(यह प्रेम नहीं क्या? श्रद्धांजलि प्रेम को )
पहले पृष्ठ पर ही आप अंतिम समय तक कहती रहीं “मुझे महताब कँवर पूरी करनी है।” कठिन परिस्थितियों में पूर्ण की गई आपकी यह अंतिम रचना आपको ही समर्पित है।
पृष्ठ पलटते ही डॉ.नताशा अरोड़ा का सदा की भाँति मुस्काता चित्र!लगा अभी बोल पड़ेंगी किन्तु उनके शब्द जो किसी भी वार्तालाप में ‘मेरी प्यारी प्रणव’ के बिना समाप्त ही नहीं होते थे। अब मन के गह्वर में बैठे हैं,संवाद करते हैं,स्मृति के कितने ही क्षण साझा करते रहते हैं। जीवन कोलाहल से परिपूर्ण है और जब वह शांत होता है तब भी अपने पीछे इतना कुछ छोड़ जाता है कि पीछे वालों के लिए समेटना बहुत कठिन होता है। फिर भी चक्र है,चलना है इसे ऐसे ही,यूँ ही।
मुझे अक्सर कहतीं “बस मुझे महताब कँवर पूरी करनी है।” उनके पति श्री अरोड़ा जी ने इस पुस्तक की बात करते हुए कितनी संवेदना से लिखा है – शारीरिक पीड़ा से भी मध्य रात्रि नींद खुलने पर,काँपते हाथों से लिखने बैठ जातीं। पंक्ति दर पंक्ति ,धीरे-धीरे इस उपन्यास को उन्होंने अपनी तरफ़ से पूरा कर ही डाला।
अरोड़ा जी के ये शब्द अपनी संगिनी के लिए बहुत गहन श्रद्धांजलि हैं -“अब सोचता हूँ तो उनके दृढ़ संकल्प के लिए मेरे पास शब्द नहीं – ”पुस्तक पर अपनी दिवंगत अर्धांगिनी के प्रति ये शब्द उनका पत्नी के प्रति प्रेम,समर्पण के साथ ही जो सबसे बहुमूल्य है यानि सम्मान ‘रिगार्ड’ का एहसास कराते हैं। मैंने आ.अरोड़ा जी के सौम्य व्यवहार में दीदी के प्रति ही नहीं, उनके मित्रों के प्रति भी जिनमें मैं स्वयं को शुमार करती हूँ स्वागत व सम्मान देखा है।
नताशा जी का जिस उम्र में मुझसे मिलना और प्रेम हुआ वह इतना गहन रहा कि मैं उनसे और वे मुझसे अपनी अधिकांश बातें साझा करने लगे थे। कभी अरोड़ा जी हँसकर कहते “हम समझ गए है प्रणव जी का फ़ोन है,अभी तो आप काफ़ी देर व्यस्त रहेंगी।”मुझे उनकी आवाज़ फ़ोन पर पीछे से सुनाई देती ,हम दोनों हँस पड़ते, साथ में उनकी आवाज़ भी सम्मिलित हो जाती।कई बार ऐसा हुआ,मैं खिसिया भी जाती लेकिन बातें पूर्ववत् चलती ही रहतीं।
अरोड़ा जी लिखते हैं ‘इस पुस्तक के सम्पादन और प्रकाशन से पूर्व नताशा जी का मार्च 2025 में निधन हो गया और उनकी मेज़ पर उनकी ‘महताब कँवर’ के अनगिनत पर्चों की थप्पी बैठी रह गई।
टुकड़ों-टुकड़ों में एक अंतराल में लिखी गई इस रचना का कुशल सम्पादन आवश्यक था जो जटिल कार्य हमारी पुत्री इला मेहता द्वारा किया गया। नताशा जी की मूल गाथा, उनके कथन के रस और उनकी भाषा को यथावत् रखते हुए ,इला ने बिखरे और उलझे हुएअनेक छोरों को बांध,कहानी को क्रमबद्ध व पठनीय बनाया है।
मुझे याद है नताशा दीदी से मिलने के अनेक लम्हे ! मैं अहमदाबाद की संस्था ‘अस्मिता’ जो श्रीमती नीलम कुलश्रेष्ठ के द्वारा संस्थापित है उसमें सबसे पहली बार उनके ही माध्यम से गुजरात साहित्य परिषद में मिली थी। यहाँ उनकी बिटिया इला उन्हें छोड़ने आई थी । मेरा उनसे व बेटी इला से यह पहला परिचय था,उन्होंने मुझे अपना उपन्यास ‘हिडिंबा’ दिया था कि मैं उस पर कुछ लिखूँ। जैसे उपन्यास पढ़ती गई,उनकी लेखनी की कायल होती गई।
