आज से साठ साल पहले, रोकी हुई साँसों से फटने को तैयार बैठे फेफड़ों से जकड़े, तेजी से धड़कते दिलों के साथ, हम सवा-दर्जन-भर क्लास्मेट्स अपनी पतली–दुबली कायाओं के संतुलन को मुश्किल से संभाले, नाजुक और नाटी गर्दनों को ही किसी जिराफ़ के अंदाज में बाहर हवा में फैलाए, अंग्रेजों के जमाने की बेरेकनुमा स्कूली इमारत की छत के किनारे से उस अद्भुत नज़ारे को आँखें फाड़े देख रहे थे, जहां हमें हमारे सामाजिक विज्ञान के टीचर ने सर्दियों की गुलाबी धूप सेंकते-सेंकते मानव समाज के व्यवहार के किसी नए पहलू पर पाठ सीखने के संयुक्त अभियान का भागीदार बनाया हुआ था।
बीती सदी के वर्ष 1902 के अमरीका में ओहियो राज्य के अचंभित नागरिकों की तरह, जिन्होंने उस ऐतिहासिक पल को जीया होगा जब राइट ब्रदर्स ने अपने बनाए जुगाड़ू हवाई जहाज़ को ज़मीन पर दौड़ाया और फिर इतिहास के पन्नों पर झंडे गाड़ते हुए हवा में उड़ गए, हम नौसिखिए भी उस दिन उतने ही रोमांचक पल का आनंद ले रहे थे जब हमारे गणित के मास्टरजी लंच ब्रेक के लिए अपनी साइकिल से घर की ओर उड़ान भरने के लिए अपने अनोखे अंदाज में सड़क पर टैक्सी कर रहे थे। न केवल हम मथुरा दास सनातन धर्म स्कूल, कपूरथला के वे सब भाग्यशाली छात्र, जिन्हें नियमित रूप से उन दिनों ऐसे कारनामे देखने का मौका मिलता था, बल्कि सड़क पर आते-जाते राहगीर भी हैरान होकर रुक जाया करते जब मास्टर खुल्लर साइकिल की सवारी के अपने अनोखे अंदाज की सार्वजनिक नुमाइश किया करते।
अपने भारी-भरकम शरीर, और बढ़ती उम्र या किसी जन्मजात विकार अथवा अर्जित संस्कार के ही कारण, वे साइकिल पर उस तरह से नहीं सवार हो पाते थे जैसे हम-आप जैसे आम लोग होते हैं। इसलिए उन्होंने बड़ी चतुराई से पिछले पहिये की धुरी पर बाहर की ओर निकली एक लोहे की डंडी लगवा रखी थी। वे साइकिल को उसके हैंडलबार से पकड़ते और फिर धीरे-धीरे अपने वजनदार पाँवों से सड़क को पीछे धकेलते हुए कदमों की गति बढ़ाते हुए तेजी से साइकिल को संभाले दौड़ने लगते। फिर कुछ देर बाद अपना बायाँ पैर उस डंडी पर रख लेते और इन्द्र देव द्वारा संचालित फ्लाइट कंट्रोल टॉवर से हवा के पर्याप्त मोमेन्टम का सिग्नल पाते ही भौतिक विज्ञान के नियमों के भरपूर फायदे के साथ-साथ अपने भारीभरकम शरीर को भी उठाते हुए पिछले कैरियर पर उछल पड़ते, जहाँ से फिर धीरे-धीरे वे ऊपरी ड्राइविंग सीट पर अगले बीस-तीस गज की दूरी तक किसी मोटर साइकिल के रईसी अंदाज की साइकिल सवारी के बाद पेडलों पर वजन डाल सीधे खड़े हो कर पहुँच ही जाते। इस पैंतरेबाज़ी में तीन-चार मिनट लगते होंगे और यह करतब लगभग सौ गज तक दृश्यमान रहता, और उनके सीट पर यूं विराजमान होने की प्रक्रिया के अंतिम क्षण का उचित सम्मान हमेशा हम छात्रों की तालियों और दूसरे हैरान खड़े दर्शकों की विभिन्न भौतिक प्रतिक्रियाओं से होता ही था, हालाँकि यह हमारे उन दिनों की किशोर अवस्था के कच्चे दिमागों के लिए हमेशा एक अनसुलझा रहस्य ही बना रहा कि क्या अपनी मंज़िल पर पहुँच कर भी वे साइकिल से कुछ इसी तरह के अंदाज में जमीन पर लेंड करते थे या उनके पास नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन की मानद सदस्यता हासिल करने की योग्यता में कोई और भी ऐसा ही इनोवेटिव तरीका था?
