक मजबूती का आधार है और कांति जी की स्वतंत्रता का पर्याय है इसलिए नौकरी से उन्हें कोई परेशानी नहीं है।
चंद्र किरण जी की नौकरी से कांति जी परिवार की आर्थिक उत्तरदायित्व से पूर्णता मुक्त हो गए जो हमारे पितृसत्तात्मक समाज में पुरुष के लिए अनिवार्य माना जाता है उस सीमा तक वह स्वतंत्रता के पक्षधर हैं परंतु अन्य क्रिया कलाप में स्वतंत्रता का मापदंड भिन्न हो जाता है। इस प्रकार से स्वतंत्रता भी दोहरे अभिशाप के रूप में स्त्री जीवन में व्याप्त है। स्त्री आर्थिक रूप से स्वतंत्र है तो वह पुरुष के आर्थिक उत्तरदायित्व का तो निर्वाह करती है साथ ही स्त्री के परंपरागत छवि अर्थात् मातृत्व, परिवार, रसोई इत्यादि के उत्तरदायित्व भी उसे निर्वहन करना है पर पुरुष आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने के बाद भी स्त्री के किसी दायित्व को अपना दायित्व नहीं समझता है। परंतु जैसे ही स्त्री अपनी अस्मिता के अनुरूप स्वतंत्रता चाहती है वैसे ही पुरुष का अहं सामने आ जाता है। भारतीय समाज में यह आज भी आम बात है। स्त्रियाँ आज भी दोहरे शोषण के लिए विवश हैं। इस प्रकार से ऐसी स्त्री जो इस दोहरे शोषण से गुजर रही हो उसे चंद्र किरण जी की यह आत्मकथा बिल्कुल अपनी लगेगी। पिंजरे की मैना अपने मनोभावों के अनुरूप अपनी संवेदना के अनुसार पूरी तरह से फिट बैठती हैं। हमारा यह परंपरागत पितृसत्तात्मक समाज पिंजरा ही है जो पुरुष को यह कहता है कि घर गृहस्थी की जिम्मेदारियों को निर्वाह करना स्त्री की जिम्मेदारी है।
चंद्र किरण जी एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार की ऐसी स्त्री बनकर पाठक के सम्मुख आती हैं जो अपनी पारिवारिक, आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए आजीवन नौकरी करती हैं परंतु स्वेच्छा से एक शॉल भी नहीं खरीद सकती हैं और ना ही अपनी कोई साहित्यिक रचना प्रकाशित करा सकती है। चंद्र किरण जी की गुमनामी का एक कारण यह भी रहा है कि वह परंपरागत भारतीय नारी की विचारधारा को पुष्ट करने वाली स्त्री हैं जो पारिवारिक मतभेद, अलगाव को न चाह कर के हर परिस्थिति में पति के साथ समझौता करने के लिए तत्पर रहने वाली स्त्री हैं।
पारिवारिक जीवन में सुख शांति के लिए स्त्री का अपने मूल व्यक्तित्व को दबाना कोई नई बात नहीं है। चंद्र किरण भी उससे मुक्त नहीं हो पाई है और ना ही उससे मुक्ति के लिए वह साहस करती हैं। स्वयं को बंधन मुक्त न करने का साहस उन्हें आंतरिक पीड़ा लगातार देता रहा पर वह अपनी समझौतावादी दृष्टि को ही सर्वोपरि रखती है। इस सन्दर्भ में वह कहती हैं कि “ऐसे ही अवसरों के समझौते ने हमारे जैसे लोगों को समझदार कम और कमजोर ज्यादा बनाया है। जाहिर सी बात है कि इस विचारधारा के पीछे एक स्त्री की जीवन दृष्टि, चेतना और संवेदना दृष्टिगत होती है। कैसे एक स्त्री का स्वयं की मुक्ति का प्रश्न पीछे हट जाता है और परिवार का प्रश्न सर्वोपरि हो जाता है यह संवेदनात्मक रूप में लेखिका द्वारा वर्णित किया गया है।“