अभी तक आम व्यक्ति हिडिंबा को जिस रूप में देखता था निश्चय ही नताशा जी का उपन्यास पढ़ने के बाद इस चरित्र की इतनी खूबियों से जैसे मेरे मन में हिडिंबा का चित्र ही बदल डाला, किसी भी पाठक के मन में उस चरित्र के प्रति अधिक जिज्ञासा जागृत होगी और वह कुछ सोचने के लिए विवश होगा। उस पर गंभीर शोध के बाद समृद्ध लेखनी से लिखा गया उनका साहित्य धीरे-धीरे सामने आया। हिडिंबा का चरित्र ऐसा चित्र उजागर करता हुआ अपने साथ यात्रा करवाता चलता। मानो कहता हो,मुझे जानो,समझो तब मेरे बारे में संवाद करो।जिस गंभीरता से उन्होंने वह उपन्यास लिखा था,स्पष्ट था कि वह उनके गहन चिंतन,शोध,कल्पना शक्ति,श्रम का परिणाम था। मेरे पूछने पर उन्होंने बताया भी कि वे पहले तो मनाली परिवार के साथ घूमने ही गईं थीं लेकिन जब वहाँ पर हिडिंबा के नाम पर हर चीज़ देखी, उपन्यास लिखने से पूर्व वहाँ दुबारा जाकर एक बार फिर से शोध की,स्थानीय निवासियों से वार्तालाप किया उसके बाद ही हिडिंबा के चरित्र को उतारने का काम किया।
इतिहास की प्रवक्ता नताशा जी ने ऐतिहासिक व पौराणिक पृष्ठ भूमि पर युगांतर,हिडिंबा ,योद्धा, उपन्यासों के अतिरिक्त मुक्ति बंधन ,पुरस्कृत कहानियों के संग्रह ‘बहुरंगी’ व ‘मनरंगी’ भी सम्मिलित हैं। अनेकों उच्च पुरस्कारों,सम्मानों से विभूषित नताशा जी उत्तर-प्रदेश हिन्दी के साहित्य भूषण सम्मान से भी अलंकृत हैं। एक बार मिलने के बाद मेरा कैसा संबंध उनसे जुड़ा कि वे अपनी कोई भी पुस्तक प्रकाशित होते ही मेरे पास भिजवा देतीं।आज उनकी अनुपस्थिति में भी यह उनका अंतिम उपन्यास महताब कँवर मेरे पास जैसे पहुँच गया, मुझे क्षण भर को भान नहीं हुआ कि ये उन्होंने नहीं बल्कि उनके पति श्री अरोड़ा जी ने भेजा है।
मैं नहीं जानती थी कि हम एक ही साथ, एक ही संस्थान से जुड़े रहे हैं। यह बहुत बाद में पता चला कि आज से लगभग 28 वर्ष पूर्व 1976 में इसरो के साइट प्रॉजेक्ट के तहत दूरदर्शन के प्रोजेक्ट्स वहाँ के स्टूडियो के पॉलिटेकनिक परिसर में संचालित होते थे,उन्हीं दिनों नताशा जी वहाँ एक्टिंग के लिए जुड़ी रहीं थी।
अहमदाबाद दूरदर्शन का क्षेत्रीय प्रसारण दिसंबर 92 से शुरू हुआ। कुछ वर्षों के बाद इसरो के कैंपस में एक अलग बिल्डिंग में ‘डेकू’ नाम से अलग योजना शुरू की गई जिसमें केन्द्रीय सरकारी योजना के तहत छोटे विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू हो गए थे। अहिंदी प्रदेश होने के कारण हिन्दी के कार्यक्रम कम थे किन्तु शुरुआत हो चुकी थी।स्मृति खंगालती है मेरी करीबी मित्र स्व.मंजरी गौतम जो पहले आकाशवाणी में थी,उसे दूरदर्शन के कार्यक्रम करने के लिए वहाँ नियुक्त कर दिया गया था। एक दिन उसने मुझसे कहा –“एक बच्चे का इंटरव्यू करना है। आप कर लीजिए।”वह अहमदाबाद दूरदर्शन का पहला कार्यक्रम था जो इसरो के स्टूडियो में रेकॉर्ड होना था।अहमदाबाद दूरदर्शन की किसी बच्चे की पेंटिंग्स के बारे में उससे संवाद करते हुए किया जाना था।
