बात उस समय की है जब कॉलेज में मुझे नया-नया दाखिला मिला था। नया उत्साह, नई उमंगे हिलोरें ले रही थीं। रोमांच, जिज्ञासा व कौतूहल के मिश्रित भाव हर पल उत्साहित कर रहे थे।
सबसे ज्यादा खुशी दो बातों की थी, पहली अब हीरो सायकिल से जान छूटेगी और लूना (मोपेड) मिलेगी, दूसरी कई सालों से पहनी जाने वाली वर्दी से निज़ात मिलेगी। वह अलग बात है, तब कुल चार या पांच जोडे ही कपड़े हुआ करते थे, जो कि दीवाली के दीवाली अपनी वृद्धि करके इस संख्या तक पहुंचे थे।
खैर, वो दिन भी आया, जब मैं कॉलेज पहुंची। वहाँ कुछ तो स्कूल के पहचाने चेहरे थे और बहुत सारे अनजान चेहरे। एक दूसरे को देखकर लगभग सभी एक सा ही व्यवहार कर रहे थे, संयत व औपचारिक। कुछ रोज बाद सीनियर्स के द्वारा हमे वेलकम पार्टी दी गई, जिससे जान-पहचान का दायरा बढ़ा और साथियों का समूह बड़ा हो गया।
कॉलेज में कुछ न कुछ गतिविधियों का आयोजन आए दिन होता रहता , सब अपनी -अपनी रुचियों के अनुसार उनमें भाग लेते। गायन व स्पोर्ट्स मेरे पसंदीदा इवेंट हुआ करते थे। अतः मैंने भी अपना नाम इन्ही प्रतियोगिताओं के लिए दे दिया।
जुलाई माह से कॉलेज की शुरुआत हुई थी, अक्टूबर आते-आते हम सब आपस में घुल मिल गए थे। सीनियर-जूनियर का भेद भी काफी हद तक मिट गया। अब हम एक टीम की तरह काम करने लगे।
सर्दियों के दिन थे। स्पोर्ट्स डे की तैयारी चल रही थी। मैंने भी अपना नाम कई गेम्स के लिए दे दिया। एथलेटिक्स के कई इवेंट मेरे नाम थे। सीनियर्स ने बहुत प्रोत्साहित किया, खासकर जब मैंने शॉटपुट में प्रथम स्थान प्राप्त किया।
अगला इवेंट टेबल टेनिस का था, मैच की समाप्ति पर छह लोगों का यूनिवर्सिटी के स्तर पर चयन हुआ , उसमे मेरा भी नाम था। हमे अगले मैच के लिए इंदौर जाना था। चयन सूची आने के बाद चयनित खिलाड़ी बहुत खुश थे। अतः सेलिब्रेट करने का प्रोग्राम बना। उसी समय हमारे शहर में नया-नया इंडियन कॉफी हाउस खुला था, जहां पर नए-नए कुजीन उपलब्ध थे, तय हुआ कॉफी हाउस चला जाय।
उस समय प्रायः सामान्य घरों में सादा भोजन ही बनता था, बाहर जाते (यात्रा व पिकनिक) समय पूरी-आलू की सब्ज़ी के साथ अचार बांध के ले जाने का रिवाज था। आज की तरह सप्ताहांत में होटल में खाने का रिवाज़ नही था। माता-पिता की सीमित आय के साथ अपनी इच्छाओं का तालमेल बिठाने का गुण बच्चों में प्रारंभ से ही विकसित हो जाया करता था। हमारे समय किसी तरह की इच्छा व डिमांड करना उद्दंडता की श्रेणी में आता था।
अगले दिन कॉफी हाउस जाने के लिए घर वालों से इजाजत लेनी थी। पूछने पर पहला उत्तर मिला हम तुम्हें पढ़ने-लिखने के लिए भेजते है, होटल में खाने के लिए नही। बहुत मनुहार के बाद इजाज़त मिली और हम सब चयनित खिलाड़ी ‘इंडियन कॉफी हाउस’ पहुँच गए। कुछ लोग वहाँ जाते रहते थे, अतः उनका व्यवहार स्थान परिचय के कारण बिलकुलसामान्य था, लेकिन मेरा पहला मौका था, सो अंदर हिचक थी।
कॉफी हाउस के भीतर जाकर हमने एक टेबल बुक की और सभी लोग बैठ गए। सबकी सहमति से साउथ इंडियन मंगाया गया, पर ये क्या…डोसा आया और अपने साथ छुरी-कांटे भी लाया। मैं अंदर तक संकोच की भावना से दब गई, क्योंकि उसके पहले मैंने कभी भी छुरी-कांटे से नहीं खाया था। मैंने छूटते ही अपनी सीनियर से कहा मुझे डोसा पसन्द नही, मुझे इडली पसंद है। इडली इसलिए क्योकि उसे मैं चम्मच से खा सकती थी। मेरे लिए अलग से इडली मंगाई गई और डोसा प्रिय होते हुए भी मन मार कर मुझे इडली खानी पड़ी।
सालों बाद एक बार फिर उसी ‘इंडियन कॉफ़ी हाउस’ में जाना हुआ । सब कुछ बदला-बदला। परिवर्तन का असर स्थान, साज – सज्जा व व्यवहार पर दिख रहा था, अगर कुछ नहीं बदला था तो वह था स्वाद और भीनी यादें।
अभी भी जब मैं किसी रेस्तरां में जातीं हूँ तो उस घटना को याद कर मुस्कुराये बिना नहीं रह पाती।
जब भी मैं आज के समय से अपने समय का विश्लेषण करतीं हूं तो लगता है हमारी पीढ़ी का जन्म भूत व भविष्य को संतुलित करने के लिए हुआ है। अपने माता-पिता की सीमित आय, उनकी उम्मीद व प्रतिष्ठा के बीच जद्दोजहद से लेकर अपने बच्चों की उम्मीद और घोर चैलेंज करती उनकी परवरिश के बीच झूलते जीवन के बीच सामंजस्य। खैर बदलाव हर युग का मुखपृष्ठ रहा है और हर पन्ने को पढ़ना हमारी नियति।