पुरुषात्मक सामंतवादी दृष्टि से उत्पन्न पीड़ा का यथार्थवादी चित्रण इस आत्मकथा का मूल स्वर है। इस आत्मकथा में पुरुषात्मक सामंतवादी सोच, स्त्री की स्थिति, उसकी पीड़ा, लिंग भेद, संबंधों का सौतेलापन इत्यादि मिलता है। जो पति परस्त्री गमन करता है वह चंद्र किरण को अनैतिक करार देता है। उसे लगता है कि सफलता सिर्फ देह के जरिए ही मिलती है। यह पुरुषवादी दृष्टिकोण आज भी कायम है और इसका सबसे बड़ा और प्रत्यक्ष प्रमाण मन्नू भंडारी को माना जा सकता है। उनकी आत्मकथा एक कहानी, यह भी पिंजरे की मैना के इस पक्ष को अपने शब्दों में ही बयां करती है। स्त्री लेखन की सफलता दृढ़ संकल्प एवं ऊर्जा शक्ति का परिणाम है परंतु पुरुष उसे चरित्र हनन के रूप में ही देखता है। वस्तुतः जब भी कोई स्त्री अपने अस्तित्व का निर्माण करती है तो पुरुष के पास उसके मार्ग को रोकने का सबसे बड़ा हथियार उसका चरित्र ही होता है जिस पर लांछन लगाकर वह अपने अहं की संतुष्टि करता है। पितृसत्तात्मक समाज की सोच वाले लोग इसे सच मान लेते हैं। कांति जी का साहित्य जगत से परिचय होने के बावजूद किरण जी के लेखन को बर्दाश्त नहीं कर पाना पुरुष अहंकार ही तो है। कांति जी का चंद्र किरण जी की रचनाओं का प्रकाशन रोकना पुरुष अहं का ही पर्याय है। इस आत्मकथा में स्त्री जीवन के बाल्यकाल से वृद्धावस्था तक पुरुष वर्चस्ववादी व्यवस्था द्वारा कायम किए गए पिंजरे का दर्द बयां किया गया है। विष्णु प्रभाकर पर कांति जी का आरोपण सामंतवादी दृष्टिकोण वाले पति का अहंवादी, हृदयहीन और क्रूर व्यवहार स्पष्ट दिखाई देता है।
यह कटु यथार्थ स्त्री जीवन का सच है। ऐसा ही यथार्थ रमणिका गुप्ता जी अपनी आत्मकथा में भी कहती है कि “स्त्री को सदा से पुरुष की अनुगामिनी बनकर जीवन जीने की शिक्षा दी जाती है। स्त्री का लक्षमण रेखा लाँघना समाज के तथाकथित पहरेदारों की बर्दाश्त से बाहर होता है। औरत अगर खुदसर हो तो उसकी मुख़ालफ़त लाज़िमी होती है और अगर कहीं राजनीति में हो और वह भी लता बनकर नहीं बल्कि पेड़ या खूँटा बनकर तो उसे हिला देने की तरकीबें, झकझोर देने के ढंग, उखाड़ देने के प्रयास इन्तहा पर पहुँच जाते हैं। अगर वह ट्रेड यूनियन में हो, वह भी सफ़ेदपोशों की यूनियन में नहीं बल्कि स्वयं वर्गहीन होकर खाँटी खटनेवाले ब्लू कॉलर कोयला मज़दूरों के बीच रहकर उन्हें संगठित कर आन्दोलित करने का दम रखती हो, तब तो ’युद्ध और प्रेम में हर चीज़ जायज़ है’ का फ़ॉर्मूला लागू करने में सहयोगी, सहभागी- यहाँ तक कि प्रशंसक भी देर नहीं लगाते- दुश्मनों का तो कहना ही क्या ! हाँ, दुश्मनों का ! ऐसी औरत के दुश्मन खड़े हो जाते हैं। दुश्मनी इसलिए नहीं होती कि उससे कुछ नुकसान पहुँचेगा, वह समान कारण तो स्त्री-पुरुष दोनों पर ही लागू होता है- दुश्मनी इसलिए कि एक औरत ने इतने लोगों का विश्वास कैसे प्राप्त कर लिया- बिना उनकी मदद के यह कैसे संभव हुआ ! ज़रूर दाल में कुछ काला है ! यह डाह ही दुश्मन खड़ा कर देती है। तब ऐसी औरत के खिलाफ़ बहुत सी ’कनफुसकियाँ’, अफ़वाहें, चटपटी प्रणय कथाएँ, झूठे-सच्चे किस्से हवा में तैरने लगते हैं। (रमणिका गुप्ता: हादसे, राधाकृष्ण प्रकाशन पृ0 15-16) यह सत्य अधिकांश आत्मकथाओं का सत्य है। परंतु वर्तमान आत्मकथाओं जैसी बोल्डनेस पिंजरे की मैना में नहीं है।