“क्यों?यह तो पहले से शैडयूल था न,फिर?”मैंने मंजरी से पूछा
“अरे! जो इसको करने वाली थीं,वे किसी पर्सनल प्रॉबलम से नहीं कर पा रही हैं, आप करो न ,पहला प्रोग्राम है,याद रहेगा हमेशा।” उसने हँसकर मुझे उकसाया। मुझे क्या आपत्ति हो सकती थी ? आकाशवाणी में मैं बहुत पहले से जुड़ी हुई थी। पीएच,डी करने के समय से कार्यक्रमों में जुड़ना मुझे ऊर्जायित करता। अहिंदी प्रदेश होने के बावज़ूद आकाशवाणी में ड्रामा सैक्शन था जिसको स्व.डॉ.नवाणी देख रहे थे,उसमें जुड़ाव हो गया था।
केन्द्रीय कार्यक्रम स्व.श्रीमती साधना भट्ट देख रही थीं। उनके साथ स्व.श्री ब्रजभूषण काबरा जी, प्रसिद्ध शास्त्रीय संगीतकार व गिटारवादक के साथ मैंने साक्षात्कार की पूरी सीरिज़ की थी। वहाँ बहुत से मित्र बन गए थे। मंजरी से बहुत पहले का संबंध था बल्कि पारिवारिक संबंध भी !मंचों पर काफ़ी सक्रिय थी मैं उन दिनों! मंजरी का कहना टालने का कोई प्रश्न ही नहीं था जबकि उस कार्यक्रम के लिए मेरा नाम पहले से वहाँ न होने के कारण थोड़ी हिचक सी तो थी मन में,कोई मानसिक तैयारी भी नहीं थी। उस कार्यक्रम के बारे में कोई पूर्व सूचना न होने के कारण उसके बारे में कुछ भी नहीं जानती थी लेकिन कोई ऐसी दिक्कत नहीं थी कि कर न पाती। जिनके नाम पहले से यह कार्यक्रम था। उनके प्रति यह भी भाव आया कि उन्हें कैसा लगेगा,बेशक छोटा ही सही लेकिन अहमदाबाद दूरदर्शन से प्रसारित किया जाने वाला यह पहला कार्यक्रम था,सदा के लिए स्मृति में ठिठक जाने वाला!।
खैर,कार्यक्रम अच्छा हो गया। बच्चा लगभग 7/8 वर्ष का होगा। उसे सहज करने में कोई खास समय नहीं लगा। वह अपनी बनाई हुई पेंटिंग्स लेकर आया था।उसने सभी पेंटिंग्स दर्शकों को दिखाईं और थोड़ा समझाने पर प्रश्नों के उत्तर भी दिए।
कुछ वर्षों में इसरो के कैंपस में ही ‘डेकू’ खुला जिसमें केंद्र के कार्यक्रमों की योजनाएं शुरू हुईं । मुझे पैनल पर लिया गया और मैं इसरो के डेकू जिसमें भारत सरकार द्वारा आदिवासी प्रदेशों में शैक्षणिक व जागृति के अभियान के तहत छोटी फ़िल्में और सूचनात्मक कार्यक्रम शुरू किए गए थे,जुड़ गई थी ।मेरा काम शुरू हो चुका था ,कुछ नए प्रॉजैकक्ट्स भी पंक्ति में थे।
भोपाल के लिए नृत्य की पद्य नाटिकाएं लिखते हुए एक दिन इसरो के गेट के बाहर सड़क पर पुलिया पर बैठकर चाय पीते हुए मेरे निर्देशक श्री अशोक कामले से बात हुई कि छोटे प्रोजेक्ट्स पर कई लोग काम कर रहे हैं,हम कुछ बड़ा सोचें तो डॉ.भारती? NID में मुझे एनीमेशन की स्क्रिप्ट्स लिखने का खासा अनुभव रहा था सो यहाँ इसरो में कोई परेशानी नहीं हुई थी। 1996 में मैंने श्री अशोक कामले के साथ मिलकर एक सीरियल का बड़ा प्रॉजेक्ट तैयार किया जिसे दिल्ली भेज दिया गया जो अप्रत्याशित रूप से जल्दी ही ‘ok’ होकर आ गया। हमारा काम शुरू हो चुका था। रेकॉर्डिंग इसरो के स्टूडियो में ही हो रही थी। मेरा काम कभी-कभी ही पड़ता स्टूडियो में जाने का। मैं लंबे सात वर्ष तक उस प्रॉजेक्ट से जुड़ी रही।