मास्टर खुल्लर की आधे बाजू वाली झीनी, सफेद मलमल की कमीज के नीचे, मोटी चमड़े की बेल्ट से मुश्किल से संभाली खाकी पैंट की उत्तरी सरहद को अनधिकृत रूप से लांघती उनकी तोंद का उछाल हमेशा उन चीज़ों से और बड़े दायरे को घेरे रहता था जिन्हें वे अपने करीब ही रखना चाहते थे- चाहे वह डायरी हो, बटुआ हो, चश्मा, रेजगारी, फाउंटेन पेन, कुछ जरूरी कागज़ या हों दूसरी अजब चीज़ें, जिन्हें निजी सुरक्षा प्रदान करने के लिए वे अपनी बंडी-नुमा बनियान और पारदर्शी कमीज के बीच की परत में समेटे रखते थे। लेकिन एक दिन जब अपने चलते-फिरते तोन्दू स्टेशनेरी स्टोर में किन्हीं विशेष कारणों से उन्होंने एक स्याही की दवात को भी शामिल कर लिया, तो वही हुआ जो अनचाहा हो सकता था। जब उनके कपड़े और स्टोर का बाकी सामान यूं नीली स्याही से सराबोर हो गए तो उनका क्लासरूम में ही कमीज और बनियान उतारकर उस अचानक हुए हादसे से निबटने का अनोखा तजुर्बा उनके शागिर्दों के लिए किसी सर्कस के खेल के तोहफे से कम दिलचस्प नहीं रहा। मगर यह किसी सुनामी किस्म की अनहोनी भी उनके अपने निजी स्टोर की भौगोलिक स्थिति को डगमगा नहीं पाई और न ही उस अजीब, पारदर्शी गोदाम के प्रति उनके अटूट विश्वास को डिगा पाई।
अपने गोदाम की सुरक्षा के बाहर वे सिर्फ एक छोटी सी बांस की छड़ी ही छोड़ते थे जिसे आम तौर पर ब्लैक-बोर्ड की लिखाई पर इशारा करने के लिए ही इस्तेमाल करते और भगवान की अनुकंपा में अपना सहयोग देते हुए कभी-कभार ही हमारे शरीर के बोर्ड यानि पीठ को भी काला-नीला करने के लिए उसको इस्तेमाल में लाते। जब वे किसी बच्चे का पढ़ाई न करने या किसी शरारत के लिए कान मरोड़ते तो उसका दर्द बाकी बच्चों तक रास्ते में मजाक में बदल कर ही पहुंचता क्योंकि मास्टरजी इस धुनाई को खास लटकते लहजे में गाने की धुन दे रहे होते: फोटो खिचवाने आए हैं। उनका एक और जुमला जो किसी लोकप्रिय जिंगल की तरह मेरे दिमाग में अभी तक बसा है, वह है: इक बैजा बनाओ, जिसका मतलब है एक खास ज्योमेट्रिकल आकार बनाओ।
स्कूल में दूसरी जगहों की तरह, मास्टर खुल्लर के लिए आठवीं क्लास का हमारा क्लासरूम मानो उनके घर का ही एक हिस्सा था, क्योंकि हममें से चतुर-होशियार लड़के उन्हें छोटे-मोटे तोहफ़ों से खुश करने या अपनी किसी प्रकार की मदद से उनकी परेशानियाँ कुछ कम करने के लिए एक दूसरे से होड़ लगाए रहते थे। उनके पसंदीदा की पहली कैटेगरी में एक था स्कूल के सामने स्थित स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के मैनेजर का बेटा, जो अक्सर उनकी नए करेंसी नोटों की मांग पूरी किया करता था। ऐसे में उन नए नोटों के बंडलों से उढ़ती छापाखाने की मदमस्त महक हमें भी कृतार्थ कर जाती चाहे इतने नोटों के जमावड़े को सिर्फ दूर से ही देख कर धन्य होना हम में से कईओं के लिए आने वाले समय में देर तक मजबूरी ही बना रहा। पहली पायदान को ही साझा करता था शहर के जाने-माने किराना व्यापारी गंडी राम का पोता, जिसे समय-समय पर दुकान से बड़ों की नज़र बचा कर छोटी इलायची, मिश्री या मीठी सौंफ मुट्ठियाँ भर-भर लानी पड़ती थी।
दूसरी कैटेगरी में शामिल होना शायद ज़्यादा मुश्किल और जोखिम भरा था। मास्टर खुल्लर के घर पर एक कुतिया थी, जो उन दिनों अपनी प्रजनन क्षमता के चरम पर थी। समय-समय पर वह स्वस्थ पिल्लों को जन्म देती, जिससे उनके घरवाले परेशान हो जाते थे और वे अपने छात्र-यजमानों को उनमें से कुछ पिल्लों को गोद लेने के लिए उकसाते ताकि घर पर उनकी बढ़ती संख्या को कंट्रोल किया जा सके। ऐसे गोद लेने के लिए आवेदन पत्रों की सावधानी से जाँच की जाती। आमतौर पर माता-पिता से ज़मानत के तौर पर सहमति पत्र भी लिया जाता, क्योंकि मास्टरजी सालों से कुछ छात्रों द्वारा बेवकूफ बनाए जाने के बाद अधिक समझदार और अनुभवी हो गए थे। उन बदमाश बच्चों ने मास्टरजी से तो पूरे नंबर हड़प लिए लेकिन अपने माँ-बाप की फटकार के बाद या नई जिम्मेदारीओं से छुटकारे के लिए जल्द ही उन पिल्लों को गली का रोमियो बना कर छोड़ दिया।
उस छोटे से शहर में मेरे पिता सरकारी नौकरी में किसी बड़े पद पर आसीन नहीं थे और हमारे घर में पहले से ही दो पालतू कुत्ते- स्वीटी और बॉबी मोजूद थे, इसलिए, अफसोस, मैं कभी मास्टर खुल्लर का पसंदीदा छात्र नहीं बन सका। फिर भी, जब हम पुराने दोस्त सालों बाद कभी, कहीं मिलते हैं तो मास्टर खुल्लर की यादगार शख्सियत के साथ पूरी ईमानदारी बरतते हुए, उनके अजब किरदार और उन से जुड़े मज़ेदार किस्से-कहानिओं को जरूर याद करते हैं। ऐसे में हमारी बातचीत में वे फिर से ज़िंदा हो हमें नए सिरे से हँसाते भी हैं और याद भी दिला जाते हैं कि हमारी अपने काम में तरक्की और समाज में आज के मुकाम तक के सफ़र में उनका भी बड़ा योगदान रहा।