जॉन स्टुअर्ट मिल ने द सब्जेकसन ऑफ विमेन में कहा है कि विवाह इकलौती ऐसी सामाजिक व्यवस्था रह गई है जिसे कई मामलों में बंधक व्यवस्था कहा जा सकता है। हर घर की गृहिणी के अलावा कोई गुलाम नहीं बचा है। (जॉन स्टुअर्ट मिल: द सेक्शन ऑफ़ वीमेन अनुवादक युगांक धीर पेज 87) उनकी यह उक्ति इस आत्मकथा में सजीव चारित्र बन कर उपस्थित हुई है। विवाह संस्था के नियम तोड़ने वाले पुरुष से त्रस्त चंद्रकिरण जी इस संस्था के विकृत और संकुचित विचारधारा, नैतिकता के नाम पर शोषण इत्यादि बिंदुओं को विचार के केंद्र में लाती हैं परंतु वह आत्म केंद्रित और आत्मवृत्त पति पर आरोपण करके अपने भाग्य की इतिश्री मान लेती हैं। अपने पति या उसके अहं से कहीं भी विरोध नहीं कर पाती हैं या दूसरे शब्दों में कहें तो विरोध करना भी नहीं चाहती हैं। वस्तुतः चंद्र किरण जी की जिन्दगी के जो आदर्श रहें हैं वह उन्हें अपनी रचनाओं में भी उपस्थित करना चाहती थी। इसलिए समाज में दिख रहे अनाचार को वह उस तरह से नहीं लिख सकीं जिस तरह से आज की महिला रचनाकार लिखतीं हैं। इस संदर्भ में चंद्र किरण जी कहती हैं कि —- “भाई बहन के सामाजिक रिश्ते पर आते ही मेरी लेखनी को जैसे सांप सूंघ जाता था। आज मैं जब अपनी मानसिकता का विश्लेषण करती हूं तो लगता है कि मैं मर्यादा और पवित्रता के आर्य समाजी चश्मे से ही सब कुछ देखती थी। इसलिए चित्रण करने में उस वक्त मेरी लेखनी संकुचित हो गई। अब इस विचारधारा से अनुप्राणित रचनाकार से क्या यह अपेक्षा की जा सकती है कि वह अपने पति से विरोध करे।
कुछ लोगों ने आत्मकथा को पढ़ करके कहा है कि इसमें चंद्र किरण जी का रुदन ही है विरोध नहीं। परंतु मैं यहां कहना चाहूँगी कि क्या यह आत्मकथा चंद्र किरण जी का औजार नहीं है ? क्या यह पुरुषवादी विचारधारा के विरोध में खड़ा हुआ नहीं है? रचनाकार के पास और क्या हथियार होता है। क्या इस आत्मकथा ने हर उस स्त्री की कथा को नहीं कहा जिसे समाज नहीं सुनना चाहता है? यह सत्य है कि अपनी जड़ता में वह कांति जी का जीवन भर विरोध नहीं कर पाई पर उस विरोध का प्रारूप तो आत्मकथा के रूप में हमारे समक्ष प्रस्तुत होता है। एक लेखिका इससे अच्छा विरोध और क्या प्रदर्शित कर सकती है।
चन्द्रकिरण जी ने अपनी आत्मकथा में नारी के विविध रूपों को कई स्तर पर चित्रित किया है। नारी और उसके जीवन से जुड़ी हर समस्या को महसूस करने के लिए इससे अच्छा उदाहरण कहीं नहीं मिलेगा। इसमें मध्यवर्ग की घुटन में छटपटाती और उच्च वर्ग के झूठे आडम्बर में उलझी स्त्री संवेदना का चित्रण प्रमुखता से है। पति के अत्याचार के कारण घुटन अन्याय की संवेदना भीतर तक बेध देती है। चन्द्र किरण पितृसत्तात्मक व्यवस्था में नारी शिक्षा की विवशता, उसकी दशा और अन्याय के प्रति उसके विचार को यथार्थवादी नज़रिये से प्रस्तुत करती है। एक कामकाजी नारी के समक्ष आने वाले विभिन्न संघर्षों को बड़ी खूबसूरती से दर्शाया गया है।