टीम के साथ झाबुआ,अलीराजपुर भी गई और सात वर्षों में 68/70 एपीसोड्स लिखे गए,शीर्षक-गीत लिखा गया। यहाँ के स्टूडियो में रेकॉर्डिंग्स होती रहती थीं। हमारे सीरियल की शूटिंग आउटडोर थी,अधिकतर आदिवासी प्रदेश अलीराजपुर,झाबुआ में होती रही थी। प्रॉजेक्ट पूरा हो गया और मैं दूसरे संस्थानों से जुड़ गई।
आश्चर्य हुआ जब नताशा जी का एक दिन अचानक ही फ़ोन आया,”तुम्हारे शहर से बोल रही हूँ।” उन्होंने हँसते हुए बताया कि मि.अरोड़ा को किसी प्रॉजेक्ट के सिलसिले में एक वर्ष के लिए अहमदाबाद आना था, नताशा जी साथ में थीं। यह बात जहाँ तक मुझे याद है 2016 की है क्योंकि उसी वर्ष मेरी दो पुस्तकों का विमोचन हुआ था और उन्हें मेरे उपन्यास ‘नैनं छिंदन्ति शस्त्राणि’ पर कुछ बोलना था। उनका स्वास्थ्य तब भी ठीक नहीं था लेकिन वे आईं थीं और अपना वक्तव्य भी प्रस्तुत किया था। जब हम गले मिले उन्होंने धीरे से कहा,”भगवान से प्रार्थना करती रही हूँ कि ठीक रहूँ। मैंने अपने आपको फूल की तरह संभालकर रखा है कि मुझे प्रणव के कार्यक्रम में तो जाना ही है। उनका प्रेम मेरे लिए सदा बहुमूल्य रहा। कुछ समय बाद ये लोग नोएडा लौट गए थे। न जाने कैसे कार्यक्रम बना, हम पति-पत्नी गर्मियों में उत्तर प्रदेश का चक्कर लगाने गए और नताशा दीदी के यहाँ सबसे मिलकर आए। उसी वर्ष मेरे पति का नवंबर में देहावसन हुआ।कुछ समय बाद नताशा दीदी अहमदाबाद में थीं। वे कभी मेरे पास आकर बैठ जातीं और हम बदली हुई परिस्थिति पर बातें करते रहते।
मैं सात साल इसरो में रही और नताशा जी वहाँ स्टूडियो में नाटकों में रेकॉर्डिंग करती रहीं लेकिन एक ही संस्थान में जुडते हुए भी हम आपस में कभी नहीं मिले क्या टकराए भी नहीं। मालूम ही नहीं था कि जिनका पहला साक्षात्कार का प्रॉजेक्ट मैंने ले लिया था वह नताशा जी कर रही थीं।
नताशा दीदी का स्वास्थ कई वर्ष बहुत खराब रहा लेकिन कोई भी त्योहार हो,पूजा हो ,उनका उत्साह देखने योग्य होता था। जबरदस्त जिजीविषा थी उनमें। कई बीमारियों के बावज़ूद अपने मनोबल को बनाए रखना कठिन होता है लेकिन बड़े थपेड़े खाए उन्होंने लेकिन खुद को टूटने नहीं दिया। मैं बहुत बार कहती आप इतनी अच्छी हैं, आपको क्यों यह सब? वे हँस पड़तीं।जब मैं उनसे अंतिम बार नोएडा में उनके घर पर मिली,हमने साथ ही लंच लिया ।मेरे साथ प्रताप नारायण भी था जो मुझे बरसों से दीदी पुकारता है। कल ही उससे बात हो रही थी ,वह याद कर रहा था कि दीदी! आप उनके हिलते हुए हाथ पकड़े बैठी रही थी,मन पीड़ा से भर जा रहा था और कोई भी कुछ करने की स्थिति में नहीं था। वहीं मुझसे मिलने मित्र कुसुम वीर भी आ गईं थीं। उनके पति कर्नल वीर भी बहुत स्नेहिल हैं। मुझे कभी समझ में नहीं आया,अब तो भला क्या आएगा कि उम्र के इस पड़ाव पर इतने स्नेहिल मित्रों से मोह में क्यों बंध रही हूँ?
