उर्दू व्यंग्य
मूल रचना – नादिर खां सरगिरोह
अनुवाद – अख़तर अली
आप ग्रुप फ़ोटो के दोनों सिरे पर खड़े आदमी को गौर से देखिये वह कितना संभल कर खड़ा है , शायद उसे डर है कि मैं लटकी हुई फ़्रेम से गिर न जाऊ। जबकि वहां इतनी जगह होती है कि अगर खड़े खड़े उसके पैर दर्द करने लगे तो वह वहां लेट भी सकता है और जोरदार अंगड़ाई भी ले सकता है।
ग्रुप फ़ोटो में जो आदमी बीच में खड़ा रहता है वह आम आदमी का प्रतीक है उसे दोनों तरफ़ के लोग दबाते है। ग्रुप फ़ोटो में कुछ चेहरे असंतुष्ट वर्ग के होते हैं उन्हें फ़ोटोग्राफ़र के हुनर पर शक होता है कि कहीं वह उनका हाथ या मुंडी न काट दे। ग्रुप फ़ोटो में जो शासक स्वभाव के लोग होते हैं वो कुर्सी पर बैठे होते हैं , जो प्रशासन के जैसे लोग हैं वो ठीक उनके पीछे खड़े रहते है , जो सहायक और चाटुकार किस्म के लोग होते हैं वो प्रशासक किस्म के लोगों के पीछे एड़ी उंची कर के खड़े रहते हैं ताकि उनकी नाक उंची रहे। अब जो दो चार उपेक्षित और सर्वहारा टाईप लोग बच जाते हैं उन्हें सामने नीचे ज़मीन पर शासक वर्ग के कदमों में बैठा दिया जाता है।
ग्रुप फ़ोटो भी कमाल की चीज़ होती है। एक सत्तर वर्ष के आदमी के हाथ उसके स्कूली सहपाठियों के साथ वाली ग्रुप फ़ोटो लग जाये फिर देखिये उसका उत्साह और मस्ती। सत्तर वर्ष वाला पल भर में सात वर्ष का हो जाता है और एक एक से पूछता फिरता है बताओ इसमें मैं कौन सा हूँ। जो पतझड़ स्वभाव के लोग होते हैं इनके लिये हर तस्वीर ख़ामोश होती है लेकिन जो बसंत स्वभाव के लोग होते हैं वही जानते हैं कि हर तस्वीर बोलती है। सुनने में तो यह भी आया है कि तस्वीर का दूसरा रुख़ भी होता है जो हर नज़र को नही दिखता।
हालांकि चित्र से चरित्र का पता नही चलता है फिर भी जब शादी की बातचीत चलती है तब शुरुआत फ़ोटो के अदान – प्रदान से ही होती है। लड़का और लड़की दोनों ही अपनी फ़िलहाल की फ़ोटो नही देते बल्कि वह फ़ोटो देते हैं जिसमें वो सब से अधिक सुंदर लगते हों वह फ़ोटो भले कभी की हो। संबंधों में शक और अविश्वास की शुरुआत यहीं से होती है।
पुरी साहब ने अपनी शादी में फोटोग्राफ़र का कैमरा ही तोड़ दिया था। बात यह थी कि पुरी का पूरा मुंह सेहरे से ढका था और फ़ोटोग्राफ़र बार बार स्माईल प्लीज़ बोल रहा था। उस दिन मैंने पहली बार देखा कि ढंके हुए मुँह से कैमरा तोड़कर जवाब दिया गया हो।
फ़ोटोग्राफ़र का सब से प्रिय शब्द होता है “ स्माईल प्लीज़ “। ये मुस्कान को इतना पसंद करते हैं कि इनका कहना है कि आदमी जो ख़ताओं का पुतला है अगर मुस्कायें न तो केवल पुतला लगता है। दुर्घटना में मृत व्यक्ति की फ़ोटो खींचते समय भी फ़ोटोग्राफ़र लाश से कहता है “ स्माईल प्लीज़ “। इस मुश्किल भरे जीवन में मध्यम वर्ग को फ़ोटो खिचानें के वक्त ही पल भर मुस्काना नसीब होता है।