आत्मकथा लेखन सिर्फ आत्मकथा लेखन ही नहीं होता है बल्कि आत्मकथा के बरक्स तत्कालीन साहित्यिक, सामाजिक, सांस्कृतिक समाज का प्रतिरूप भी प्रस्तुत करता है। आत्मकथा सिर्फ एक कथा ही नहीं बल्कि तत्कालीन समाज की नब्ज पकड़ने का भी एक साधन है जिसके सहारे हम तत्कालीन समाज का चित्र अपने सम्मुख साकार रूप में पाते हैं। यह आत्मकथा तत्कालीन परिस्थितियों के चित्रांकन में ऐतिहासिक साक्ष्य प्रस्तुत करती है। साहित्य के संदर्भ में हम देखे तो हिंदी साहित्य का इतिहास पुरुषात्मक सामंतवाद से सदैव संचालित रहा है जिसके कारण से स्त्री रचनाकारों की उपस्थिति इतिहास में देखने को नहीं मिलती है। परंतु इस आत्मकथा को पढ़कर हमें यह ज्ञात होता है कि उस समय में स्त्री अपनी साहित्यिक उपस्थिति ही नहीं बल्कि देश भक्ति का भी कर्तव्य निभा रही थी। इसमें कमला चौधरी, सरला देवी, होमवती देवी आदि का वर्णन इस बात का साक्ष्य प्रस्तुत करता है कि स्वतंत्रता संग्राम और लेखन में स्त्रियाँ क्रियाशील रही हैं। यह बात अलग है कि वह इतिहास के पन्नों में अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करा पाई हैं। तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं में शांति और महिला पत्रिका मुख्य थी पर इनका उल्लेख कहीं नहीं मिलता है। कोलकाता से महिला पत्रिका प्रकाशित होती थी जिसकी संपादक सीता देवी थी। इसमें उन्होंने चंद्र किरण जी की कहानी भी प्रकाशित की थी जिसका नाम था नारी। इस पत्रिका के सन्दर्भ में मुझे हिन्दी पत्रकारिता का इतिहास में भी सन्तोष जनक उत्तर नहीं प्राप्त हुआ और न ही हिंदी साहित्य के इतिहास में इसका उल्लेख मिलता है। जबकि हम सब जानते है कि उस समय स्वतंत्रता आंदोलन में स्त्री रचनाकारों ने सिर्फ साहित्यिक योगदान ही नहीं दिया बल्कि स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए भी प्रयास किया। चंद्र किरण जी बताती हैं कि सन 1931 का नमक सत्याग्रह आंदोलन अपने पूरे यौवन पर था। नगर के रईस लोगों की पत्नियां भी मैदान में आ गई थीं। मशहूर होम्योपैथिक डॉक्टर चौधरी की सुंदर पत्नी कमला चौधरी होमवती जी उर्मिला शास्त्री सहित अनेक भद्र महिलाओं ने जुलूस निकाले विदेशी शराब को कपड़ों की दुकानों पर धरना दिया। हिंदी साहित्य का इतिहास सदैव से ही पुरुषात्मक सामंतवादी दृष्टिकोण का रहा है। इसलिए चंद्रकिरण के साथ अन्य रचनाकारों को भी उसने अपने में समाहित करना जरूरी नहीं समझा है। परंतु यह आत्मकथा तत्कालीन परिवेश में सक्रिय महिला स्त्री रचनाकारों को बेहद खूबसूरती से उभारती हैं।
