नज़्म (आधुनिक फ़ारसी साहित्य से…): अल्जाइमर चुंबन
कवयित्री: फ़ातेमा रज़ानेज़ाद, ईरान
हिन्दी अनुवाद: ख़ान हसनैन आक़िब
(कवयित्री और लेखिका, फातेमेह रेज़ानेजाद का सम्बंध ईरान के शहर गीलान से है. उन्हें “प्रेम की कवयित्री” (शायरा-ए-इश्क़) के नाम से भी जाना जाता है. उन का जन्म ईरान के रश्त शहर में हुआ था। वह गिलान प्रांत के समकालीन काव्य परिदृश्य की एक सक्रिय हस्ती हैं। अपने गृह नगर गिलान की भाषाई और सांस्कृतिक क्षमताओं का उपयोग करते हुए, वह फ़ारसी और गिलकी दोनों भाषाओं में साहित्यिक कृतियों की रचना करती हैं. उन्होंने स्थानीय साहित्य एवं ईरानी कविता की समकालीन धाराओं के बीच एक गतिशील और सार्थक संबंध स्थापित करने का प्रयास किया है।
अपनी कृतियों में, रेज़ानेजाद एक मानव-केंद्रित, शांति-उन्मुख और भावना-प्रधान दृष्टिकोण अपनाती हैं, जो एक कोमल, कल्पनाशील और संगीतमय भाषा में प्रेम, पहचान, स्थानीय जीवन और आधुनिक मानवता की सामाजिक चिंताओं के विषयों को दर्शाती है। उनका काव्यात्मक संसार भावना, सहानुभूति और एक अंतर-सांस्कृतिक दृष्टिकोण पर बना है, जिसमें उत्तर की प्रकृति, स्मृति, अपेक्षा और मानवीय संबंधों की एक प्रमुख और पहचान बनाने वाली उपस्थिति है।अब तक उन के दो स्वतंत्र संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं: फ़ारसी कविता संग्रह “गोली दर गिसू” (ज़ुल्फ़ों में एक फूल) और गिलकी कविता संग्रह “शेर-ए-अरसू”..)
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बरसों बीत गए,
उस आख़िरी चुंबन का स्वाद याद नहीं आता।
यादों के गलियारों में जितना भी ढूँढती हूँ,
होंठों पर बस एक धुँधला सा साया रह जाता है।
जैसे किसी ने प्रेमियों के मुँह से अनार की सुर्ख़ी पोंछ दी हो।
कभी-कभी शहर के व्यस्त स्टेशनों पर चेहरों को देखती हूँ,
सब कुछ सटीक है, सब कुछ व्यवस्थित,
पर कुछ तो अधूरा सा है
वह आँच, जो कभी एक होंठ से दूसरे होंठ तक का सफ़र तय करती थी।
रातों को,
स्क्रीन की ठंडी रोशनी में उन इंसानी रोबोटों को देखती हूँ
जो बिना रुके बोलते चले जाते हैं
और मुझे याद ही नहीं आता कि आख़िरी बार किसने अपने गर्म चुंबन से मुझे ज़िंदगी की ओर लौटाया था।
मैंने कई ऐसी औरतों को देखा है
जो मुस्कुराती हैं
पर उनकी आँखों में चुंबनों पर लगे लंबे प्रतिबंध का सन्नाटा तैरता है।
और मैं हर रोज़ और ज़्यादा डरने लगती हूँ
कहीं यह खामोश भूल ही वह बेनाम बीमारी तो नहीं
जिसने पूरी दुनिया को अपनी गिरफ़्त में ले लिया है?
अल्जाइमर चुंबन।
एक ऐसी बीमारी
जो याददाश्त से भी पहले होंठों को एक-दूसरे की याद से महरूम कर देती है।
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नज़्म: मातम!
कवयित्री: सुश्री इरम रहमान, लाहौर
प्रस्तुति: ख़ा हसनैन आक़िब
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हाय…किस किस बात पर मातम करें
अब रोया नहीं जाता
चश्म-ए-तर खु़श्क हो चुकी
ज़बान दुहाइयाँ दे कर सूख गई
हाथों की लकीरों में बहुत वक़्फ़े हैं
जैसे खु़शी और ग़मी के दौरानिये तवील होते हैं
सुना है हर अंधेरी रात के बाद
सूरज तुलू होता है
लेकिन यह नहीं बताया कि
अंधेरी रात आख़िर कितनी तवील होती है
मुद्दतों रहने वाली तारीकी
निगल गई कितने नाज़ुक बदनों को
कितने हस्सास जिगर खा गई
न सुबह हुई न रोशनी चमकी
जुगनू नापैद हुए, चाँदनी गायब रही
मर गए सब इंतज़ार करने वाले
डीले खुले रह गए
कंकालों में..