पुरी साहब को फ़ोटो उतरवाने का बहुत शौक था। वे फ़ोटो उतरवा उतरवा कर बार बार दीवार पर टांगते और उनके पिता टंगी फ़ोटो को हर बार उतार देते अतः कह सकते हैं कि दोनों बाप बेटे का यही शौक था फ़ोटो उतारना। पुरी साहब ने भी स्वीकारा कि हां हम दोनों ही उतारने पर उतारू थे।
सम्मान समारोह की फ़ोटो बहुत उलझन पैदा करती है। इसमें स्पष्ट ही नहीं होता कि सम्मान करने वाला कौन है और कौन सम्मानित होने वाला है। कौन प्राप्त कर के मुस्कुरा रहा है और कौन प्रदान कर के।
ये फ़ुल साईज़ , हाफ़ साइज़ और पासपोर्ट साइज़ फ़ोटो का कारोबार बहुत तेज़ी से फल फूल रहा है। इस उद्योग में भारी मात्रा में बिजली की खपत नही होती और न ही इसमें कैमरे से धुंआ और कार्बन निकलता है। अगर फ़ोटो खींचने पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगा दिया जाये तो धर्म और मानवता के सभी नेक काम तुरंत बंद हो जायेगे।
पासपोर्ट साइज के फ़ोटो ने इन दिनों धूम मचा दी है। इस छोटी साइज ने बड़ा कारनामा किया है। इसी से फ़ोटोग्राफ़ी के व्यवसाय में बूम आया है। अब तो आदमी पासपोर्ट साइज़ फ़ोटो की चार काँपी जेब में रखे बिना घर से निकलता नही है।
जब मैं पुरी साहब के नये मकान में पहली बार गया तो देखा उन्होंने घर में लाइब्रेरी भी बनवाई है जिसमें दुनियां भर के नामी लेखकों की प्रसिद्ध किताबे कांच के दरवाज़े वाली आलमारी में सफ़ाई से जमी हुई है। मैं तो उन किताबों को देख पढ़ने के लिए मचल गया। जब आलमारी में से किताब लेना चाहा तो देखा उसमें ताला लगा है। मैंने चाबी मांगा तो पुरी साहब ने कहा मेरे घर में किसी भी सदस्य के पास इसकी चाबी नही है क्योंकि हमने ताला लगाकर चाबी तालाब में फेक दिये हैं ताकि कोई किताब को हाथ लगाकर गंदी न कर दे। मैंने पूछा जब चाबी फेंक दिये हैं तो अब इसे कोई पढ़ेगा कैसे ? पुरी साहब ने बताया कि इतनी महंगी किताबें पढ़कर ख़राब करने के लिए नहीं खरीदी गई हैं। यह तो इसलिये खरीदी गई हैं ताकि इसके सामने खड़े होकर फ़ोटो खिचाई जा सके।
फ़ोटोग्राफ़ी के उस्ताद अपने शागिर्दों को बता रहे थे कि फ़ोटोग्राफ़ी के कुछ नियम होते है और अच्छी फ़ोटोग्राफ़ी सभी नियमों को तोड़ कर की जाती है।
फ़ोटो की प्रदर्शनी और स्पर्धा भी होती है। प्रथम पुरस्कार उस फ़ोटो को मिलता है जिसमें भुखमरी का शिकार बच्चा नज़र आता है जिसका पेट उसकी पीठ से चिपका हुआ है। उसके हाथ में पिचका हुआ बर्तन और पिचके गाल पर कैमरे की तरफ़ देखती धंसी और सहमी हुई आँखे हैं। ऐसी फ़ोटो को देखते ही भरे पेट वाले कह उठते हैं – वाह फ़ोटोग्राफ़र ने फ़ोटो में ज़िंदगी के रंग भर दिए हैं। इसी से पता चलता है हमारा दृष्टि दोष। जिसे देख कर आह निकलना चाहिये वहां हमारे मुंह से वाह निकलता है। या अल्लाह फ़ोटोग्राफ़र ने उस बच्चे की फ़ोटो में रंग भर दिया अब तू उनकी ज़िन्दगी में रंग भर दे।
अंत में मेरा आपसे आग्रह है कि हमारे पास समय कम है। इस कम समय में जितनी अधिक नेकियां कर सकते हैं कर लीजिये क्योंकि न जाने कब हम सिर्फ़ फ़ोटो में रह जाये और दीवार में टंग जाये।