बहुत कम लोग ही जानते हैं कि लेखिका परिषद की स्थापना चंद्र किरण जी के प्रयासों का ही फल है जिसमें उन्होने कई लेखिकाओं को संगठित करके सृजनात्मक कार्य किया, परंतु इसके सकारात्मक कार्यों की ओर लोगों का ध्यान नहीं गया बल्कि इसके चलते लंबे चले कानूनी विवाद और शकुंतला और सरोजिनी ( कवयित्री) के आपसी मतभेदों को ज्यादा प्रचारित प्रसारित किया गया। बाद में विवाद के कारण यह संस्था बंद करनी पड़ी। आज की साहित्यिक विषमता पहले भी विद्यमान थी। इसका उदाहरण हम प्रेमचंद से लेकर चंद्र किरण तक पाते हैं। अपनी प्रथम कृति को प्रकाशित करने के लिए चंद्र किरण जी को अपनी बड़ी बहन से रुपए उधार लेने पड़े थे और आज भी लेखकीय वर्ग की यही आर्थिक विडम्बना है।
पिंजरे की मैना आत्मकथा को पढ़कर तत्कालीन सामाजिक परिवेश का भी ज्ञान होता है। अपने समय के परिवेश में स्त्रियों का बाहर निकलना कितना कठिन था यह चंद्रकिरण जी ने अपनी शिक्षा के संदर्भ में वर्णित किया है। उनकी शिक्षा अधूरी रहने का कारण स्त्रियों का घर से बाहर न निकलना ही रहा है। घर से बाहर निकलने के लिए अध्यात्म और भक्ति ही माध्यम थे। वह कहतीं हैं कि उन दिनों धनाढ्य सनातनी हिंदू परिवारों में घर में भजन कीर्तन का कार्यक्रम रखने की लहर सी जगी हुई थी। जिसमें महिलायें भजन कीर्तन और भाव में बहकर नृत्य भी करती थीं। आत्मकथा के लिए यह आवश्यक है कि वह तत्कालीन परिवेश में हो रहे साहित्यिक, सामाजिक आदि बदलावों को अपनी आत्मकथा में इंगित करें जिससे तत्कालीन समय से साहित्यिक सामाजिक आदि परिस्थितियों से प्रश्न मिले। परंतु चंद्र किरण जी की आत्मकथा में इस तरह के सूक्ष्म बिंदु ही प्राप्त होते हैं।
आत्मकथा में एक ऐसी स्त्री है जो सदियों से अपने अस्तित्व को भूल कर पुरुष के अनुरूप जीवन जीने के लिए बाध्य है। उसकी अपनी एक अस्मिता है, पहचान है परंतु उसे भी वह पुरुष की इच्छा के लिए पर्दे के पीछे करती चली जाती है। पुरुषवादी समाज की सारी रूढ़ियों, विषमताओं और शोषण को सह कर, दुर्गम राहों से गुजरते हुए अपने को साहित्यकार के रूप में स्थापित करना कितना कष्टप्रद हैं यह इस आत्मकथा को पढ़कर महसूस होता है। चंद्र किरण उन स्त्रियों में शामिल हैं जो अपने अस्तित्व के लिए निरंतर प्रयत्नशील हैं साथ ही परिवार और समाज को भी साथ लेकर चलने की प्रवृत्ति से चालित हैं। परिवार और स्वतंत्र अस्तित्व दोनों को समान महत्ता देने वाली चंद्रकिरण की आत्मकथा पिंजरे की मैना पुरुषात्मक सामंतवादी व्यवस्था के पिंजरे को उसके समग्र रूप में प्रस्तुत करती हैं।
चन्द्रकिरण जी ने अपनी आत्मकथा में नारी और उसके जीवन से जुड़ी हर समस्या को महसूस कराया है। इसमें मध्यवर्ग की घुटन में छटपटाती स्त्री संवेदना का चित्रण यथार्थवादी स्तर पर किया गया है। आत्मकथा में पति के अत्याचार के कारण घुटन अन्याय की संवेदना भीतर तक बेध देती है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था में नारी शिक्षा की विवशता, उसकी दशा और अन्याय के प्रति उसके विचार को यथार्थवादी नज़रिये से प्रस्तुत किया गया है। इसमें स्त्री मन की वह दुनिया है जहां पुरूषवादी अहं नहीं पहुंच पाता है। जीवन के हर छोटे से छोटे प्रसंग जो संवेदनात्मक होते है वह स्त्री तो महसूस करती है पर पुरुष नहीं, यही छोटे से छोटे प्रसंग