संभवत: जैसा माना जाता है किसी के साथ लेन-देन शेष रह जाता है ,वह पूरा होने के लिए ही हम मिलते हैं। इस पुस्तक के बहाने कितनी स्मृतियाँ मेरे सामने जैसे किसी गवाक्ष से निकलकर आ खड़ी हो रही हैं। मैंने कितने करीबी मित्रों को उनके माध्यम से याद कर लिया जो चले गए हैं। अब वे भी चली गईं सबके दिलों में छाप छोड़कर !यही जीवन है,हम सब समझते हैं,इसका स्वीकार अति आवश्यक है।
मैं अक्सर इला से बात करती रहती थी ,कई दिनों से दीदी से बात नहीं हो पा रही थीं ,मैंने शायद इला से बात करने की कोशिश की लेकिन बात न हो सकी । एक रात उसका फ़ोन आया,”आँटी! बैंगलूर एयरपोर्ट पर बैठी हूँ ,माँ नहीं रहीं ,नोएडा जा रही हूँ। कुछ था ही नहीं कहने को!
एक लंबा मौन रहा कई माह तक शायद इला पापा के साथ मिलकर इस अंतिम पुस्तक के बिखरे पन्ने समेटने में रही। अब जब मि. अरोड़ा ने उनका यह अंतिम उपन्यास मेरे पास भेजा, मैं अजीब सी हो उठी।
उपन्यास जगह जगह पर उनकी छुअन से मुझे लरजाता रहा है। यह एक ऐसी महिला की कथा है जिसने अपने जीवन में न जाने कितने थपेड़े खाए किन्तु सुदृढ़ खड़ी रही । अपने ऊपर हुए अत्याचारों को झेलते हुए भी समाज की कुरीतियों से लड़कर अपने व समाज की महिलाओं के लिए एक सुदृढ़ स्थान बनाया,उन्हें चुनौती के समक्ष दृढ़ रहने में उनका संबल बनी रही।महताब कँवर की कहानी के साथ उसकी बेटी फूलकँवर की कहानी भी एक ऐसे चरित्र की दास्तान है जो सब कुछ सहन करते हुए भी क्रांति करती है और लक्ष्य को प्राप्त करती है ।
बेटी इला माँ की लाड़ली बिटिया लिखती है- कभी-कभी लगता है माँ को शायद जादू आता था।हमारा घर सदा most well organised and stocked सबकी जरूरतों का ख्याल। आए दिन नए व्यंजनों का मज़ा, महिला संगठनों में खूब active participation-, धूमधाम से मनाए जाते हर त्योहार का हुल्लड़, रिश्तेदारों का बड़े प्यार और हक से आना-जाना। साड़ियों पर कढ़ाई,दीवारों पर माँ के बनाए fine oil and water artwork
इला लिखती है – She was indeed a magician! And a beautiful one at time.पिछले दो चार वर्षों में माँ के स्वास्थ्य की काफ़ी दयनीय स्थिति रही। Parkinsons के कंपन ,internal pains और बीमारी के चलते, memory frolic की वजह से उनके आखिरी उपन्यास के drafts काफ़ी असत व्यस्त से रह गए। मेरा जब भी नोएडा जाना होता, वे मुझे बैठाकर महताब कँवर की कहानी सुनातीं और हर बार यही कहतीं ”पैन पकड़ नहीं पाती हूँ गुड़िया, इतने हाथ पैर हिलते हैं पर महताब कँवर तो मैं पूरी करके रहूँगी।”
माँ इस मार्च को चली गईं।
उनकी पाण्डुलिपि को पापा ने बड़े प्यार से क्रमबद्ध करके मुझे बैंगलूरू भेजा कुछ दिन तो वो थप्पी मेरी मेज़ पर यूँ ही पड़ी रही। जब बैठती, बस रोना ही आता। ये कैसा काम छोड़ गईं मेरे लिए मम्मा?
तुम्हारी महताब को तुम्हारे चश्मे से निहारा है माँ! उसकी जीवन गाथा तुम्हारी ही कही हुई है। उम्मीद लिए खड़ी हूँ कि तुम्हारे पाठकों को तुमसे इस अंतिम रचना के जरिए अलविदा कहने का अवसर मिले ।
जहाँ भी हो,मम्मा,लिखती रहना।
तुम्हारी गुड़िया
इला मेहता,बैंगलूरू