अपनी मनोवैज्ञानिक सूक्ष्मता के साथ उपस्थित हुए है। स्त्री की घर और बाहर की जिम्मेदारियाँ, उसका दोहरा जीवन, दोहरा संघर्ष चन्द्र किरण जी की लेखनी से रूपाकार हुआ है। एक स्त्री के लिए सभी जिम्मेदारियों के साथ लेखन करना कितना दुष्कर है इसे बताते हुए वह कहतीं हैं कि चूल्हे-अंगीठी पर दाल चढ़ाकर वहीं बैठे-बैठे भी दो चार पृष्ठ लिख लेती। दोबारा व्यवस्थित करने का समय नहीं मिल पाता तो कहानी का पहला ड्राफ्ट ही पत्रों में भेज देती। बुक पोस्ट कर देती और वह कहीं गुम नहीं हुआ। हमेशा गंतव्य पर पहुंचा और कहानी छपी भी।
इस आत्मकथा की सबसे बड़ी कमजोरी है कि हर प्रकरण में चंद्र किरण जी स्वयं की विचारधारा को प्रस्तुत करती हैं, कांति जी अथवा अन्य किसी के व्यापक संदर्भ या विचारधारा को वह शामिल नहीं करती हैं। कान्ति जी के स्वभाव की व्यावहारिक समस्या थी तो भी एक व्यापक साहित्यिक परिदृश्य भी कान्ति जी ने ही दिया था। तमाम बड़े व प्रसिद्ध रचनाकारों से परिचय तथा मुलाकात भी कांति जी की ही देन थी। उपेन्द्रनाथ अश्क, मंटो, कृशन चन्दर, विष्णु प्रभाकर, महादेवी वर्मा आदि नाम इसमें शामिल हैं। आत्मकथा में कांति जी के प्रति प्रतिक्रियात्मक रूप में स्वयं को देखने के भाव के कारण तटस्थता उस प्रकार से नहीं आ पाई है जिस प्रकार से आनी चाहिए। इस आत्मकथा में दुख का आत्मकेंद्रित रूप पाठक के सम्मुख आता है।
यद्यपि इस आत्मकथा में संवेदना की अत्यधिक गहराई न हो, फिर भी मर्म को स्पर्श करने की ताकत अवश्य है। विवाह उसकी नैतिकता, स्त्री संदर्भ, स्त्री के निजी संदर्भ को सामाजिक – सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में व्यक्त करने की व्याकुलता भले ही साधारण शब्दों में इस आत्मकथा में आई है फिर भी अपनी साधारणता में ही यह आत्मकथा स्त्री से संबंधित विभिन्न प्रश्नों को पुनः परीक्षण के लिए विवश तो करती है। इसकी सरलता और सादगी ही इसकी विशेषता है।
आधुनिक युग की आत्मकथा लेखिकाओं में स्वेच्छा से जीवन साथी चुनने और उनके साथ निर्वाह करने की आजादी दिखाई देती है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण मैत्रेयी पुष्पा, रमणिका गुप्ता आदि के संदर्भ में हम देखते हैं परंतु चंद्र किरण जी की आत्मकथा इस दृष्टिकोण से बिल्कुल अलग है। अगर वैवाहिक दृष्टि से देखें तो पिंजरे की मैना में वैवाहिक जीवन निर्वाह करने की व्यवस्था सामाजिक और पारिवारिक तौर पर अभिव्यक्ति हुई है।
पिंजरे की मैना स्त्री अस्मिता को नये संदर्भ में व्याख्यायित करती है। यहां पर पुरुष का विरोध नहीं है, पर क्षोभ अवश्य है। अपनी आत्मकथा के माध्यम से चंद्र किरण जी ने ऐसी स्त्री का रूप गढ़ा है जो सामाजिक, साहित्यिक, आर्थिक, पारिवारिक सभी स्तरों पर मजबूती से अपने को खड़ा करती है। बाधाएं पुरुष समाज के द्वारा प्राप्त होती हैं और कुछ पुरुषों द्वारा सहयोग भी मिलता है। इसको वह स्वीकार करती हैं, शायद इसीलिए वह अपने आप को एक संपूर्ण स्त्री के रूप में प्रस्तुत करती है। जहां तक बोल्डनेस की बात है वह इस आत्मकथा में बहुत कम देखने को मिलता है। साहस अवश्य इंदिरा गांधी के प्रकरण में प्रदर्शित होता है।
किसी भी विषय में अगर शिल्प का रेखांकन न किया जाए तो बात अधूरी रह जाती है क्योंकि रचनाकार के पास शिल्प ही वह साधन है जो पाठक और रचनाकार के संबंध का सेतु है। भाषा के संदर्भ में अगर हम देखे तो चंद्र किरण जी की भाषा अत्यंत सहज, सरल व आत्मीय है। मध्यवर्ग की सभी स्त्रियों को यह आत्मकथा अपनी जैसी लगेगी। भाषा का प्रवाह ऐसा है कि कहीं क्लिष्टता नहीं लगती है और न ही सायास भाषा में वैशिष्टय लाने का प्रयास किया गया है। भाषा में क्लिष्टता नहीं पारदर्शिता है और अभिव्यक्ति में भाषा की तरह ही ईमानदारी है। इस आत्मकथा के वैशिष्टय के संदर्भ में सुधा अरोड़ा जी कहती है कि- ” इस आत्मकथा की तुलना अगर किसी से की जा सकती है तो वह है मन्नू भण्डारी की एक कहानी यह भी। दोनों किताबों में गजब की ईमानदारी साफगोई और पारदर्शिता है। शब्द झूठ नहीं बोलते दोनों आत्मकथाओं के ब्यौरे इस बात के गवाह है।” (स्त्री काल से साभार)
घटनाओं को चित्रात्मक तरीके से प्रस्तुत किया परंतु वातावरण का सृजन चंद्र किरण जी उस प्रकार से नहीं करती हैं जिस प्रकार से अन्य आत्मकथा में हमें देखने को मिलता है। घटनाओं का विवरण वह बड़ी सहजता और सरलता से सरल भाषा में करती हैं और किसी भी पृष्ठभूमि के निर्माण का प्रयत्न नहीं करतीं हैं।
शैली के संदर्भ में अगर मैं बात करूं तो इस आत्मकथा को पढ़ते हुए पाठक का व्यक्तित्व स्वयं अपने से अलग हो जाता है और रचनाकार उसकी परिस्थितियां पाठक के समक्ष उपस्थित हो जाते हैं। इस दृष्टि से अगर हम देखे तो एक भावनात्मकता पाठक और रचनाकार के मध्य बहने लगता है, जिस कारण से पाठक आत्मकथा से एकाकार हो जाता है। रूढ़ अर्थ अगर इसे कोई नाम देना हो तो इसे भावात्मक शैली कह सकते हैं। परंतु समीक्षा के बनाए हुए सांचों में यह आत्मकथा थोड़ी सी अलग है। कहीं-कहीं भाषा पूर्ण रूप से सशक्त हो करके अपनी बात को बात को पुष्ट करती है और कहीं-कहीं एक सामान्य शिथिल रूप से घटनाओं की आवृत्ति होती है।
कहीं कहीं उन्होंने विचारात्मक शैली का प्रयोग किया है। वर्तमान समय में आत्मकथा साहित्य में अहं वादी शैली का विकास बड़ी तेजी से हुआ है परंतु पिंजरे की मैना में हमें इसका अभाव दिखता है। शिल्प की दृष्टि से देखने पर इसमें उपन्यासात्मकता अधिक मिलती है। पिंजरे की मैना आत्मकथा की कथा अनंत है पर अन्त में ममता कालिया जी के शब्दों में पिंजरे की मैना के लिए यह शब्द देकर विराम देती हूँ- “यह पुस्तक एक ऐसी साहसी स्त्री की शक्ति गाथा है जिसने पुरुष के काम क्रोध मद लोभ मोह को अपने धैर्य और दृष्टि से विजित किया।……… निश्चित ही यह आत्मकथा बार-बार पढ़ी जाएगी लेखिका की सामाजिक दृष्टि स्पष्टवादिता और सत्य कथन ने उनकी जीवन गाथा में पंख लगा दिए हैं। किसी स्त्री के जीवन में झांकने का यह दुर्लभ अवसर कभी-कभी ही मिलता है”। (ममता कालिया, स्त्री विमर्श का यथार्थ पृ0 16 से साभार)







